google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 खिचड़ी उत्सव के पद || Download PDF File

खिचड़ी उत्सव के पद || Download PDF File

 

खिचड़ी उत्सव के पद || श्री राधावल्लभ लाल जू के खिचड़ी उत्सव के पद अर्थ सहित || Download PDF File

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खिचडी उत्सव श्रीराधावल्लभ सम्प्रदाय में बहुत प्राचीन काल सौ मनायौ जाय है। निश्चित रूप से तौ नहीं कहा जा सकता, परन्तु प्रायः ऐसी धारणा है कि इस उत्सव को गोस्वामी श्रीकमलनैन जी महाराज ने आरम्भ कियौ ।

पौष शुक्ला दौज से उत्सव आरम्भ होयकै एक मास पर्यन्त उत्सव चलै । प्रातः लगभग पाँच बजे नित्य समाज बैठे और ३४ पदों की श्रृंखला नित्य एक मास बोली जाय है। प्रथम ९ सिद्धान्त के अन्तर्गत है फिर ११ पद सुरतांत केली के तत्पश्चात् ११ पद भोग के और फिर आरती के समय आरती के पद बोलते है। आरती के पश्चात् श्रीराधावल्लभलाल की छद्‌‌म वेष की झाँकियाँ होती है फिर अन्त में बन्द होने के समय ३४ वाँ पद बोलते है। एकादशी के दिन श्रीराधावल्लभलाल 'श्रीबिहारीजी' बनते हैं, चौदह को शंकरजी तथा पड़वा को युगल दर्शन होते है। अन्त में म माघ शुक्ला तीज को टोपा-दुशाला के दर्शन होते है और भिन्न-भिन्न प्रकार के मोहन-भोग कौ भोग लगै है और मोहन भोग के पद गवते है। 'अरी मेरी वारी कौ भंवरवा पद भी इसी दिन बोल्यौ जाय है।

श्रीराधावल्लभलाल के खिचडी उत्सव में राग-भोग कौ बहुत विस्तार है, सो भोग के पदों को देखने से ही भली-भाँति समझयौ जाय सकै । अनेक प्रकार के व्यंजन नित्य बनते है ।

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