श्री हित अष्टयाम PDF File || हिन्दी अर्थ सहित
श्री हित अष्टयाम PDF File || हिन्दी अर्थ सहित
अनन्तश्री विभूषित गोस्वामी श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु द्वारा प्रवर्तित 'नित्यविहार प्राण श्रीराधा चरण प्रधान वृन्दावन रसोपासना' में राधा किंकरी रूप ही उपासक का अपना नित्य सिद्ध वपु-निज रूप है। इस किंकरी रूप की प्राप्ति कर परमोपास्य अद्वय युगल एकात्म श्रीहित दम्पतिजू की सेवा करना ही इस रसोपासना का परम लक्ष्य किंवा परम साध्य है। आचार्य चरण ने इस साध्य की प्राप्ति के लिए अन्य कोई साधन न बताकर इस साधक शरीर से स्वेष्ट की मानसी सेवा तथा प्रगट सेवा करने का मधुर मंगल विधान किया है। यह सेवा विधान आचार्यचरण के चिरस्मरणीय चरित्रों और स्वरचित वाणियों में तो मूर्त हुआ ही है। आपने अपने शिष्यों को स्वयं श्रीमुख से यह आज्ञा भी प्रदान की है-
१. आज्ञा तिनकौं दई गुसाँई। हरि-हरिजन सेवा पधराई ॥
२. हित-पद्धति सौं प्रभु पधराये। राग-भोग सेवत गुन गाये ।।
३. सेवा संग हुती जो तिनकी। तासौं इकरस वृत्ति जु चित की। सदाचार सौं भोग लगावैं। ता प्रसाद बिनु और न पावैं ।। -
रसिक अनन्य माल, भगवत मुदित जी गौड़ीय कृत तदनुसार इन दोनों प्रकार की सेवाओं की अखण्ड परम्परा अद्यावधि सुरक्षित है। सम्प्रदाय में जहाँ पर एक ओर प्रगट सेवा विराजमान करने की यह विधा अक्षुण्ण रूप से चली आ रही दिखाई देती है, वहीं पर दूसरी ओर सम्प्रदाय के अनेकानेक वाणीकारों द्वारा इस सेवा-विधान के वाङ्मय स्वरूप 'अष्टयाम सेवा समय प्रबन्ध ' रचना की अखण्ड परम्परा भी अद्यावधि संजीवित बनी हुई है, किन्तु ये रचनायें हस्तलिखित होने के कारण सर्व सुलभ नहीं रहीं। प्रस्तुत 'श्रीराधाबल्लभ अष्टयाम सेवा-भावना पद संग्रह' अनेक रसिक सन्तों के उन पदों का संकलन है जिनका श्रीराधावल्लभलाल की अष्ट प्रहरीय सेवा भावना से सम्बन्ध है। वृन्दावनीय रसोपासना में युगल की आठ प्रहर की सेवा अपना विशेष महत्व रखती है। जो रसिक भक्त जन इस पद्धति से अपने इष्टदेव युगलवर की सेवा करते हैं या करना चाहते हैं, उनकी सुविधा के लिए इन पदों का एक विशेष क्रम से संकलन करने की प्राचीन परिपाटी का-ही इस संग्रह में अनुसरण किया गया है। अष्टयाम सेवा का क्रम संक्षेप में निम्नलिखित प्रकार समझना और करना चाहिये-
१. प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में शैय्या त्याग करके इष्ट-स्मरण नीचे लिखे शीर्षकों में उल्लिखित पदों के अनुसार करे- श्रीहित मंगल गान और प्रभाती गान (पृष्ठ १ से ६.)
२. तत्पश्चात् शौच, स्नानादि दैनिक कृत्यों से निवृत्त होकर, स्वच्छ एवं शुद्ध वस्त्र (धोती, दुपट्टा, बगलबन्दी आदि) धारण करके, ललाट पर तिलक स्वरूप धारण करके अपने इष्ट मंत्र के जाप से अन्तर्मन की शुद्धि करे; पश्चात् मन्दिर के द्वार पर प्रणाम करके श्रीराध किंकरी भाव से भावित होकर मन्दिर में प्रवेश करे। मन्दिर की सोहनी-सेवा 'सोहनी सेवा' गान (पृष्ठ-६) के साथ करे। तत्पश्चात् पूजा-सेवा के पार्षदों (वर्तनों) को स्वच्छ साफकर मन्दिर मार्जन करे, जल भरकर रखे और 'आजु देखि ब्रज सुंदरी' इत्यादि पदों (पृष्ठ-९) का गान करते हुए युगल के चरण चाँपकर उन्हें जगाकर चौकी पर विराजमान कराके मुख प्रक्षालन करावे, पश्चात् माखन, मिश्री, उष्ण दुग्ध, मोदक आदि सामग्री भोग रखे। भोग आरोगाने के पश्चात् मंगल आरती (पृष्ठ-१२) करके पुनः मंगल गान (पृष्ठ-१) करे और साष्टांग प्रणिपात पूर्वक दण्डवत् प्रणाम करे।
३. मंगल आरती प्रसाद ग्रहण के उपरान्त युगल के वन विहार की भावना वाणियों में वर्णित पदों के अनुसार करे (पृ०-१३-२०) और युगल को फुलेल मर्दन, उद्वर्तन (उवटन) करावे। (पृ०२०-२२) ऋतु के अनुकूल जल से स्नान कराके उन्हें नख-शिख वस्त्राभूषण धारण करावे, इत्र परिमल लगावे, खौर चन्दन पत्रावली से श्रृंगार कराके व मुकुट-चन्द्रिका आदि धारण कराके सिंहासन में विराजमान करे; फिर धूप प्रज्जवलित करके मन्दिर के प्रांगण को सुगन्धित करे। इसके साथ ही (पृ०-२२-२३) 'आजु नीकी बनी श्रीराधिका नागरी' एवं 'आजु नागरी किशोर भाँवती विचित्र जोर.....' का गायन करे।
४. तत्पश्चात् पटान्तर करके श्रृंगार भोग में मोदक मिष्ठान्न पकवान भोग रखे और श्रृंगार भोग के पदों का गायन करे। (पृ०-२३) भोग आरोगाकर ताम्बूल वीटिका अर्पित करे और श्रीलालजी को वंशी धारण कराके श्रृंगार-आरती (पृष्ठ-२४) 'श्रीराधावल्लभलाल की आरती' अथवा 'बनी श्रीराधामोहन की जोरी' इस पद के गान पूर्वक करे, और 'बेसर कौंन की अति नीकी' इस पद से जल वारे। फिर 'युगल ध्यान' (पृष्ठ-२६) शीर्षक के दोहों का ध्यान पूर्वक गान करे। गान सम्पन्न करके इष्ट-चरणों में साष्टांग प्रणिपात पूर्वक प्रणाम करे।
५. संभव हो तो घड़ी (४८ मिनट) तक इष्टदेव के समक्ष अन्यान्य लीला गुण माधुरी के पद-गीतों का गान करे। (पृ०-२७-३२) और मध्याह्न पूर्व राजभोग में सखरी निखरी सभी सामग्री भोग रखे और राजभोग के पद (पृष्ठ-३२) गान करे। भोग कम से कम आधा घंटा रखे पश्चात् आचमन (पृष्ठ-३४) के पद गान पूर्वक मुख प्रक्षालन कराके ताम्बूल अर्पित करे और आरती 'आरती मदनगोपाल की कीजिये' आदि पद-गान के साथ (पृष्ठ-३४-३५) करे तत्पश्चात् युगलवर को विश्राम के लिये शैय्या में पधरावे। इस समय युगल सरकार के मुकुट चन्द्रिका कुंडल एवं आभूषणों को उतार कर श्रीअंगों को हल्का कर दे। विश्राम कालीन समस्त व्यवस्था (जल झारी, पंखा आदि) समुचित स्थान पर रखे दे। शयन पद (पृष्ठ-३६-३७) के अनुसार गान और व्यवस्था करे।
६. दोपहर ढलने पर लगभग ३ बजे पुनः मन्दिर में प्रवेश करके उत्थापन (मंगला के अनुसार ही) व्यवस्था करे। (पृ०-३८) पद पर दिये गये पदानुसार युगल को शय्या से उठाकर चौकी पर विराजमान करके, मुख प्रक्षालन, उत्थापन भोग कराके श्रृंगार (श्रृंगार कालीन सेवा के समान) धारण करावे और सिंहासन पर विराजमान करके "श्रीराधा मेरे प्रानन हूँ ते प्यारी" (पृष्ठ-३९) पद के गान पूर्वक धूप प्रज्जवलित करे। तदुपरान्त पटान्तर करके वंशी धारण कराके दर्शन करावे। और (पृष्ठ ३९ से ४१) तक की समस्त पद-श्रृंखला का भाव पूर्वक गान करे।
७. संध्या पूर्व (ऋतु के अनुसार ५ से ६।॥ बजे तक) संध्या भोग रखे और संध्या भोग के पदों (पृष्ठ-४२ से पृष्ठ-४५) का गान करे पश्चात् कीर्तन 'जै जै राधावल्लभ श्रीहरिवंश' करके फिर 'आरती कीजै श्याम सुन्दर की' (पृष्ठ-४५) गान के साथ संध्या आरती करे और इष्ट-स्तुति (पृष्ठ-४६-५०) गान करे। गान-स्तुति सम्पन्न करके श्रीराधा सुधा-निधि एवं श्रीराधा उप सुधा निधि के कतिपय भावपूर्ण श्लोकों का सस्वर पाठ (पृ०-५१-५४) भी करे। पश्चात् इष्ट-चरणों में साष्टांग प्रणिपात करे व चरणामृत प्रसाद ग्रहण करे।
८. संभव हो तो रात्रि ८ बजे तक युगल के समक्ष रूप-गुण लीलादि के पद साहित्य का वाद्यादि के साथ समाज गान करे (पृ०-५४-५८) पश्चात् शयन भोग रखे और शयन भोग के पदों (पृष्ठ- ५८-६१) का गान भाव-भावना पूर्वक करे। भोग का समय कम से कम आधा घंटा रखने का है पश्चात् आचमन, मुख प्रक्षालन कराके ताम्बूल वीटिका अर्पित करके आरती (पृष्ठ-६१) पद रस निधि सैन आरती...... के गान पूर्वक आरती करे और युगल किशोर के वस्त्र धारण कराके शय्या में शयन करावे। शय्या के समीप चौपड़, इत्र, मोदकादि भोग, दूध-जल झारी, आदि उपभोग्य वस्तुयें रात्रि-विहार. की भावना (पृ०-६२-९०) से शय्या गृह में रख दे। युगल शयन की सुखद व्यवस्था करके मन्दिर के पट-मंगल करे। प्रणाम करके मन्दिर से बाहर आकर ही प्रसाद ग्रहण करे।
संक्षेप में यह अष्ट प्रहर सेवा का सामान्य विधान एवं भाव है। श्रीसुधर्मबोधिनीकार महात्मा श्रीलाड़िलीदासजी प्रगट सेवा की आवश्यकता वर्णन करते हुए लिखते हैं कि- प्रगट भाव की नींव दृढ़, कीजै कृपा मनाय । तब निश्चल हित महल रस, रहै चित्त ठहराय ।। प्रगट भाव आवेस सौं, कीजै विजै स्वभाव। वृन्दावन रसरीति में, तब उपजै विश्वास । प्रगट भाव सेवा बिना, चित्त न आवै प्रेम। प्रेम बिना दरसै नहीं, नित्य केलि वन नेम।। प्रस्तुत अष्टयाम में श्रीराधावल्लभीय सेवा विधान के पदों का संग्रह तो है ही साथ ही नित्य विवाहोत्सव के पदों, को भी दे दिया गया है। इस प्रकाशन की नूतन देन यह है कि अब तक के प्रचलित अष्टयामों के अन्तर्गत शयन 'भोग के जिन पदों में पद-निर्माता का नामोल्लेख नहीं है उनके नाम युक्त पदान्त के अन्तिम चरण भी टिप्पणी में प्रकाशित कर दिये गये हैं। इस संग्रह में अनेक रसिक वाणीकारों के उन अप्रचलित पदों को भी स्थान दिया गया है जो रस भारती संस्थान वृन्दावन की विभिन्न पाण्डुलिपियों में सुरक्षित हैं। अभी तक के प्रकाशनों में रसिक नामावली के अन्तर्गत केवल ५४ हित रसिकों के नाम ही पढ़ने को मिलते थे किन्तु प्रस्तुत प्रकाशन में अब उनकी संख्या-५९० पर पहुँच गई है। यह रसिक नामावली भी रसभारती संस्थान वृन्दावन में सुरक्षित रसिक चरित्र ग्रन्थों, वृन्दावन परिक्रमा वर्णनात्मक ऐतिहासिक ग्रन्थों, गुरु-परम्परा वर्णनात्मक ग्रन्थों, और अनेकानेक अज्ञात रसिक वाणीकारों द्वारा प्रणीत प्राचीन वाणी ग्रन्थों से खोज-खोजकर तैयार की गई है। यदि इस संकलन से भावुक भक्तों को किंचित भी हार्दिक संतुष्टि व पुष्टि हुई तो हमारे श्रम का साफल्य ही माना जायगा।
जय जय श्री राधे


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