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बयालीस लीला || श्री हित ध्रुव दास जी द्वारा कृत || Download PDF File
बयालीस लीला || श्री हित ध्रुव दास जी द्वारा कृत || Download PDF File
श्रीहित ध्रुवदास वाणा श्रीब्यालीस लीला नामक ग्रन्थ रसिक अनन्य नादकुल भूषण महात्मा श्रीध्रुवदास जी महाराज द्वारा रचित है। यह महात्मा श्रीहित नित्य वृन्दावन धाम के आदि आविष्कार कर्ता श्री नित्य बिहारी श्रीहित राधाबल्लभ लाल जी की नित्य आह्लादिनी परम प्रिया श्री ब्रज नवतरुणी कदम्ब चूड़ामणि श्रीहित सखी अर्थात् श्री राधिका जी की बिशेष प्रधान सहचरी जिनका निभृत निकुंज में हित सखी स्वरूप और जगत में आचारज रूप श्रीराधावल्लभीय सम्प्रदाय के प्रवर्तक श्रीहित हरिवंशचन्द्र जी महाप्रभु के तृतीय पुत्र श्रीहित गोपीनाथ जी के परम कृपापात्र शिष्य थे और गोस्वामी श्रीहित गोपीनाथ जी की सहज कृपा से बृन्दावन आये। श्रीबृन्दावन धाम ही इनका निवास स्थान बना। ध्रुवदास जी महाराज जीवन पर्यन्त बृन्दावन धाम में श्रीश्यामा श्याम की क्रीड़ाओं का वर्णन कर जीवन कृतार्थ करते रहे। इन्होंने ब्रज की सीमा से कभी भी पैर बाहर नहीं रक्खा। बृन्दावन वन बिहार परिक्रमा के रास्ते में अपनी कुटिया बनायी और उसीमें वास करते हुए युगल सरकार की भावनाओं में लीन रहते थे। श्रीहित गुरु कृपा के फल स्वरूप इन्हें मानसी में नित्य बिहार की लीलायें निराबरण होती थीं। परन्तु वाणी रूप में प्रस्फुटित नहीं होती थीं। श्रीजी के नित्य बिहार यशोगान करने की इच्छा दिन प्रति दिन प्रबल होती गयी। बिना वाणी श्रीप्रिया प्रियतम के विमल जस का विस्तार कैसे होय यह व्याकुलता इतनी बढ़ी कि श्रीयमुना तट स्थित गोविन्द घाट के समीप हित रास मण्डल पर तमाल लता के नीचे बिना कुछ खाये-पीये श्रीजी के ध्यान में मगन रहे और वाणी के प्रस्फुटित होने के लिये प्रार्थना करते रहे। तब तीसरे दिन अर्धरात्रि को श्रीहिताचार्य महाप्रभु जी निज Save 4 सहचरी वपु सों प्रिया प्रियतम सहित दर्शन दिये। श्रीजी ने कृपा करी और अपने कोमल चरणारविन्द के अग्रभाग का स्पर्श श्रीध्रुवदास जी के मस्तक से करा दिया। स्पर्श होते ही उनकी चेतना लौटी और कोटि कोटि दामिनी को लज्जित करने वाली रूप माधुरी के तेज से बिह्वल होकर कर जोड़ स्तब्ध से हो गये। स्वामिनी जी ने पूछी क्या चाहौ ? इन्होंने बड़े विनम्र शब्दों में प्रार्थना की यदि आपकी कृपा हो तो मेरी इच्छा युगल किशोर के निर्मल यश के विस्तार करने की है। तब श्री जी ने कृपा करी वाणी भई जू चाहत कियो, उठ सों वर जा कों सब दियौ।" वर देकर निज समाज सहित अन्तर्हित हो गयीं, तब इनके हृदय कमल में नित्य बिहार की लीलायें वाणी रूप में प्रगट हुयीं, और वो रसिकों को सुख देने के लिये लिपिबद्ध की गयीं, ताकि प्रिया प्रियतम के विमल यश का विस्तार हो सके। ध्रुवदास जी को जितनी भी निकुंज लीलायें दर्शित हुयीं वे सब हितोपासना के अन्तर्गत ही हुयीं क्योंकि सिद्धान्त को बिना जाने लीला रस की अनुभूति असम्भव है। रस ठहरेगा नहीं केवल बुद्धि बिलास के दायरे में रह जायेगा। ध्रुवदास जी महाराज इस बात को भली भंति जानते थे। इसलिये उनकी प्रत्येक लीला में सिद्धान्त का पुट स्पष्ट है। ब्रज भाषा साहित्य को काव्य सौन्दर्य की दृष्टि से समृद्ध बनाने का श्रेय, अष्टछाप के कवियों को है, तो उसे भक्ति भाव और लीला गान से परिपूर्ण करने का एकमात्र श्रेय श्रीहित राधावल्लभ सम्प्रदाय के भक्त कवियों को ही प्राप्त है। ध्रुवदास जी की रचनाओं के कई संस्करण प्रकाशित हुये। एक ही ग्रन्थ की अनेक हस्तलिखित प्रतियाँ उपलब्ध हुयीं हैं। जो इस बात को प्रमाणित करती हैं कि इनकी रचनायें पर्याप्त मात्रा में पढ़ी जाती रही हैं और अन्य वैष्णव सम्प्रदायों में भी इसका पर्याप्त आदर है। Save दर्शनीय वंदनीय मेरे गुरुवर्य स्वामी श्री हितदास जी महाराज ने अपने गुरुकृपा से हित तत्व को आत्मसात किया। अपने कठोर परिश्रम से रसोपासना से सम्बंद्धित अनेक संस्कृत और बृजभाषा के हस्तलिखित ग्रन्थों का एक विशाल संग्रह एकत्रित किया जो बहुधा अप्राप्त हो चुका था। श्री महाराज जी ने अपना अमूल्य समय रराधाबल्लभीय साहित्य के अध्ययन चिन्तन में व्यतीत किया। १९५५ में गांधी मार्ग स्थित श्रीहिताश्रम सत्संग भूमि की स्थापना कर सम्प्रदाय को हितोपासना का सुदृढ़ केन्द्र प्राप्त कराया। आपने ब्रजभाषा के ग्रन्थों का मूल एवं उनकी टीकाओं का प्रणयन-प्रकाशन कर रसिकों को अत्यंन्त सुख प्रदान किया। इसी क्रम में १९९४ में भक्तों के आग्रह पर शारीरिक अस्वस्था की परवाह ना करते हुये ब्यालीस लीला के अनुवाद करने में प्रवृत्त हुये और १९९७ वि. सं. २०५३ में इस टीका का प्रथम संकरण प्रकाशित हुआ। इस टीका की सरल व्याख्या को पढ़कर भक्त वैष्णव जन, साधक जन समस्त ग्रन्थ का मर्म सार रूप में ग्रहण कर सकते हैं। और वह माधुर्य भक्ति उज्जवल रस रसोपासना के गंभीर एवं सूक्ष्म रूप से परिचित हो सकेंगे। पूज्य महाराज श्री के उत्तरार्धकाल में ब्यालीस लीला की टीका के पहले लिखा हुआ प्राक्कथन महाराज श्री के द्वारा आत्मसात किये हुये हित तत्व का निचोड़ है। जो सभी साधकों के लिये अत्यंन्त ही उपयोगी होगा। इस ग्रन्थ की अत्यधिक मांग होने के कारण इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित किया जा रहा है। हम श्री जी से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारे हित साहित्य प्रकाशन पर इसी प्रकार कृपा करती रहें। अन्त में राधा प्रेस के संचालक श्रीव्यासनन्दन जी शर्मा एवं बंशीबल्लभ शर्मा जी का आभार प्रकट करता हूँ। जिनके सहयोग से यह ग्रन्थ समय पर प्रकाशित हो पाया। इन पर श्री जी विशेष कृपा करें यही हमारी मंगल कामना है।
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