प्रेम की पीर PDF FILE
प्रेम की पीर (भोरी सखी कृपा)
*ग्रंथकार परिचय*
श्रीभोलानाथ जी का जन्म वर्तमान मध्य प्रदेश के भेलसा नगर में संवत १६४७ के आषाढ़ कृष्ण ६ को हुआ था। भगवत मुदित जी के रसिक अनन्यमाल में गोस्वामी दामोदरवर जी (संवत १६३४-१७२४ )के शिष्य जिन रसिकदास जी का चरित्र दिया हुआ है, वे भेलसा के ही रहने वाले थे और आज भी वहां इस सम्प्रदाय के अनेक अनुयायी विद्यमान हैं।
भोलानाथ जी ने प्रारम्भ में , मैट्रिक तक शिक्षा प्राप्त की और फिर बजरंगगढ़ में अध्यापक हो गए। अध्यापन कार्य करते हुए उन्होंने इंटर और बी ए पास किया। इसी काल मे उन्होंने अखिल भारतीय रामायण प्रतियोगिता में भाग लेकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम शीर्षक निबंध लिखा और उस पर प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया।
उनकी प्रतिभा से आकृष्ट होकर छतरपुर नरेश राजा विश्वनाथ सिंह जी ने उनको अपने पास बुला लिया और वहां वह कई वर्ष राजा साहिब के धार्मिक परामर्श दाता के रूप में काम करते रहे। अधिकांश समय एकांत भजन और पदरचना और निर्दिष्ट समय पर राजा साहब के पास जाकर धार्मिक चर्चा करना ही उनका कार्य था।राजा विश्वनाथ सिंह प्राचीन ग्रंथों के संग्राहक थे
और उन्होंने राधा वल्लभीय ग्रंथों का भी अच्छा संग्रह अपने पास कर लिया था । भोलानाथ जी को छतरपुर में रहते हुए अध्ययन का बड़ा संयोग मिला और उन्होंने उस काल में वाणियों के साथ विभिन्न भारतीय दर्शनों का भी विस्तृत अनुशीलन कर लिया । वहां रहते हुए ही उन्होंने वकालत पढ़ी और कुछ दिन बाद राज्य की नोकरी छोड़कर भेलसा चले गए। भेलसा में कुछ दिन वकालत करने के बाद वे कोलारस गए और अपने भाई के पास रहकर वकालत करनी चाही।किंतु उनका मन नहीं लगा और राजा साहब के निमंत्रण पर पुनः छतरपुर चले गए। इस बीच उनके पुत्र और पत्नी का देहांत हो गया और थोड़े दिन बाद उनके पिता जी भी चल बसे।
अब उनका कोई भी ग्रहस्थिक बन्धन शेष नहीं रह गया और वे वृन्दावन आकर स्थायी रूप से निवास करने लगे। वृन्दावन में कुछ दिन तक तो इनके भाई शम्भूनाथ जी इनको खर्च भेजते रहे किंतु अल्पकाल में भाई का भी देहांत हो गया और उनसे प्राप्त होने वाली आर्थिक सहायता भी बन्द हो गयी ।
इस स्थिति में पड़कर कुछ दिनों तक भोलानाथ जी ने सेवाकुंज के बंदरों द्वारा छोड़ी हुई चने की ठुड्डीयाँ चबाकर जीवन यापन किया और शांति पूर्वक भजन करते रहे। बाद में श्रीराधावल्लभ जी के मन्दिर में उनके रहने और भोजन का प्रबंध हो गया और यहीं उन्होंने ४२ वर्ष की अल्पायु में आषाढ़ शुक्ला ६,संवत १६५९को निकुंज गमन किया।


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