google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !! इति “सिद्धान्त सुख”

!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !! इति “सिद्धान्त सुख”

!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!


( इति “सिद्धान्त सुख” )


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गतांक से आगे -

सुरंग-माल सारंग मलार। लहरि मालहू यह उरधार ॥
माला लहरि सु लूहरिवाक । अर्क बिंदु कहिये ऐराक ॥
टहल तत्परा टोडी जानों। मार मोहनी मारू मानों ॥
प्रनय प्रचुर पूरब पहिचानि । परम प्रवर परजहिं पुनि मानि ॥
तुंगविद्या के जूथ-मँझारी। ये सब अनुरागनी उचारी ॥
अरुन रंग अनुरागहि जानों। स्याम रंग सिंगारहि मानों ॥
कह्यौ प्रेम को पीत जु रंग। समुझौ जैसो जहाँ प्रसंग ॥
और अनंत भेद बहु-भाव। जिनकौ जानौं कृपा उपाव ॥
श्रीहरिप्रिया रहसि रस गाथ। जब पावैं तब आवैं हाथ ॥ ३८ ॥


************मेरी गुरु सखी रूपा श्रीहरिप्रिया जी उठीं ....अभी अन्धकार ही था .....उठते ही उन्होंने अपने लम्बे केश बाँधे .....उनके श्रीअंगों से चन्दन की सुगन्ध आरही थी ....उनके बड़े बड़े कमल जैसे नेत्र ....मुझे देखा ...मुसकुराईं ......”राधा राधा राधा” नाम का उच्चारण किया ...मैंने उठकर उनके चरणों में प्रणाम किया तो उन्होंने अपने कोमल कर मेरे सिर में रखा ।

“अब चलो, यमुना स्नान करने”.....फिर श्रीरंगदेवि सखी जी के साथ “मोहन महल” में मुझे जाना है ....श्रीहरिप्रिया जी ने मुझे कहा । मैं तैयार ही थी ...उनके पीछे चल दी ....यमुना स्नान किया ....कुछ कमलपुष्प तोड़े .....मैं देख रही थी ....कुछ हंस हंसिनी श्रीहरिप्रिया जी के साथ ही खेलने लगे थे । स्नान हो गया तो पीत साड़ी पहन कर अपने केशों को बांध श्रीहरिप्रिया जी आगे चल पड़ीं थीं ...मार्ग में पुष्प भी तोड़ते जा रहीं थीं ...पुष्पों की डलिया मैंने पकड़ रखी थी .....उन्हीं में पुष्पों को वो रख रहीं थीं ।

ये है निकुँज उपासना का सिद्धान्त ! तुम समझ ही गयी होगी ? एक मोर को बड़े प्रेम से छूते हुए हरिप्रिया जी ने मुझे कहा था । मैंने अपना सिर “हाँ” में हिलाया । यहाँ स्वसुख नही है ...यहाँ अहं नही है ...यहाँ जो भी है युगल सरकार हैं ...उन्हीं का विस्तार और विलास है । उन्हीं के रस विलास की हम सेविका हैं ....”सुख देना” यही निकुँज उपासना के सिद्धान्त ने हमें सिखाया है .....सुख लेना नही है ......सुख देना .....सुख देने की आदत डालो ....सुख जितना दोगी ...सुख मिलना ही है ...क्यों की ये युगल सरकार सुखसार हैं । सखी भाव कोई स्त्री देह की बात नही है .....ये भाव है ....स्त्री का नैसर्गिक स्वभाव सुख देना ही होता है ....उसी को लेकर ये बात कही गयी है कि सखी भाव से ही निकुँज में प्रवेश है .....क्यों की पुरुष अपना सुख खोजता है .....किन्तु स्त्री जीवन पर्यन्त दे देकर भी थकती नही है ....वो सूक्ष्म भाव स्त्री का है ....देह का नही ....उसी को सखी भाव कहा गया है .....उसी को धारण करना है । करुणा स्त्री भाव है ....दया स्त्री भाव है ....समर्पण स्त्री भाव है ....ये धारण करना ही “सखी भाव” कहलाता है । हरिप्रिया जी मुझे कितनी आत्मीयता से समझा रहीं थीं ।

इहि विधि यह सिद्धान्त सुख , महा अर्थ गम्भीर ।
कृपा करें तब ही लहैं , सुधा सरोवर सीर ।।


श्रीहरिप्रिया जी ने कहा .....यह महारस का सिद्धान्त है ....इसे बुद्धि से तो समझा नही जा सकता ....इसलिए इसके अर्थ गम्भीर है ....इसे तो वही समझ सकता है जिस पर कृपा हो ....मैंने उसी समय श्रीहरिप्रिया जी के चरण पकड़ लिए थे ....मेरे ऊपर तो आपकी कृपा हुयी है ..इसलिए मैं समझी । मेरी ओर देख कर बड़े स्नेह से हरिप्रिया जी ने फिर मेरे सिर में हाथ रखा ।

मेरे नेत्रों से प्रेमाश्रु बह चले थे .....मैं उनकी कृपा से अभिभूत थी ।

वो मुसकुराईं ......कुछ बोलीं नहीं ........अब अबोल में ही सब कुछ समझना था ।

किन्तु मैं बस यही बोल रही थी .......”श्रीहरिप्रिया स्वामिन्यै नमो नमः”

वो आगे चल दीं .......इतनी अधिकारी मैं अभी नही कि “मोहन महल” में मेरा प्रवेश हो ....किन्तु इन सखियों का संग मिल रहा है ये भी मेरे लिए कम नही था । यही एक दिन मुझे “मोहन महल”की सेवा भी दिला देंगी .....ये मेरा विश्वास था ....मुझे श्रीहरिप्रिया जी ने कहा भी है ...वो चल दीं थीं .....मैं उन्हें देखता रहा ...देखता रहा .......

निकुँज के पक्षी लता वृक्ष आदि सब मुझे कहने लगे थे ........

“दुल्लभ हूँ तें दुल्लभ जु , सो सुल्लभ भई तोहि ।
हित चित हिय नहिं धरहिं तौ , अहित इष्ट ते होहि ।।”


ये रस बड़ा दुर्लभ है , तुम्हें सुलभ हो गया .....अब प्रेम से हृदय में सम्भाल कर रखना ...नही तो युगल सरकार से दूर हो जाओगी । ये बात मैंने गाँठ बाँध ली है ।

हे रसिकों ! क्षमा करेंगे मेरी इस धृष्टता पर ....कि इस “महारस समुद्र श्रीमहावाणी” पर लेखनी मैंने चलाई । किन्तु क्या करूँ ...मुझे श्रीहरिप्रिया जी की प्रेरणा हुई थी ।

एक बार फिर मैंने इस मन्त्र को दोहराया .....श्रीहरिप्रियास्वामिन्यै नमो नमः

Hari sharan

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