google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !! “सिद्धान्त सुख” - 82

!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !! “सिद्धान्त सुख” - 82

 !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!


( “सिद्धान्त सुख”- 82 )

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गतांक से आगे -

रत्नकला सो रामकली पुनि। ललितानना ललित रागनि गुनि ॥
विस्वाभा विभास कहिये कल। अरु बिलास आवलि जु बिलावल ॥
आनन्दा आसावरि जानहु । सुरंग अंग सारंगहि मानहु ॥
गौरमुखी गौरी को जान। केलिकौमुदी कहि कल्यान ॥
कर्नकांतिका सो कान्हरौ । ओर कहूँ जोजिय उर में धरौ ॥
अलबेलि केलि अड़ानो कहिये। विचित्र सोभा बिहागरौ लहिये ॥
कंद्रपकामा कहि केदारौ । खंजनाक्षि खंभायचि धारौ ॥
सुष्टसुंदरी सोरठ सोई। बैजयंति बसंत है जोई ॥
किसोर सुंदरी काफी सोहै। धनिभागा जु धनासिरी जोहै ॥
जयति सोभना जयति सिरी पुनि। आनँद सिंधुन आसासिंधुनि ॥
चित्रमुखी सो गौरी चैती। मुक्त-माल मलार समझती ॥


*************हे रसिकों ! श्रीमहावाणी का सिद्धान्त है द्वैताद्वैत । द्वैत और अद्वैत ये दोनों वाद हैं ...और दोनों वाद ही मान्य हैं ...प्रामाणिक हैं । द्वैत को वेद ने भी स्वीकार किया है और अद्वैत को भी वेद ने मान्यता दी है ....किन्तु एक एक आचार्यों ने एक वाद को ही पकड़ कर अपना सिद्धान्त रखा....किसी ने द्वैतवाद को पकड़ा तो किसी ने अद्वैत को । मेरा एक बड़ा सुखद अनुभव रहा कि इस रसोपासना को द्वैतवादी तो मानते ही हैं ....क्यों की द्वैत यहाँ श्रीराधा कृष्ण हैं ....किन्तु अद्वैतवादी भी इसका बड़ा आदर करते हैं ....उनका कहना है कि निभृत निकुँज में दो कहाँ हैं ...वहाँ तो एक ही हैं ....वहाँ ना श्रीराधा हैं न श्रीकृष्ण - बस रस तत्व है । स्वामी श्रीकरपात्री जी महाराज श्रीवृन्दावन में जब आते थे ...तब वो श्रीमहावाणी जी के पद विशेष सुनते थे । सिद्धान्त है श्रीमहावाणी का ...द्वैताद्वैत । श्रीराधा और श्रीकृष्ण दो हुए ....फिर उन्हीं का विस्तार होता है लीला रस के लिए ....सखियाँ आदि । किन्तु अद्वैत घट जाता है निभृत निकुँज में ....जहाँ श्रीराधा विलीन हो जातीं हैं श्रीकृष्ण में और श्रीकृष्ण विलीन हो जाते हैं श्रीराधा में ..इन दोनों में विलीन हो जाती हैं समस्त सखियाँ ....फिर रह क्या जाता है ? मैंने कहा ...बस - रस । रस का ही सारा खेल है जी ! सब कुछ रस ही है ।

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श्रीहरिप्रिया जी कहती हैं ....यहाँ काल ही नही ...काल में भिन्न भिन्न रसाभिव्यक्ति के लिए जिन जिन रागों का प्रयोग किया जाता है ...वो राग युगल सरकार ही हैं ...हाँ - सखियाँ के कण्ठ में बस जाते हैं युगल सरकार ही ....फिर रस की अभिव्यक्ति होती है । श्रीहरिप्रिया जी कहती हैं ...जब आनन्द आता है तो व्यक्ति गाता है ....गायन आनन्द की अभिव्यक्ति ही तो है । अब गायन में विशेष काल है ...तो उस विशेष काल में विशेष राग है ....हर काल के अपने राग हैं ....वो राग , वो स्वर भी युगल सरकार ही हैं....हरिप्रिया जी बताती हैं । सुभरव , जो अनुराग को भरकर कण्ठ से प्रकट होता है ...उसी को राग भैरव कहते हैं । दिवि गन्धा , जो कण्ठ से प्रकट स्वर से एक सुगन्ध सी कान में प्रवेश करती है ...उसे ही कहते हैं ....राग देव गंधार । रत्नकला को रामकली राग के नाम से जाना जाता है ...तथा ललितमाधुर्य जब फैलता है सखियों के कण्ठ से तो वही युगल सरकार ललित राग बनकर निकुँज में फैल जाते हैं । विश्वाभा को ही विभास राग जानना ...आनन्द भी जब मत्त हो जाता है ...तब उसे आसावरी राग कहा जाता है । गौरमुखी सखी के मुख से जब आनन्द की एक विशेष दशा में जो स्वर प्रकट होते हैं उसे राग गौरी कहा गया है ।

हरिप्रिया जी ने जब मुझे देखा कि ये समझ नही पा रही है ...तो उन्होंने मुझे समझाया । जहाँ उत्सव ही धर्म है ...आनन्द ही जहाँ की जाति है .....सखी भाव ही जहाँ का उत्साह है ....वहाँ तो स्वर होंगे ही ....स्वर हैं तो राग है .....बिना स्वर-राग के उत्सव आनन्द सम्भव नही है । ये बात अब मुझे सच्ची लगी .....कि जब कोई आनन्द की एक विशेष स्थिति में होता है तब उसके कण्ठ से गुनगुनाहट निकलती ही है । वही सुरीले कण्ठ से निकले , वही गुनगुनाहट फिर राग के रूप में बाहर आती है । प्रेम में संगीत का अपना स्थान है ....प्रेम हो तो स्वर अपने आप प्रकट होते हैं ...प्रेम गायन सिखा देता है .....गायन क्या प्रेम सब कुछ सिखा देता है ।

इसके बाद हरिप्रिया जी एक एक राग का नाम लेकर उसे सखी नाम से जोड़ते हुए बताने लगीं थीं ।

अब शेष कल -
Hari sharan

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