श्रीमहावाणी का सिद्धांत सुख
!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !! “सिद्धान्त सुख” - 81
!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” - 81 )*********************************
गतांक से आगे -
भर बरसैं सरसैं सब मही। भादों कृष्ण रोहनी कही ॥
बढ़ि-बढ़ि बीच विवसता पावें । सोई अर्ध-निसा जु कहावें ॥ताहू में जो अति रति भासै । सो सुकला अरुनोदय आसै ॥
सब रस दै राखत पिय-मान। तासों कहियतु है रस-दान ॥
कुसुमनि करि करि क्रीडत साँझ । सौ समुझौ साँझी मन माँझ ॥
कंद्रप कोटि बिजै बिबि करहीं। दसमी बिजै ताहि उच्चरहीं ।॥
सुभग भूमि मंडल पर बास। ताहि जु कहिये रति-रस रास ॥
प्रथम समागम रंग रमावैं । सो बिहार बिधि व्याह कहावैं ॥
अमित कला बिहरै पिय-प्यारी । तासों कहिये निसा-दिवारी ॥
क्रीड़ा करत सकुच जो होई । कही केलि की कुंदी सोई ॥
सुभरव भैरव राग उचार। दिविगंधा है देव गंधार ॥
*******हे रसिकों ! मेरा तो कहना ये है कि श्रीमहावाणी जिसे जानना हो ...या इस रस-उपासना पद्धति को अपनाना हो ...उन्हें “सेवा सुख” ( श्रीमहावाणी का प्रथम सुख ) ही मात्र नही उन्हें ये अन्तिम सुख “सिद्धान्त सुख” का भी नित्य पाठ करना चाहिए ..उसमें भी ये अन्तिम पद....
“महावाणी रस रत्न को , भर्यो गहर दृढ़ गेह । ताके ताले खुलन की , कहूँ तालिका ऐह ।।”
इस पद का गम्भीरता से अवलोकन करना चाहिए । या किसी रसिक से समझना चाहिए । क्यों की रस सिद्धान्त को इसमें बड़ी सुन्दरता से स्पष्ट किया गया है । मैं स्वयं अभिभूत हूँ ।
मेरा तो ये भी मानना है कि “सिद्धान्त सुख” को जाने बिना श्रीमहावाणी एक शृंगार रस का महाकाव्य मात्र बनकर रह जाएगी ....साधकों के लिए इसकी कोई विशेष उपयोगिता नही होगी ....इसको ऐसे समझिये ...जैसे श्रीभागवत में एकादश स्कन्ध को जाने बिना भागवत धर्म को आप समझ नही सकते .....श्रीरामचरित मानस में उत्तर काण्ड को पढ़े बिना आप मानस के सिद्धान्त को समझ नही सकते ऐसे ही इस रस महाकाव्य को जीवन की साधना बनानी है तो आपको “सिद्धान्त सुख”...को पढ़ना परमावश्यक है ...तभी रस मंजूषा खुलेगी ...और आप इस रसतत्व को आप समझ सकेंगे ।
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घनघोर रस की वर्षा हुई तो अवनी भींज गयी ....अब अवनी तो मैंने पूर्व में बता ही दिया है कि श्रीप्रिया जी का मंगल विग्रह ही अवनी है ....हरिप्रिया जी कहती हैं ...रति सुख में जब निकुँज की पूरी पृथ्वी भींज जाती है ...यानि श्रीप्रिया जी का मंगलविग्रह भींज जाता है .....तो उसे ही कहते हैं ...”भदौ शुक्ला रोहिणी”। इस काल में युगल सरकार पूरे ही रस में भीज जाते हैं ...और भींजे ही रहते हैं । इस काल में प्रिया जी भी पूरी तरह से अपने लाल जी को रस दान करती हैं ....और इस समय लाल जी की उन्मत्तता देखते ही बनती है । हरिप्रिया जी ये कहते हुए परमानन्द में निमग्न हैं । लाल जी प्रिया जी के सुन्दर अंगों रूपी कुसुम का अपने नयनों से चयन करके मत्त हो जाते ..इसे ही “सांझी” कहा गया है । ( साँझी एक उत्सव है , जो पितर पक्ष में फूलों की रंगोली के रूप में मनाया जाता है ) हरिप्रिया जी रसमय होकर आगे कहती हैं .....सुरत संग्राम चलता है युगल सरकार और कामदेव में ....बेचारा कामदेव ....हार ही जाता है ...तब युगल सरकार विजयी होते हैं उसे ही “विजया दशमी”कहते हैं । रहस्यमय सुन्दर मण्डल पर युगल सरकार जब विराजते हैं ...उसे ही रासमण्डल कहा जाता है ...जहाँ रास नृत्य का रस चारों ओर बिखर जाता है ।
हरिप्रिया जी के हाथों में मेहंदी लग गयी है ....पाँवों में महावर .....वो एकाएक फूली फूली लग रही हैं ...मैंने उनसे पूछा क्या हुआ ? तो बोलीं ...युगल सरकार का ब्याहुला । हरिप्रिया जी मेरे कुछ कहने से पहले ही बोलीं ....श्रीराधा कृष्ण ब्याह एक रस रहस्य है इसे सब कहाँ जानें ।
ये अनादि दम्पति हैं ...इनका क्या विवाह ? किन्तु जब ये मिलते हैं और इन्हें प्रथम मिलन जैसा अपार सुख मिलता है उसे ही ब्याहुला कहते हैं । इसके बाद अनन्त कला से सम्पन्न होकर ...जब ये दोनों सुकुमार रात्रि में उन्मत्त विहार करते हैं ...उसे ही कहा गया है ....दिवाली । इनके अंगों की आभा से पूरा निकुँज जगमग कर उठता है ...वही तो दिवाली है ।
“आजु दिवाली की निशि नीकी”......
हरिप्रिया जी अपने मधुर कण्ठ से गान करती हैं ।
निकुँज जगमगा उठा था उस समय .......
शेष अब कल -
Hari sharan
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