श्रीमहावाणी का सिद्धांत सुख
!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !! “सिद्धान्त सुख” - 80
!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” - 80 )
***********************************
गतांक से आगे -
फूल गुलाबी जो यह कह्यौ । सो समुझौ प्रीतम डहडह्यौ ॥
मिलि सब तीय जुगल सनमानें। सोई पहली तीज बखानें ॥
चरन खंभ डांडी कर चार । सुरत रंग हिंडोर-बिहार ।।
सावन श्रावन सुकल सुहावन । एकदसी कही सो पावन ॥
जिहिं सुख में बहु गुन बिसतार। पिय-प्यारी करि राखें हार ।।
रँग्यौ महारस में है जोई। कह्यौ पवित्रा पचरंग सोई ॥
फौंदा जरी कह्यौ है चोज । जा करि ओपैं उर अंभोज ॥
रति-बिहार राखें विरमाय । सोई राखी नाम कहाय ॥
जिहिं सुख करि पुरवें मनकाम। सोई सलून्यों पून्यों नाम ॥
बिन व्रीड़ा क्रीड़ावें, तीजै। तीज पाछिली सो सुनि लीजै ॥
मिलि सब सखी जननगुन गावें। रिझ-रिझ रीझ परसपर पावें ॥
बिपुल पुलक अँग अंग न माई। तिहिं कहियतु हैं रहसि बधाई ॥
घुरि-घुरि अनँग रंग बरसावें । बरसि गाँठि सोई दरसावें ॥
************हे रसिकों ! रस में निमग्न होना है ...तो जीवन रसमय बनाना होगा ....सब कुछ रसीले प्रियतम के लिए ...प्रियतम ही सब कुछ । इस का अनुभव मैंने किया ....मेरे पागलबाबा राखी उत्सव भी मनाते हैं तो युगल को ही राखी बाँधते हैं ...विजया दशमी मनाते हैं ...तो युगलसरकार को तिलक करके उन्हीं का राज्याभिषेक करते हैं । अनन्यता ऐसे ही नही आती ...और बिना अनन्य के प्रेम कहाँ ? प्रेम राज्य की तो पहली शर्त ही यही है ...कि सब कुछ अपने प्रियतम , हर उत्सव प्रियतम, हर उत्साह प्रियतम , हर काल प्रियतम , हर वस्तु प्रियतम .....प्रियतम के सिवा और कुछ नही । हाँ , उस दिन रक्षाबन्धन था ...पागलबाबा के पास प्रातः मैं गया था तो मुझे देखकर वो बोले ....चलो , पण्डित जी ! युगल सरकार को तुम ही राखी बाँध दो । साधना तब तक सफल नही होगी ...जब तक आप अपने आराध्य के प्रति पूर्ण समर्पित नही होंगे । और एक बात कहूँ ....अनन्यता कहने से नही आती ....ये सहज है ....प्रियतम के प्रति प्रेम होगा तो अनन्यता लानी नही पड़ेगी ...अनन्यता की चादर ज़बरदस्ती ओढ़नी नही पड़ेगी ....वो आएगी । क्या आप किसी से प्रेम करते हैं तो नियम पूछते हैं ? क्या आप ये पूछते हैं कि अब प्रेम हो गया ....हम तुम्हारे सिवाय किसी को देखें कि नही ? और वो प्रियतम कह दे ...देखो , तुम पूछो औरों को मानें की नहीं ? प्रियतम कहें - औरों को भी मानों ....और तुम कहो ...कि मेरे प्रियतम ने कह दिया है हम तो देखेंगे .....और तुम ख़ुशी ख़ुशी देखो , दूसरे से भी बतियाओ .....तो ये प्रेम नही हुआ । चाहे प्रियतम कहे ....तो भी प्रियतम के सिवा औरों से बतियाया ही नही जाएगा ....चाहे प्रियतम लाख कहे ...औरों के विषय में भी सोचो ....तुम्हारा प्रेम होगा तो दूसरे के बारे में सोच ही नही पाओगे ।
ये बात तो हुयी सामान्य प्रेम की ...किन्तु यहाँ तो प्रेम का पारा उच्चतम है ...सखी भाव को सर्वोत्तम , सर्वोच्च भाव की संज्ञा दी गयी है ...यहाँ तो उत्सव , उत्साह सब कुछ “तुमही” से है ।
******************************************************
श्रीहरिप्रिया सखी जी आनन्दरस में मत्त होकर मुझे काल ( समय ) भी युगल का ही रूप बता रही हैं ....काल भी तो युगल सरकार ही हैं .....बात सावन मास तक पहुँची थी तो हरिप्रिया जी कहती हैं ...युगलवर हिंडोरे में झूल रहे हैं ....झूलते झूलते ये एक दूसरे से लिपट जाते हैं ....और झोंटा सखियाँ दे रही हैं ....प्रिया जी जोर से दिए गये झोंटा के कारण डर जाती हैं अपने प्रियतम से लिपट जाती हैं .....उस समय सखियों को ऐसा लगता है ....ये दो नही है एक हैं ....बस...”सावन शुक्ल पवित्रा एकादशी” यही है । मैंने हरिप्रिया जी से कहा ...एकादशी का मतलब एक नही होता ग्यारह होता है ....मेरी धृष्टता पर वो हंसीं .....मुझे प्रेम से समझाते हुए बोलीं ....गणित में एक और एक ‘दो’ होते हैं , युद्ध के मैदान में एक और एक ‘ग्यारह’ होते हैं ....किन्तु प्रेम राज्य में एक और एक, ‘एक’ ही होते हैं .....मैंने तुरन्त उनके आगे अपना सिर झुका दिया था । पवित्रा एकादशी जो सावन शुक्ल में पड़ती है ...उसमें युगल सरकार पवित्रा धारण करते हैं ...ये पवित्रा राखी की तरह होता है ...जिसमें रेशम का फुन्दा लगा होता है .....हरिप्रिया जी हंसती हैं ....निरावरण प्रिया जी का वक्ष जो कुच कमल है ...वही लाल जी की पवित्रा है । लाल जी अपने बाहों में भर लेते हैं ...और रसमग्न हो जाते हैं । इसके बाद पूर्णिमा आती है ....इसी दिन लाल जी की मनोरथ पूर्ण होती है ....राखी , सुरत विहार में अपनी प्रिया को हृदय में रखना ....नयनों में रखना , अंग अंगों में रखना ही ....”राखी” कहलाती है । हरिप्रिया जी रस में डूबी हुयी हैं ....उनकी आँखें मत्त हैं ...उनकी बोली मत्त है .....क्यों न हो ...ऐसे अगाध रस सिन्धु के डूबन का अनुभव बताना , ये साधारण कार्य तो है नही । प्रिया जी ने अब संकोच त्याग दिया है ....वो प्रियतम को रस पिलाती हैं ...इसे ही ‘पिछली तीज’ कहा गया है । हरिप्रिया जी यहाँ मुझे एक रहस्य की बात बताती हैं ....ये जो पिछली तीज है इसमें हम प्रिया जी को नाच गाकर रिझाती हैं तो प्रिया जी हमें उपहार देती हैं । और सुनो .....सुरत विहार के समय अंग अंगों में जो पुलक उदित होता है ....वही बधाई है ....और युगल मिलकर जब प्रेम जन्य काम रंग का उत्साह बढ़ाते हैं तो उसी को ‘वर्ष गाँठ’ कहते हैं ...हरिप्रिया जी मधुर स्वर में गाने लगीं थीं ...”वर्ष गाँठ मोहन की सजनी सब मिल मंगल गाओ”....बधाई हो ...बधाई हो ....ये बधाई पूरे निकुँज में गूंज उठी थी । लाल जी की बधाई ।
शेष अब कल -
Hari sharan
Post a Comment
0 Comments
Feel Free To Massage Us