श्रीमहावाणी का सिद्धांत सुख
!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !! “सिद्धान्त सुख” - 79
!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” - 79 )
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गतांक से आगे -
रहसि अँग-अंग प्रति सीवाँ सोई। थल अरु बिथल जानिये जोई ॥
पग रोपन सोई बंस बसन पन। जीति निसान बजैबौ जै रन ॥
रंग भरें मुख सों अंग चूमें। बूका बरन कह्यौ है जू में ॥
संबोधन दै बरनत जोरी। ताकी संज्ञा कहियत होरी ॥
फूल-फूल मिलि बिहरें जोर। जाहि कहत हैं फूल हिंडोर ॥
जिहि सुख तें सीतलता लहें। चंदन सिंगारहि तिहिं कहें ॥
सुरत समुद्र न्हवावति जोई। जल-बिहार कहवावति सोई ॥
मंजु-मनोरथ में पधरावें। सो रथ आरोहन जु कहावें ॥
बहु-रस बरसें लहरि लड़ावें। सो वरषा-रितु नाम कहावें ॥
*******हे रसिकों ! जो वर्णन किया जा रहा है ...इसको समझना इतना आसान नही है ...मात्र भाषा ज्ञान से इसे नही समझा जा सकता ....इसे समझने के लिए रसिकों की संगति आवश्यक है ....वह रसिक जिन्होंने इसे एकान्त में गाया है ....अपने युगलवर को रिझाने के लिए गाया है ...गाते हुए उस भाव का अपने हृदय की गहराई में अनुभव किया है ....सखीभाव से भावित चित्त में ही ये अनुभव आसकता है ...अन्यथा नही । स्थान - युगल सरकार । वस्तु - युगलसरकार । काल यानि समय - युगल सरकार । कौन ज्ञानी ऐसा है जो इस तरह सर्वत्र अपने ब्रह्म का अनुभव करे ! सच्ची ज्ञानी तो यही सखियाँ ही दिखाई देती हैं ....जिन्हें सर्वत्र और सर्वदा युगलतत्व का दर्शन हो रहा है ......हे रसिकों ! हमें इसी स्थिति में पहुँचना है .....हमारा लक्ष्य यही है कि ....सर्वत्र उन्हीं की सत्ता , उन्हीं का रूप , बस उन्हीं उन्हीं को देखना .....तुम देखना आरम्भ तो करो ....वो तो दीख ही जायेंगे ....क्यों की वृक्ष पुष्प आदि तो मिथ्या हैं किन्तु उसमें युगलसरकार तो सत्य हैं ना । बस ये श्रीमहावाणी उसी सत्य का , कहूँ तो परम सत्य का दर्शन करा रही है .....कीजिए दर्शन ।
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श्रीहरिप्रिया जी आनन्दमूर्ति हैं ...इनका अंग अंग आनन्द से भरा है, या कहूँ आनन्द तत्व से ही इनका देह बना है .....तभी तो रोम रोम से आनन्द झर रहा है ....ये कितनी रसोन्मत्त हो गयीं हैं ......उसी रस की उन्मत्त दशा में हरिप्रिया जी कहती हैं ....अरी ! ये जो थल और विथल है ना ....यही इन युगल के अंगों की सीमा है ......रंग भरे मुख से मुख को चूमना ....यही बूका बंदन है ....( होली में लाल रंग ) हरिप्रिया जी कहती हैं .....होली ...होली ...जो ये शब्द हैं ना ...ये सम्बोधन है .....लाल जी प्रिया जी से कह रहे हैं ...मैं तेरी हो ली ...तो प्रिया जी लाल जी से कह रही हैं ....हाँ , मैं भी ...हो ली ।
अब यहाँ से होली के बाद “फूल डोल” होता है ....होली की थकान उतारने के लिए फूलों के सिंहासन में दोनों विराजते हैं ....हरिप्रिया जी कहती हैं .....फूल फूल कर वनों में युगल जब विहार करते हैं ...तो उसे ही “फूल डोल” कहा जाता है । अब गर्मी आ रही है ...चन्दन का शृंगार होगा ....हरिप्रिया जी कहती हैं ....जिस विहार से इन दोनों को शीतलता मिलती है उसे ही कहते हैं चन्दन शृंगार । अरी ! सुरत समुद्र में जब ये दोनों डूबते और उबरते हैं वही तो जल विहार है ....फिर सखी जन लीला विस्तार में युगल को प्रेरित करती हैं ....वही रथयात्रा है ।
फिर इसके बाद वर्षा ऋतु आगयी ......हरिप्रिया जी बोलीं ...युगल सरकार प्रेम की अद्भुत वर्षा करते हैं ...और सखियाँ मल्हार गाती हैं ...वही वर्षा काल है । इसके बाद हरिप्रिया जी आनन्द में उछलती हुयी कहती हैं ....हम सब सखियाँ युगल सरकार का विशेष आदर करती हैं ...हमारा विशेष आदर करना ही “हरियाली तीज” है । मैं क्या कहूँ ! युगल के चरण खम्भ हैं ....हाथ डांडी हैं ....जिसमें झूला लगता है ....और सुरत सुख ही “सुरंग हिंडोला” है ..इसी में ये झूलते हैं ...यही हैं झूला भी और झूलने वाले भी ....ये कहते हुए हरिप्रिया जी खूब हंसती हैं ...खूब हंसती हैं । इनकी हंसीं में पूरा निकुँज सम्मिलित हो जाता है ।
शेष अब कल -
Hari sharan
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