श्रीमहावाणी का सिद्धांत सुख
!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !! “सिद्धान्त सुख” - 78
!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” - 78 )
*********************************गतांक से आगे -
मदन रंग मद मृगमद जोहै। जखि कर्दम सौभग रस सोहै ॥
अतर अरगजा और अगरसत । उमँग उलास अनँग रँग बरसत ॥
कुटिल कटाछि छुटत पिचकारी। भरी रहसि रंगन सों भारी ॥
बिबिध भाँति के बाजे बाजें। सो अँग-अंग भूषन सुर साजें ॥
लसनि हँसनि में द्विज दुति जोई। अबीर गुलाल कही है सोई ॥
अति चित चाव सोई चोवा सुनि । सुख संगम सोधौं गुनिये पुनि ॥
कर पद बर अंसन पर ढाल । सोई कही कमल की माल ॥
बीरी कल कपोल रस चाखें । ताही की यह संज्ञा भाखें ॥
अधर राग बंदन छबि पावें । सुमन सनेह फुलेल कहावें ॥
रोरी तिलक अछित मुकतन के। जानि सुलगनि मनोरथ मन के ॥
भाल कह्यौ तन लाल बालकौ। सब सुख दायक सखिन जालकौ ।।
सुखदासन सौं कहिये बेदी। जानत हैं जिय में जे भेदी ॥
खेलत में चंचलता जोई। चाँचरि नाम कहावैं सोई ॥
झूमि-झूमि अलि झूम करावें। सोई झूमक नाम कहावें ॥
रहसि-रंग रति-रस में सानें। सोई कहिये बसन सहानें ॥
********अद्भुत था ही सब कुछ किन्तु मेरे देखते ही देखते बसन्त छा गया था निकुँज में ...वैसे अनुभव ये है कि निकुँज में दो ही ऋतुओं की प्रधानता देखी गयी है ....या तो शरद या बसन्त । हरिप्रिया जी का रसोन्मत्त होकर ये कहना कि युगल सरकार का खिलता यौवन ही ऋतु बसन्त है ....बस ..निकुँज में बसन्त की वयार चल पड़ी थी । “ओह ! तो सखियाँ ही ऋतुएँ बुलाती हैं “ मेरा ये कहना ही था कि हरिप्रिया जी तुरन्त बोल उठीं ...सखी ही ऋतु बसन्त है...और बसन्त ही नही समस्त ऋतुयें ही सखियाँ हैं । मैं इसके बाद कुछ नही बोला ।
सुनो अब - निज सुख विलास में जब युगल सरकार उतरते हैं ....तब ये कस्तूरी की सुगन्ध निकुँज में फैलने लगती है ...उन्मत्त काम विलास ही चन्दन कुमकुमा है और केसर की कीच है ...जिससे ये परस्पर होली खेलते हैं । सुगन्धित लेप कुटिल कटाक्ष हैं प्रिया जी के । और उन्मत्त होकर प्रिया जी का लाल जी को आलिंगन करना ही रंग से भरी पिचकारी है ...जिसे तक के मारती हैं अपने प्रियतम के ऊपर । हरिप्रिया जी की रसोन्मत्तता देखते ही बनती है ....कामदेव अपने आयुधों के सहित आचुका है ..प्रिया जी के अंगों में विविध आभूषण जब बजने लगते हैं ...ये कामदेव के आने की सूचना है ..दुंदुभी हैं । प्रिया जी लाल जी को देखकर जब हंसती हैं ...उनके अधर भी मुस्कुराते हैं और नयन भी , यही अबीर और गुलाल हैं ।
हरिप्रिया हंसती हैं ....जोर से आनन्दमग्न होकर हंसती हैं ...कहती हैं .....युगल सरकार के चित्त में जो मिलन की तीव्र इच्छा है ....वो सुगन्धित चोवा है । लाल जी के करकमल जब प्रिया जी के चरण कमल पर झुकते हैं वो सच में कमल की दिव्य माला है । लाल कपोल प्रिया जी के , यही लाल जी के लिए बीरी पान हैं ....और इनका जो उज्ज्वल प्रेम है वो फुलेल है .....जिससे पूरा निकुँज क्या पूरा ब्रह्माण्ड ही महक रहा है । लाल जी के प्रति सुन्दर लगन ...जो प्रिया जी के हिय में बसा है ....उसे ही रोरी का तिलक कहते हैं ...हरिप्रिया मुस्कुराती ही जा रही हैं ....मन में विविध मनोरथ जो प्रिया जी के उदित हो रहा है ...वो अक्षत है , मोतियों का अक्षत जो रोरी के तिलक में लगाया गया है । हरिप्रिया जी कहती हैं ...जो तेज दिखाई दे रहा है ना ! वो युगल के अंग हैं .....जो हम सखियों को सर्व सुख देने वाला है । रति सुख आसन को यज्ञ वेदी कहा है ....यहाँ हरिप्रिया कहती हैं - इस रहस्य को रसभेदी ही जानते हैं यानि रसिक ही जान सकते हैं ....हरिप्रिया जी आगे कहती हैं ...रति केलि की चंचलता को ही चाँचरि कहते हैं ...जो होली का एक विशेष अंग है होली के उत्साह में खेला जाता है । प्रिया जी के कानों में जो झुमका है ना ! वो रतिरस के कारण अंग अंग जब झूमने लगता है....अजी ! उसी को झुमका कहते हैं ।
हरिप्रिया जी रसमत्त हो गयी हैं ....वो नाचने लगती हैं ....”श्यामा जू खेलत रंग भरी ....श्यामा जू”।
आनन्द ही छा गया था , अजी ! छा गया था चारों ओर आनन्द , अवर्णनीय था ये सब ।
शेष अब कल -
Hari sharan
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