google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !! “सिद्धान्त सुख”- 77

!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !! “सिद्धान्त सुख”- 77

 !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” - 77 )


**********************************

गतांक से आगे -

निज तन सुभग रतनमनि कहिये। कमल निकुंज कमल हू लहिये ॥
रतिपति-भवनहु कहिये जाही। और भेद बहु भाँति जु ताही ॥
महली जन मुखतें सुनि पइयें। सो-सो सब हियरें धरि लइयें ॥
मन केवर केसरि रति रंग। सुबरन हूँ जो जहाँ प्रसंग ॥
बिबिध वृक्ष अँग-अंग कहावें । छबि की लता लपटि छबि पावें ॥
और तरु लता अमित अपार । अँग सँग में सबको अधिकार ॥
मर्कत मनि कंचन घन दामिनि । सो पिय प्यारी तन संज्ञा गनि ॥
तथा तमाल कनक की वेली। रति अनंग रस रंग सहेली ॥
आनँद अहलादनि पिय-प्यारी। सुरति सोई सुंदरि सहचारी ॥
सुभग भूमि मग में अनुसरहीं। तिहि अँग की पग संज्ञा धरहीं ॥
निकट नितंबन के निज डोरि । कहियें ताहि साँकरी खोरि ॥
ठौर-ठौर निर्मल जल आसै । सो अँग-अंग प्रति पानिप भासै ॥
सुख ही करि पावत रस रेली। ताहि सोहिलो कहत सहेली ॥
जामधि सौरभ सकल लसंत । ताकी संज्ञा कही बसंत ॥
जोवन मौर वेग जव नाम । रितु बसंत बिलसें बर बाम ॥
साख जवादि कुमकुमा जोई । ततसुख सुख सुरंग सुनि सोई ॥
घनबिहार सोई घनसार । जिंहि सुख माँचै मार अपार ॥


*********करो चिन्तन ! करो ध्यान .....ये जो श्रीवन में रत्नों की जोती जगमगा रही है ना ! ये युगल सरकार के अंगों में जो काम रस उद्दीप्त होता है ...ये वही जोत है .....उसी की जगमगाहट है .....श्रीहरिप्रिया जी रसमत्त होकर बताने लगीं थीं । करो ध्यान , करो चिन्तन .....निकुँज की अवनी , यमुना के घाटों में जो मणियाँ जगमगा रहीं हैं ये युगल अंगों में प्रदीप्त काम है ....इसमें भी कमल कुँजों में जो कमल खिले हैं वो काम से खिले अंग हैं । ( यहाँ काम से सांसारिक काम वासना नही लगाना है ..ये काम भी चिन्मय है ....या प्रेम को ही काम कहा गया है )

हरिप्रिया जी आगे कहती हैं ...सुगन्ध ले रहे हो ? मैंने पूछा ....ये अद्भुत सुगन्ध किसका है ? हरिप्रिया जी हंसते हुए बोलीं ...केवड़े का । फिर कहती हैं ....ये केवड़े की सुगन्ध ही हमारे युगल सरकार का मन है ....कितना सुगन्धित मन है ....जो अपनी सुगन्ध चारों ओर फैला रहा है ।

तभी आगे स्वर्ण की आभा दीखी ....तो उसके पास ही केसर का अद्भुत रंग ......हरिप्रिया जी बोलीं .....ये दोनों मिलकर रति रंग हैं ....स्वर्ण रति है ....और उस रति की उन्मुक्त केलि केसर है .....क्या रंग खिला है .....खिलता है ...जब इन दोनों की रति केलि होती है ...तब रंग बरसता है ...तब लगता है ...केसर खिला है ....उसका वो रंग ....अपनी छटा बिखेरता है । और ये छोटे छोटे वृक्ष देख रहे हो ....हरिप्रिया जी बोलीं ....ये अंग प्रत्यंग हैं लाल जी के ...और इनमें जो लता लिपटी है ....वो प्रिया जी की अद्भुत छबि है । अब आगे चलो .....हरिप्रिया जी ने आनन्द की अतिरेकता में मेरा हाथ पकड़ा और मुझे ले चलीं .....ये देखो अब ......ये मर्कत मणि और सुवर्ण एक साथ चमक रहे हैं .....ये हमारे युगल सरकार हैं ....और ये देखो ...आकाश दिखाने लगीं ...बादल हैं और बादलों में कभी कभी बिजली चमक उठती है ...ये दोनों प्रिया लाल हैं ....ये तमाल का वृक्ष है और कनक बेलि लता इसमें लिपटी है ये प्रिया लाल हैं । हरिप्रिया जी आज बस आनन्द अतिरेकता में बोलती जा रही हैं ...ये रस विभोर हैं । वो निकुँज की वीथिन में चल रहीं हैं .....कहीं कहीं अत्यन्त कोमल अवनी पड़ती है ...तो वहाँ हरिप्रिया जी रुक जाती हैं ...कहती हैं ये युगल सरकार के विशेष अंग हैं ....सौभाग्य पूर्ण तथा सुकोमल अंग । आगे एक सँकरी गली पड़ती है .....दोनों ओर पर्वत हैं ....मध्य से मार्ग निकला है । हरिप्रिया कहती हैं ....ये कटि है ...प्रिया जी की कृश कटि , पतली कमर को ही साँकरी खोर कहते हैं । और ये जो देख रहे हो ना ...जगह जगह में सरोवर , निर्मल जल से भरे सरोवर ...ये विशेष प्रिया जी के अंगों की शोभा है ...अंग हैं .....जिनमें हंस बनकर लाल जी विहार करते रहते हैं । तभी उन्मत्त होकर निकुँज की एक विशेष दिशा से सोहिलो की उन्मत्तता प्रकट हुयी तो हरिप्रिया जी बोलीं ...ये सहज सोहिलो ( एक अत्यन्त सुहावन मनस्थिति में उत्पन्न होने वाला सहज संगीत ) जो है ना ...ये युगल सरकार के अतिसुख के आवेश में जो रसाक्रमण होता है ...वही सोहिलो कहलाता है ....फिर एक आनन्द की बात ओर सुनो ...हरिप्रिया जी आनन्द में उछलती हुयी बोलीं .....सोहिलो से ही सहेली उत्पन्न होती है ....ये अद्भुत बात कही है ...सहेली से सोहिलो नही ...सोहिलो से सहेली का जन्म होता है ...फिर उस सहेली से प्रिया जी अपने हृदय की बात बताती हैं । सोहिलो से युगल सरकार के अंगों में केसर प्रवाहित होने लगता है ...जब केसर की सुगन्ध फैलने लगती है ...हरिप्रिया जी ताली बजाकर कहती हैं ...यही ऋतु बसन्त है । बसन्त ऋतु युगल सरकार के यौवन का प्रतीक है । ये जो वन देख रहे हो ना ...कितना सघन और सुन्दर वन है ...यही प्रिया लाल का यौवन है । और यौवन की उमंग से मंजरित हुआ तो मौर आगये वृक्षों में ....बसन्त विलास जन्य प्रिया के सुख में लाल जी सुखी , और लाल जी सुख में प्रिया जी सुखी , अनुराग जन्य ये सुख जवादि कुमकुमा बनकर चारों ओर छा गए हैं ....यही पूर्ण यौवन है युगल सरकार के .....बसन्त छा गया है ....इसका मतलब युगलवर रति केलि में उन्मत्त हो गये हैं । हरिप्रिया जी ये कहते हुए नाचने लगीं थीं ...आनन्द में उछलने लगीं थीं .....चारों ओर बसन्त की सुगन्ध ने पूरे निकुँज को अपने बाहों में भर लिया था ....और सुगन्ध ऐसी की ......उफ़ ! हरिप्रिया जी इतना ही बोलीं ...और मौन हो गयीं । रस इतना हो गया था कि बोला नही जा रहा ।

शेष अब कल -
Hari sharan

Post a Comment

0 Comments