google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || अंतिम भाग 58

श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || अंतिम भाग 58


!! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !! 


( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव ) 


       !! इति ब्याहुला उत्सव !! 


********************************


गतांक से आगे - 


अब निकुँज में युगलवर रति रस में मत्त होंगे ....सखियों ने कोमल कोमल नूतन पल्लवों से सेज सजा दिया है ....अब दोनों दम्पति हंस शावक तुल्य गौर श्याम   रति रस के सिंधु में विहार करेंगे । 


सखियाँ इनको निहार कर अपने नेत्रों को धन्य करेंगीं ।  इनका यही आहार है ।  


हे रसिकों !   ये प्रेम उज्ज्वल है ...शृंगार रस से भरा है ...और इन युगल की परस्पर रति ही इनका स्वरूप है .....इस स्वरूप रस का पान करना हो ...तो आवश्यक है ....सखी भाव की ।  बिना सखी भाव के ये रस न समझ सका है कोई ....न समझ सकेगा । सखियाँ ही हैं जो इनके नित्य विहार की दर्शिका हैं ..नही, मात्र दर्शन नही करतीं ...ये तो अपने नेत्र रूपी अंजलि से पान भी करती हैं ।


ब्याहुला उत्सव सुसम्पन्न हो चुका है ..बड़ा ही आनन्द और उमंग रहा ...सखियाँ अब  युगल सरकार को सुरत सेज में ले जाती हैं ....सुरत  सेज ....जिसे सखियों ने सजाया है ...और अब हरिप्रिया सखी  विदा करती हैं ....अपनी लाड़ली प्रिया जी को ।  विदा करती हैं ?   हाँ ....कन्या दान इन्हीं ने किया है .....और अब विदा करते हुए हिलकियों से रोने लगती हैं ...इनको रोता हुआ देख श्रीरँगदेवि जू भी रोती हैं .....अन्य सखियाँ अब सब रो पड़ते हैं ।  


लाल जू !   हमारी लाड़ली बहुत कोमल हैं ...इन्हें कष्ट ना देना ....लाल जू ! हमारी लडैती ने कभी ऊँची आवाज़ में कुछ सुना नही है ...आप ऊँची आवाज़ में मत बोलना ।  ये मान करें ...तो सही गलत न देखते हुए इन्हें मनाना ....आज हम अपने प्राण आपको सौंप रहे हैं ....ये कहते हुए सखियाँ बहुत रोईं हैं ।     प्रिया जी के हृदय से लगीं हैं ....प्रिया जी के भी अश्रु बह चले ।   और फिर धीरे धीरे रँग महल में सखियाँ ही लेकर आती हैं ....दोनों को विराजमान कराया  सेज में ....और अपने अश्रु पोंछते हुए लाल जू के मस्तक को चूमा फिर अपनी लाड़ली के ।    


!! दोहा !! 


बलि जावैं सहचरि सबैं, तन मन प्रान लगाय ।

पौढ़ाये रस रंग में , मिली सरस सुखदाय ।।

पौढ़े रसिक सुलाड़ले , बना बनी मन भाय।

श्रीहरिप्रिया रस रूप ह्वै, तन मन रहे समाय ।।


***और ये कहा ...आप रति रँग में  रँग दो एक दूसरे को ....सुख लूटो , सुखी रहो ...हमारा सुख भी आपको मिल जाये ...हे युगलवर बस ...रस ही बन जाओ ...दो का भेद ही मिटा दो ।   रसिक रस भरे छैल छबीले युगल सरकार की ...हरिप्रिया दोनों हाथों को ऊपर उठाकर  बोली .....अनन्त सखियाँ बोल उठीं ...जय जय जय जय । 


 इस तरह सखियाँ  रँगमहल में, प्रियाप्रियतम को शयन कराकर प्रसन्नता पूर्वक बाहर आजाती हैं । 


हे रसिकों !  श्रीमहावाणी का “ब्याहुला उत्सव”  यहीं पर विश्राम होता है ....ये वस्तु रसिकों की है ...रसिकों के लिए है ।     आप को रस का चस्का लगे बस इसीलिये मैंने ये गाया है ।  


स्वयं सुषमा जिनकी सेवा में लगी है ...उस परम माधुर्य का वर्णन कौन  कर सकता है ...फिर भी मैंने इसे गाया ...असफल  गाया किन्तु मेरी इस असफलता से ही तुम रीझ जाओ युगलवर !  तो मुझे सफल होना ही नही है ।  बस तुम मेरे हृदय में बसे रहो ....और ...


“श्रीहरिप्रिया रस रूप ह्वै , तन मन रहे समाय । 


मैं भी सखी भाव से भावित हो  तुम दोउन को आशीष देती  हूँ .....कि प्रसन्न रहो ...ऐसे ही हम सखियों को रस प्रदान करते रहो ।   प्यारे !  जीयो । 


Hari sharan 

Post a Comment

0 Comments