श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 57
!! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !!
( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव )
!! धनि धनि भाग मनावौ री !!
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गतांक से आगे -
सखियाँ तत्सुखसुखित्व की भावना से पूर्ण हैं ......इनकी प्रत्येक क्रिया युगलवर को सुख मिले इसलिए ही है । इनके हृदय में अगाध भाव सिन्धु लहराता रहता है । युगल के चारों ओर ही ये मंडराती रहती हैं ...क्यों की यही युगल इनके प्राणधन हैं ...जीवन सर्वस्व हैं । ये इन्हीं के लिए हैं इन सखियों का अलग से कोई अस्तित्व ही नही हैं ....इन्हें रखना भी नही हैं । ये प्रातः उठाती हैं इन सुकुमार युगल को ....फिर कुछ खिलाकर श्रीवन में भ्रमण करवाती हैं ...वहाँ से आकर स्नान आदि होता है ...फिर सखियाँ इनका शृंगार करती हैं .....फिर आरती ....शृंगार आरती । इसके बाद राज भोग लगाया जाता है ....फिर दोपहर में शयन ....सन्ध्या में उत्सव आदि होते हैं ....सखियों के मन में जो आता है ....किस तरह अपने उत्साह को प्रकट करें .....किस तरह हृदय में उमड़ रहे आनन्द की अभिव्यक्ति होने दें .....तो उस समय उत्सव होते हैं .....इस बार ब्याहुला उत्सव सखियों ने ही रचाया था । खूब नाचीं , गायीं , युगल को लाड़ किया । ब्याहुला उत्सव पूर्ण हुआ है .....अब ? चलिए ! स्वयं ही चल कर देखते हैं कि सखियाँ अब क्या करेंगी ? और हाँ ...”धनि धनि भाग मनावौ री” , सखियाँ अपना भाग मना रहीं हैं ....कह रही हैं हमारे जैसा भागवान कौन होगा ? आप भी मना रहे हैं ? अपने भाग ।
॥ दोहा ॥
नव नव आनंद नित करें प्रेम-प्रकास सदीव ।
जै जै दूलह दुलहनी, पौढ़ावौ दोउ पीव ॥
॥ पद ॥
दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री, छबि निरखत नैंन सिरावौ री।
दूलह दुलहनि पौढ़ावो री, दुरि दुरि दृग देखि सिहावौ री ॥
रसरंग में रैंनि बिहावौ री, बहु मनबंछित फल पावौ री।
धनि धनि निज भाग मनावौ री, श्रीहरिप्रिया की बलि जावौ री ॥ १७७ ॥
******श्रीवन में भ्रमण करते युगल को निहार कर जब सखियों को ये अनुभव हुआ कि ...ये सुकुमार किशोर किशोरी अब थक गए होंगे ! सुबह से ही ब्याह उत्सव की धूम चल रही है ...अब, अब रात्रि भी होने आयी है ....इन्हें क्या ? श्रीरँगदेवि सखी जू कहती हैं ....ये तो बालक हैं इन्हें तो केलि में ही रस आता है ...किन्तु सखियों ! हमें ध्यान देना ही होगा ना ! थक गए हैं ये अब इन्हें सुलाओ । श्रीरंगदेवि जू ने अपनी प्यारी सखी हरिप्रिया को ये बात कही ....तभी देखते ही देखते ....सामने एक “नवल रँग महल” मणि माणिक्य से तैयार था ये महल । उस महल में सुगन्धित दीप जल रहे थे ....उसके प्रकाश में पूरा महल जगमग हो रहा था । उस महल में नवल सेज था ...जो अत्यंत कोमल और मृदु था । पुष्पों की अद्भुत कलाकारी उस महल पर की गयी थी ...सुगन्ध मादक थी उस महल की । झरोखे थे जिसमें सुन्दर सुन्दर पर्दे लगे थे ।
इसी नव रँगमहल में अब लाना है इन दम्पतिकिशोर को ।
हे सखियों ! बहुत आनन्द दिया इन दम्पति ने ...हमारे हृदय में तो प्रेम का प्रकाश ही कर दिया ....अब एक काम करो ...इन्हें ले चलो नव रँगमहल में ..वहाँ इन्हें सुलाओ ...फिर ये विहरेंगे .....हरिप्रिया अपनी सखियों से कहती हैं ....अपने नयनों को शीतल करो । उस श्याम गौर के परम मिलन का दर्शन करके अपने आपको रस में डुबो दो । देखो ! रस भी होगा और उस रस में रँग भी चढ़ेगा ...और वो रँग रात्रि में फैलेगा ....सखी ! उस रैन में फैलने वाले रस रँग को अपने हृदय में अनुभव करो ....देखो ! तुम जो मन में कामना करोगी ना सब की पूर्ति होगी ...क्यों की यही हैं वो , जो समस्त की मन कामना पूर्ण करने वाले .....फिर हम तो इनकी हैं .....सगी हैं ...ये कहते हुए हरिप्रिया खूब हंसती हैं ....और फूल गयीं हैं ...अपने को युगल की सगी बताते हुए ।
सभी सखियाँ अति उमंग में भरकर युगल के पास जाती हैं ...हरिप्रिया सखी प्रार्थना करती हैं ।
क्रमशः
Hari sharan
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