श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 56
!! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !!
( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव )
!! अनिर्वचनीय रस !!
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गतांक से आगे -
ओह ! ये रस वाणी का विषय नही है ...ये रस तो पूर्ण अनुभव की वस्तु है .....और जिसने अनुभव किया वो बता भी नही सकता , क्या बतायेगा ? हमारे श्रीनिधिवन राज के विषय में कहा जाता है कि जो रात्रि में उस महारास का दर्शन कर लेता है ...वो गूँगा हो जाता है या पागल हो जाता है .....भगवान के दर्शन करके भी पागल क्यों ? एक साधक ने पूछा , तो मैंने कहा था ...सांसारिक सुख भी अति सुख आपके सामने आजाए ...और एकाएक आजाए तो आपकी हृदय गति अवरुद्ध हो जाएगी कि नहीं ? फिर ये सुख तो महासुख है ....इसके विषय में तो कहना ही क्या ! भावना करो ....महारास चल रहा है ....युगल नाच रहे हैं अनन्त सखियाँ ताल पे ताल मिला रही हैं ....इस मधुर दृष्य को आप पचा पायेंगे ...आपका ये पंचभौतिक देह पचा पायेगा ? और अगर पचा भी लिया नाम जाप आदि से ....तो आप पागल नही होंगे ये बात पक्के ढंग से आप कह सकते हैं ? जिसने उस दिव्य रास का दर्शन कर लिया वो तो संसार के किसी काम का रहा ही नही । कल टटिया स्थान के पास दो साधक मिले ...मुझे देखते ही मेरे पास आये और बोले ...पागल हो गये हैं “आज के विचार” पढ़ के ....अब तो प्रिया लाल जू से मिला ही दीजिए । मैंने कहा ....”पागल बनो” इसलिए तो मैं इतने वर्षों से लिख रहा हूँ ...बिना पूर्ण पागलपन के “प्रिया लाल” मिलने वाले भी नही हैं ।
हे रसिकों ! ये रस अनिर्वचनीय है .....गूँगे के स्वाद की तरह है ...इसलिए आप बस चलिए .....”चलहुँ चलहुँ चलिये निज देश” ।
!! पद !!
नवरंगी हो नवरंगी तुम न्याय दोउ नवरंगी ॥
श्रीबृन्दावन की कुंजगलिन में गरबहियाँ दै डोलौ ।
आपस में अनुरागे तता थेई थेई बोलौ ॥
जाने जात न गात साँवरे गोरे आँखिन आगे ।
प्यारी तें पिय पिय प्यारी तें बदलत वार न लागे ॥
जीते-से जगमगत जगत में कौन कहैं तुम हारे ।
हारे कहैं सोई हारे हैं कहि कहि कर्म तिहारे ॥
अलकलड़ैतीजू अलबेली अलकलड़ौ अलबेलौ ।
प्रिया प्रसन्नवदनी के पाछे मनभावै ज्यों खेलौ ॥
परम रमनीय दोउ रसिक राजीव मुख सकल सुख सींव सौभाग्य सीवाँ।
भाग अनुराग चित चौंप रसरंगभरे सुरति रति ररे दिये भुजा ग्रीवाँ ॥
साँवरी दुलहनी गौर दूलह निरखि हरखि हिय में हितू प्रान वारें ।
धन्य जिय में धरै सुमन बरषा करें मुद भरैं सब्द जै जै उचारें ॥
सिंधु सब सुखन के मूल मंगल महा मान जित मैंन के श्री श्रिया की ।
छबीलि छबिपावती सुरस बरषावती रहसि मनभावती श्रीहरिप्रिया की ॥ १७५ ॥
*******आज प्रिया लाल जू श्रीवन में विहार कर रहे हैं ....दोनों ही विपरीत दशा में हैं ...लाल जू प्रिया जी बन गए हैं और प्रिया जी लाल जू । पुष्पों का चयन कर रहीं हैं प्रिया जी उन्हें अपने प्रिय जू की वेणी गूँथनीं है । इनके पीछे अनन्त सखियाँ हैं ....वो सब अत्यन्त हर्षित इनके पीछे पीछे चल रही हैं .....गठजोर कर ही दिया है श्रीरंगदेवि जू ने । दोनों चूनरी और पीताम्बर से बंधे हुए श्रीवन के उन्मत्त हिरणों को देख रहे हैं ...तो इनके सामने मोर भी आजाते हैं ....युगल वर मोर को स्नेह देते हैं ....अद्भुत रूप माधुरी बरस रही हैं इस समय श्रीवन में । पर पीछे चल रही सखियाँ अब चुप रहने वाली थोड़े ही थीं ...वो सब मधुर वाणी में गारी देना आरम्भ कर देती हैं .....
हे प्रिया लाल ! एक बात कहती हैं बुरा मत मानना ...नव रँग से रँगे हो ...तभी तो इस श्रीवन में खुल कर गलवैयाँ दिए उन्मत्त विहार कर रहे हो ....ये भी नही सोचते कि हम क्या सोचेंगी ? ये कहकर सखियाँ हंसती हैं ....खूब हंसती हैं ....इतने निर्लज्ज न बनो । एक सखी बोली ...इसमें निर्लज्जता की बात कहाँ है ? ये सीधे सीधे चल तो रहे हैं ...कर क्या रहे हैं सो ? हरिप्रिया सखी हंसते हुए कहती हैं ....चलें , सीधे सीधे चलें ....हमें कोई दिक्कत नही हैं....किन्तु ये तो “ताता थई -ताता थई” कहकर मटकते हुए चल रहे हैं । ये क्यों ? एक बात और कहूँ ! हरिप्रिया सब सखियों से पूछती हैं ....हाँ हाँ कहो सखी जू ! सब एक साथ कहती हैं । देखो ! ये जो श्याम सुन्दर हैं ना ...इनकी जात का हमें क्या पता ! और काले और हैं ....काले की लीला को समझना बड़ा कठिन है ....और ये तो बाहर से भी काले नही ...भीतर से भी काले हैं ...ये सुनकर सब सखियाँ खूब हंसीं । हर समय जीतते हो ....कभी हारा भी करो प्यारे ! हारने में जो सुख है वो जीतने में कहाँ है ? श्याम सुन्दर ये सुनकर हंसे और रुक कर हरिप्रिया की ओर देखा ...हए ! हरिप्रिया ने अपनी छाती में हाथ रखकर आह भरी । हे श्याम सुन्दर ! वैसे तुम्हें हराने वाली हमारी स्वामिनी ही हैं .....इनके आगे हारे ही रहते हो ...हारे हो तभी तो इनके पीछे चल रहे हो ...बलिहारी जाऊँ तुम्हारी प्राण प्यारे ! हरिप्रिया बलैयाँ लेती हैं । वैसे सुरत संग्राम में तुम हार जाते हो हमारी प्रिया जी के आगे ....उनके अंगों को देखते ही तुम देह भान खो बैठते हो ....हारे हो तुम हारे । वैसे ....हरिप्रिया मुस्कुराकर कहती हैं ....अब क्या कहूँ ...तुम्हारे कर्म मुझ से छिपे तो हैं नहीं ...इसलिए तो तुम बोल नही पा रहे ...क्या बोलोगे तुम्हारा भेद तो हम खोल देंगी ।
ये बोलकर हरिप्रिया अब निहारने लगीं थीं दोनों को .....
हे श्याम सुन्दर! तुम लाड़ले हो हम सबके , और ये लाड़ली हैं हम सब सखियों की ...जीते रहो ...ऐसे ही गलवैयाँ दिये इस श्रीवन की शोभा बढ़ाते रहो ....हम देख रहीं हैं तुम्हारे नयनों में रति रँग छा गया है ....सुरत केलि की इच्छा तुम्हारे हृदय में प्रकट हो रही है ।
ओह ! अब पूरी तरह से युगल सरकार सखियों की ओर उन्मुख हुए तो जब देखा सखियों ने इन्हें ....तो सब जयजयकार करने लगीं .....और हरिप्रिया हंसते हुए बोली ....साँवरी दुलहन और गोरे दुलहा क्या शोभा बनी है तुम दोनों की । हम क्या चढ़ायें तुम दोनों को ....अपने प्राण न्योछावर करती हैं .....ये कहते हुए हरिप्रिया के नेत्र भाव के कारण सजल हो गये थे ....फिर तो पुष्पों की डलिया लेकर जय जयकार करते हुये ये पुष्प बरसाने लगीं थीं । उस समय रस की जो स्थिति बनी ....वो अनिर्वचनीय थी !
क्रमशः
Hari sharan
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