google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 54

श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 54


!!  दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री  !! 


( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव ) 


!! नित नव कुँज निवासी  जै हो !! 


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गतांक से आगे - 


श्रीमहावाणी के पदों को श्रीवृन्दावन के रसिक  सन्त,   एक सिद्ध परिपाटी के अनुसार गाते रहते हैं ....वो सिद्ध परिपाटी क्या है ?    श्रीमहावाणी के पदों को कैसे गाया जाना चाहिए ...और कैसे उनका अनुसंधान करना चाहिए ...ये बात श्रीवृन्दावन के रसिक जन हम सबको बताते हैं ।  


एक पद का गान किया ....फिर दूसरा पद ?   नही , ऐसे नही ...उसी एक पद को पुनः पुनः गाया जाता है ....उसी पद में से नवीन भाव प्रकट होते रहते हैं ....फिर उनका चिन्तन चल पड़ता है....फिर वो रसिक जन  युगल सरकार के लीला-चिन्तन में इतने डूब जाते हैं ...कि वो स्वयं रसमय होकर भावना से निकुँज की वीथियों में  युगल सरकार की एक झलक देख भी आते हैं ।  उस समय उनका मन पूर्ण रसमय बन चुका होता है ।  


अद्भुत चिन्तन करते हैं ये रसिक जन ।     


“निकुँज में प्रिया प्रियतम विराजमान हैं , वो रसाक्रान्त  हैं ....मिले हैं किन्तु मिले भी नही हैं ...संयोग हैं ...नित्य संयोग है ....पर क्या करें उस संयोग में भी महावियोग छिपा हुआ है । 

तृप्ति और प्यास ये दोनों ही हैं  यहाँ ,  एक साथ  ।  जैसे - प्यासे व्यक्ति को कोई जल दे ...और वो  सुख का अनुभव करते हुए उस जल का पान करे ।  किन्तु अभी ही जल पीया है और प्यास तुरंत फिर लग गयी ....ये स्थिति प्रेम की चरम है ।   श्याम सुन्दर तड़फ रहे हैं मिलने के लिए ..किससे ?  अपनी ही आल्हादिनी से , मिल लिए ...हो गए एक ...किन्तु जैसे ही फिर अपने स्वरूप में आए ...फिर तड़फ ....कि मिलें “ ।


इस तरह  अद्भुत प्रेम तत्व का  श्रीवृन्दावन के रसिक जन चिन्तन करते हैं ।


आप भी इन पदों का गायन कीजिए , और चिन्तन को उसी ओर ले जाइये ...उसी ओर ...निकुँज में जहां हमारे दम्पति किशोर विराजमान हैं ,  सुरत सेज में ।     


॥ दोहा ॥


प्रान त्रान दोउ दोउन के सखियन सुख अमितू। 

सबै मिली रस रँग रिली, हिली झिली निज हितू ॥ 

हितू अलिन के उरनि में, अति आनंद प्रकास । 

नवकिसोर सुखरासि जै, नवनित कुंजनिवास ॥


॥ पद ॥


नित नव-कुंज-निवासी जै जै ।


नवल किसोरी गोरी श्रीराधे नवकिसोर सुखरासी जै जै ॥ 

नवल नागरी नागर दोऊ नवल-बिहार बिलासी जै जै । 

नवल हितू श्रीहरिप्रिया हिये में नव आनंद प्रकासी जै जै ॥ १७४ ॥


******अनन्त सखियाँ  एक साथ बोल उठीं ......जै हो !  

लतापत्रादि  भी बोल उठे ....जै हो ! 

यमुना की लहरों में गूंज उठी ....जै हो !  

पक्षी, शुक पपीहा आदि सब कुहुक उठे .....जै हो ! 


ओह !  कैसा अनुपम दृष्य था वो ...जब अनन्त गोरे हाथ और मीठी ध्वनि नभ की ओर उठी थी ...


बोलो -  नव निकुँज निवासी की ....जै हो ।   


हरिप्रिया ही रसोन्माद फैला रही है ....यही सबको रस में डुबो रही है ...अति आनन्द में उछल उछल कर कह रही है , और  अन्य सखियों को  जैकारा लगाने के लिए प्रेरित कर रही है ...उन्हें भी  जोर से बोलने के लिए कह रही है ।    


हुआ ये ....कि श्रीहरिप्रिया के द्वारा जब इन युगल को “एक”सिद्ध किया ....और बताया कि ..ये दो नही हैं एक हैं , ( कल के पद में )  । और अन्तिम में ये हरिप्रिया सखी जब बोलीं ....


“दोउ श्रीहरिप्रिया  एक प्राण”


ये कहते हुए  हरिप्रिया  रस में डूब गयी थी  और उसे अब सुरत सेज में दो नही दिखाई दे रहे थे ...एक ही ।     इस अनुभव को सभी सखियों ने अनुभव किया था ....तभी  हरिप्रिया सखी की गुरु हितू सहचरी ....उन्हें  भाव का उन्माद चढ़ गया ...और वो उन्मत्त नृत्य करने लगीं थीं  ।   वो अपने नृत्य से बता रही थीं  कि ये सच में दो नही हैं  एक ही हैं । 


ये नृत्य प्रेम से भरा था ...पूर्ण प्रेम का प्रकाश इस नृत्य में सबको हो रहा था  ।  


तब हरिप्रिया ने पहले युगल सरकार को निहारा ....फिर अपनी गुरु हितू सहचरी जू को ....युगल सरकार के ब्याहुला में अपनी गुरु को इस तरह नाचते देखकर हरिप्रिया को कुछ सूझ नही रहा था ....नाचते नाचते जब युगल के चरणों में हितू सहचरी जू गिरीं ....तब हरिप्रिया ने भाव में भरकर , देह भान भूल कर ...जयकार लगाना शुरू किया । 


नव किशोर सुख राशि की ....जै हो । 


नव नित कुँज  निवासी की ...जै हो । 


नवल नागरी नागर की ...जै हो ।


नवल बिहार बिलासी की ...जै हो । 


ये जयकारा  हरिप्रिया सखी  के साथ सब लगा रहे हैं ....और हाँ ,  लता पत्रादि  पुष्प भी बरसा रहे हैं ....युगल सरकार के ऊपर पुष्प बरस रहे हैं ।   


हितू सहचरी चरणों में पड़ीं हैं युगल के ....भाव में उनके अश्रु बह रहे हैं .....वो अब अपना मस्तक उठाकर अपने युगल सरकार को निहार भी रही हैं  । 


तब .....नवल हितू के प्राण की ....जै हो ।    हरिप्रिया  पूरी शक्ति से जयकारा लगाती हैं ।


और तब  श्रीहितू सहचरी  अपनी शिष्या को देखती हैं ....हरिप्रिया सिर झुका देती है ।


“हरिप्रिया हिय में  आनन्द प्रकाशी की”.....जै जै जै हो ।


ओह !  हरिप्रिया चौंक गयीं ...वो नमित सिर कर अब मुस्कुरा रही हैं ....क्यों कि ये जयकारा इनकी गुरु हितू सहचरी जू ने लगाई थी । 


इस जैजैकार से ....चारों ओर सुख का समुद्र लहराने लगा था ।   


क्रमशः

Hari sharan

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