श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 53
!! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !!
( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव )
!! सखी ! ये दोउ एक हैं !!
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गतांक से आगे -
प्रेम वो है जिसमें मत्तता की उष्मा है , उसका माधुर्य स्वयं प्रकट होता रहता है । प्रेम रस है ...किन्तु ये अनेक रसों में अपने आपको विभक्त भी कर लेता है ......ये है एक ही ...किन्तु दो हो जाता है ...फिर ये इन प्रयासों में लगता है कि ये दो एक हों । एक हो जाते हैं तो फिर दो होने की केलि ....ये केलि प्रेम ही करता है । एक प्रेम ही अनेक होकर भासित होरहा है ....फिर अपने को समेटना भी आरम्भ कर देता है । श्रीमहावाणी में इस बात को बड़ी स्पष्टता से बताया गया है कि .....जब निभृत निकुँज में प्रिया प्रियतम एक होने लगते हैं ...तब ये समस्त सखियाँ भी कुँज रंध्र से देख देखकर इनमें ही समा जाती हैं .....तब निभृत निकुँज में कोई नही बचता ....न श्याम न श्यामा न सखी , बस प्रेम तत्व ही अकेला रह जाता है । ये उसी का ही विलास है ।
अब चलिये - विवाह के उपरान्त सुरत सेज में विराजे दुलहा दुलहन को थोड़ा निहारिये .......लाड़ कीजिए , कितने प्यारे हैं और अपने हैं , नहीं नहीं यही अपने हैं ।
॥ दोहा ॥
तिन तोरति गावति गुननि, प्रभा निरखि जोऊज ।
कहत प्रान के प्रान ए, रंगभीने दोऊज ॥
दोउ रसिक दोउ सरस सुख, दोउ रूप के धाम ।
दोउ दोउन के अँग अंग, भीने हो रँग स्याम ॥
॥ सोहिलौ ||
रंगभीने हो अँग अंग स्याम । दोऊ रसिक दोऊ रूपधाम ॥
दोऊ सरस दोउ सुख सहेलि। दोऊ प्रेम-आनंद-वेलि ॥
दोऊ दोउन के उरनि-हार। दोऊ दोउन के चिमतकार ॥
दोऊ दोउन के लड़े लाड़। दोऊ दोउन के चितैं-चाड़ ॥
दोऊ दोउन के रति मनोज । दोउ दोउन के चित के चोज ॥
दोउ दोउन के जीवन जीय। दोउ दोउन के प्यारी पीय ॥
दोऊ दोउन के कमलनैंन । दोऊ दोउन के चैंन ऐन ॥
दोऊ दोउन की बनी बाल। दोऊ दोउन के ललित लाल ॥
दोऊ दोउन के कवन अंग। दोऊ दोउन के सहज संग ॥
दोउ श्रीहरिप्रिया एक प्रान। दोऊ दोउन के सहज त्रान ॥१७३ ॥
****** हरिप्रिया सखी जो अति मदमत्त हैं .....अभी ब्याहुला सुसम्पन्न हुआ ही है .....सुरत सेज पर सखियों ने इन्हें विराजमान किया है ....अष्ट सखियाँ सब सेवा में जुटी हैं ...कोई चँवर ढुरा रही हैं तो कोई बीरी बनाकर युगलवर को दे रही हैं तो कोई वीणा बजा कर दम्पति किशोर को रिझा रही हैं ....मृदंग की थाप पर अन्य सखियाँ सब नृत्य कर रही हैं .....कोई पुष्प उछाल रहा है ...तो कोई इत्र की फुहार चला रहा है ......इस वेला में हरिप्रिया अति मदमत्त हैं ।
हरिप्रिया सखी एक गीत पूरी होती नही कि अवनी से एक तिनका उठाती हैं और दम्पति के ऊपर घुमा तोड़ कर फेंक देती हैं ...यही कर रही हैं आज । और अपनी सखियों से कुछ न कुछ बोलती ही जा रही हैं .....अति मत्तता में व्यक्ति कुछ ज़्यादा ही बोलने लग जाता है .....अब ये सखी हैं ....कोई ऋषि या मुनि तो नहीं कि मौन होकर अपने में ही खो जायें ...ना जी! ये तो निकुँज में करना ही नही है ।
ये दोनों एक दूसरे के प्राण हैं ...और प्रेम रँग में रँगे ही रहते हैं ...अरी सखियों ! देखो तो इनके अंग प्रत्यंग ...कैसे रोमांचित हो रहे हैं ....ये मिलना चाहते हैं ....मिले ही हैं ...किन्तु अब एक होना चाह रहे हैं ...ओह ! कैसे प्रेम रँग में पूरी तरह से रँग गए हैं ....सखी ! गीत गाओ ...इन्हें रिझाओ ।
हरिप्रिया उन्मत्त होकर कहती हैं ।
ये दो देख रही हो ना सखी ! ये दोनों ही रसिक हैं ....यानि रस से भरे हैं ....और रूप-सौन्दर्य के धाम है .....दोनों रस से ही बने हैं ....इनके अंग प्रत्यंग रस से ही निर्मित हैं । प्रेम और आनंद की बेलि हैं ....इनके निकट जो रहेगा वो प्रेम पाएगा और आनंद मग्न रहेगा । दोनों एक दूसरे के हृदय हार हैं .....एक के बिना एक का अस्तित्व ही नही है । दोनों प्राण के प्राण हैं ...और जीवन के जीवन हैं । हरिप्रिया बोलती जाती हैं ....और बोलते बोलते इतनी मग्न हो जाती हैं कि अब गीत बन्द हो गये ....सब सखियाँ हरिप्रिया को सुन रही हैं ....किन्तु हरिप्रिया को भान ही नही है ।
हे सखियों ! ये दोनों एक दूसरे के चित्त को चुराते हैं ....दोनों एक दूसरे के लाड़-लड़ैते हैं ....दोनों के सौन्दर्य को देख कर नही लगता कि ...कामदेव और रति यही हैं । फिर हरिप्रिया कहती हैं ...कोई उपमा है नही इसलिए ये उपमा मैंने दी । नही तो कोटि कोटि कामदेव और रति इनके चरणों में लोटते रहते हैं । ये दोनों एक दूसरे के लिए प्राण-प्यारे ....ये दोनों कमल नयन ..आहा ! आज दुलहा दुलहन बने हैं .....ये जोरी तो विश्व ब्रह्माण्ड में अनूठी है सखी ! हरिप्रिया उन्मादी बन कर बोलती जाती हैं ...उसकी बातों से सारी सखियाँ गदगद हो उठी हैं । तुम्हें पता है सखियों ! ये दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हैं ....यानि एक दूसरे को सुख देने के लिए ये बने हैं ....यही सच्चे जीवन साथी हैं .....कहना ही होगा कि ये दोनों - एक प्राण दो देह हैं ।
ये कहते ही हरिप्रिया का रोम रोम पुलकित हो उठा था । वो बस अपने नयनों से निहारे जा रही थी और उसका हाथ अपनी छाती में था ...वो अत्यन्त सुख के कारण आह भर रही थी ।
क्रमशः
Hari sharan
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