श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 51
!! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !!
( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव )
!! रस विलास रस विलस रहे !!
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गतांक से आगे -
“रस ही रस में विलस रहे हैं”
क्या अद्भुत बात है ।
यहाँ रस तत्व ही है ...श्याम सुन्दर रस, उनकी प्रिया श्रीराधा रानी रस , सखियाँ रस , श्रीवृन्दावन रस , यहाँ के पक्षी रस , यमुना रस , लता पत्र सब रस । रस ही रस का खेल चल रहा है इस निकुँज में । ब्याहुला उत्सव पूर्ण हुआ ....अब मिलन की वेला है ....रति रस में दोनों डूबेंगे ..द्वैत मिटेगा अद्वैत हो जाएँगे ....एक ही रह जाएगा ...कौन ? रस , केवल रस रह जाएगा ।
॥ दोहा ॥
संग प्रिया पिय बिलसहीं, रस रंग बरखि बरखि ।
बड़भागिनि बलि जाय अलि, सोभाजु निरखि निरखि ॥
निरखि निरखि श्रीहरिप्रिया, हिलि मिलि हिय हरषंत ।
नवल बिसाखा सहचरी, नवल रंग बरषंत ॥
|| पद ||
नवल रंग बरषै बिसाखा सहेली नवल बर महल की चहल लागी ।
अतिहि आनंद उत्साह में रगमगी जगमगी उरनि अनुराग रागी ॥
नवल कमलासनासीन दोउ लाड़िले केलि कलवेलि अंग अंग बाढ़े।
झेलि रस झूलि रहे फूल मधुमहमहे डहडहे गहगहे गुननि गाढ़े।
माधवी मालती चंद्रलेखा चपल कुंजरी सुरभि सुभ आनना हरनी ।
एकतें-एक मंगल सनी अनगिनी बरतनी बनी नहिं जाति बरनी ॥
मंजरी सुंदरी सखी अरु सहचरी अहल महली फिरैं फूलि फूली।
गीत गावैं बिहँसि रहसि रसरीतिसों प्रीतिनिधि मगन सुधि सकल भूली ॥
फैलि रह्यौ बितन तन विपिन सौरभ सु मिलि, हितन हिलि मिलि रली बिमल बिमली।
निरखि श्रीहरिप्रिया हरखि बारति तनै, को गनै भाग महिमा फलीअली ॥ १७१ ॥
******रति रस में भींगें दोनों युगलवर ....सुंदर शैया में विराजमान हैं .....सखियाँ चारों ओर हैं ...कोई सखी गीत गा रही है तो कोई नृत्य से युगल वर को रिझा रही है । सब रस से भरी हैं ...युगलवर को देख देख कर ये सब बलि बलि जा रही हैं । इस तरह चारों ओर बस रस ही रस का खेला आरम्भ हो गया है ।
हरिप्रिया सखी मुग्ध हैं ...वो कुछ बोल नहीं रहीं ..क्या बोलें ....जब रस सिन्धु में बाढ़ आगयी हो और उसमें हम सब डूब जायें ....तो क्या कुछ भी बोल पायेंगे ? बस मुस्कुरा रही हैं और अपलक निहार रही हैं अपने युगल सरकार को । तभी विशाखा सखी जू हाथों में कमल की माला लिए युगल सरकार के पास आयीं ....श्रीरंगदेवि जू ने पूछा भी था ....कि एक ही माला क्यों ? विशाखा सखी जू बस मुसकुराईं थीं ....ओह ! श्रीरंगदेवि जी ने अब समझा था ....विशाखा सखी जू की माला इतनी बड़ी थी कि एक ही माला दोनों को पहना दी । अब तो ये और सुन्दर लग रहे हैं ....श्रीरंगदेवि जू ने कहा था । जी ! सौन्दर्य पल पल बढ़ता ही रहता है इनका तो ...अभी देखो तो जो होगा, कुछ ही पल में सौन्दर्य की बाढ़ आ जाएगी , सौन्दर्य बढ़ता ही रहेगा ...विशाखा सखी ये कहते हुए नृत्य करने लगीं थीं ...जिससे श्याम सुन्दर बड़े ही प्रसन्न हो गये थे ...प्रिया जी उनका नृत्य देखकर वहीं झूमने लगीं , अपनी प्रिया को इस तरह झूमते देखना लाल जू को बड़ा अच्छा लगता है ....वो अपनी प्रिया जू को निहारने लगे थे । विशाखा सखी अति आनन्द से भरी हैं ....अनुराग उनके नेत्रों से टपक रहा हो मानों । प्रिया जू को इधर झूमता देख लाल जू स्वयं रस सिक्त हो अपनी प्रिया जी को हृदय से लगा लेते हैं ....प्रिया जी शरमा जाती हैं और लाल जू को दूर कर देती हैं ...चूनर गिर गयी है ....लाल जू ने देखा उस गिरे हुए चूनर को और गिरा दिया ....उफ़ ! फिर क्या था ....लाल जू आहें भरने लगे थे ....प्रिया जी का अंग अंग रति केलि के लिए लाल जू को मानौं निमन्त्रण दे रहे हों ...अद्भुत विलक्षण रस बिखर रहा था । रस रुकता नही है इसने रुकना जाना नही है ...रस तो बढ़ता है ...बढ़ता ही जाता है .....
तभी सबके देखते ही देखते ..अनगिनत सुन्दरी वहाँ आ गयीं ...ये सब मंगल गीत गाती और रति रस को बढ़ाने वाले गीत गा रही थीं ....इनके पद चाल एक समान थे ...इन सबने जो साड़ी पहनी थी वो पीले रंग की थी .....इनकी चोटी नागिन की तरह इनके कमर तक झूम रही थी ...गजरा लगाया था , उससे चोटी और सुन्दर लग रही थी । ये सब हंस रहीं थीं इनकी हँसी भी मन मोहनी थी । इनके नाम हरिप्रिया सखी ने बताये ....माधवी , मालती , चन्द्रलेखा , चपला , कुंजरी , सुरभि ,शुभानना आदि आदि सखियाँ ये सब बड़ भागिन हैं तभी तो इस उत्सव में आ पाईं , ये कहते हुए हरिप्रिया फिर मौन दर्शन करने लगीं थीं । ये जो नाचती खेलती सखियाँ थीं ....वो तो युगलवर को निहारते निहारते सुध बुध खोने लगीं । सम्पूर्ण वन में रस केलि की आभा विपिन के सौरभ से मिलकर बिखर रही थी ....सम्पूर्ण सखियाँ आनन्द मग्न होकर अब धीरे धीरे एक होने लगीं थीं ...यानि सबकी चाल ,सबका लय , स्वर और यहाँ तक की रूप एक जैसा ही सबका हो गया था , क्यों न हो ...हरिप्रिया समाधान करती हैं ....यहाँ द्वैत दिखाई देता है किन्तु है अद्वैत .....हे सखी ! यहाँ सारा खेल रस का है ....देखो ना , रस से भरी ये सब रस रूप युगलवर , और रस श्रीवृन्दावन , लता आदि भी रस ...इसलिए मूलतः ये रस रूप युगलवर के रस का ही विलास है ...विस्तार है । इस रस का जो पान कर रहा है उसके भाग की बढ़ाई कौन कर सकता है । ये कहते हुए हरिप्रिया फिर रस मग्न होकर युगलवर को निहारने लग जाती हैं ।
क्रमशः
Hari sharan
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