श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 50
!! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !!
( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव )
!! अब रति केलि कल्लोल की वेला !!
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गतांक से आगे -
इस दिव्य ब्याहुला महोत्सव को समस्त सखियों ने हर्षोल्लास के साथ सुसम्पन्न किया ।
अब सखियाँ युगल सरकार को “रँग निकुँज” में ले आती हैं ....जहाँ सुन्दर शैया बिछी है ....सीधे शैया में ही विराजमान कर देती हैं .....दोनों बिराजे हैं .....इनकी शोभा कोटि कोटि काम को दमन करने वाली है .....कमल की सुगन्ध प्रिया जी के श्रीअंगों से प्रकट हो रही है ....फिर प्रिया जी के अंग की अपनी सुगन्ध भी तो है ....कमल जैसी सुगन्ध ! कोई उपमा नही है ..इसलिए यही कहना पड़ा । आप अगर कमल की गंध लेंगे तो ये कह सकते हैं कि हमारी श्रीकिशोरी जू के अंग की सुगन्ध कुछ कुछ ऐसी ही है .....पर कमल गंध से कहीं ज़्यादा मादक है ....अरे ! दर्शन कीजिए ...सुरत शैया में विराजे इन दोउ लालन का । और देखिए ....कैसे खिसक रहे हैं अपनी प्यारी दुलहन के निकट ...निकट में ही हैं ....किन्तु इनको तो और निकटता चाहिए .....प्रिया जी के श्रीअंग से निकलने वाली सुगन्ध ने इन्हें मद माता बना दिया है । इन्हीं छोटी छोटी झाँकी का दर्शन बड़ी सूक्ष्मता से सखियाँ करती हैं और अपने भाग को मनाती हैं ।
अनन्त सखियाँ जब इनकी केलि कल्लोल की भावना को समझ जाती हैं ...तब अपनी छाती में हाथ रखकर भाव सिन्धु में डूब जाती हैं .....श्याम सुन्दर प्रिया जी की ओर खिसकते हैं ...फिर रुक जाते हैं ...ताकि कोई सखी ये समझे नही कि ये मिलने को बेचैन हैं । इस तरह सरकते हुए प्रिया जी से ये सट गए हैं , प्रेमियों को लगता है उन्हें कोई देख नही रहा....पर सबकी निगाह उन्हीं पर होती है ....यहाँ भी यही है । अब धीरे से अपने कर प्रिया जी के सुकोमल कर के ऊपर रख दिया है ...और कर रखते ही ...लाल जू ने अपने नेत्रों को बन्द कर लिया ....प्रिया जी ने तुरंत अपना हाथ हटा लिया क्यों की सखियाँ देख रही थीं ...प्रिया जी शरमा गयीं । तुरन्त लाल जू ने अपने नेत्र खोले ...और प्रिया जी की ओर प्रश्न वाचक दृष्टि से देखा ...तो प्रिया जी ने भी नयनों के संकेत से सखियों को दिखाया , ये बातें इनके नयनों से ही हो रहे हैं । सखियाँ समझ गयीं और पूरा निकुँज हंस पड़ा । प्रिया जी अब मुस्कुराकर नीचे देख रही हैं ...नीचे देखते हुए वो धीरे से लाल जू की ओर देखती हैं फिर नयन झुका लेती हैं । आहा ! सखियाँ बलैयाँ ले रही हैं ....
॥ दोहा ॥
बलि-बलि गई सखी सबै, देखि दुहुनि को हेज।
सबै चार करि ब्याह के, बैठाये सुखसेज ॥
ब्याहि बिराजे सेज पर, श्रीहरिप्रिया' लियें संग ।
हुलसि हुलसि हियें ..., बाढ्यौ अति रतिरंग ॥
॥ पद ॥
सेज पर बाढ्यौ अति रति रंग ।
दूलह दुलहनि अलकलडीले अलबेले अँग अंग ॥
नित्यनवीन किसोर लाल दोउ नित्य नवीन अभंग ।
बिलसत बिबिध बिलास बितन के श्रीहरिप्रियाजू के संग ॥ १७० ॥
किन्तु रति रंग में डूबे लाल जू को क्या परवाह कि सखियाँ देख रही हैं ....रति रंग इन्हीं पर चढ़ा है ....इसलिए ये अभी भी प्रिया जू को छूने का प्रयास कर रहे हैं ...पर प्रिया जी मना कर रही हैं उनके हाथों को हटाकर ।
हरिप्रिया अपनी सखियों को कहती हैं ...अरी ! देखो तो सही कैसे प्रेम में डूबे मत्त लग रहे हैं हमारे श्याम सुन्दर , सखी ! स्पर्श से ही ये देह सुध भूल रहे हैं ...जब पूर्ण मिलन होगा तब इनकी क्या दशा होगी । हरिप्रिया के साथ अनन्त सखियाँ बस मुस्कुराकर अपलक इन दोनों को निहार ही रही हैं । तभी लाल जू ने प्रिया जी के हृदय में पड़ी मोती की माला ठीक करी ...अब प्रिया जी को रोमांच हुआ .....मोती माला के बहाने हृदय को जो छू लिया था लाल जू ने ।
हरिप्रिया इस झाँकी को निहारकर कहती हैं ..सखी ! ये ब्याहुला आज हुआ है ऐसा नही है ...ये तो इनके ब्याहुला की वर्षगाँठ है ...किन्तु वर्षगाँठ भी तभी आजाती है जब हम सब सखियों को इनके ब्याहुला मनाने की इच्छा हो । हरिप्रिया आज कम बोल रहीं हैं वो बस इन दोनों को ऐसे ही निहारते रहना चाहती हैं ...ये नित्य नवीन हैं ...ये दुलहा दुलहन नवीन दम्पति हैं ...हैं सनातन जोरी ...ये मिले ही रहते हैं ....इनकी लीला भी नवीन रहती हैं ...और कभी भंग नही होती है ।
स्वयं सुषमा जिनकी सेवा में है...उनके माधुर्य का कौन वर्णन कर सकता है ।
हरिप्रिया कहती है - ये ऐसे नही लग रहे ....जैसे - अत्यन्त गाढ़ , एवम गूढ़ प्रेम-मोह की शैया पर स्वयं सौन्दर्य और आनन्द साकार होकर विलसने को तैयार हो....अरी सखी ! ये मिले हैं ..मिले रहते हैं ..कभी इनका वियोग हुआ नही , हो सकता नही । फिर भी इनके मन में जो मिलन की लालसा है ...वो अत्यंत तीव्र है । अभी तो इनकी शोभा खिली कहाँ है ! हरिप्रिया ने मंद मुस्कुराते हुए कहा । वस्त्र आभूषणों ने इनके माधुर्य पूर्ण अंगों की सुन्दरता को ढँक जो दिया है ......सुन्दरता क्या है , माधुर्य क्या है ....ये तो आज दिखाई देगी सखी !
हरिप्रिया के मुख से ये सुनते ही सखियाँ उन्मद हो उठी थीं ।
क्रमशः
Hari sharan
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