google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 47

श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 47


!!  दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री  !! 


(  श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव  ) 


            !! रसात्मकता !! 


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भाव रस की परिपक्वता से ही रसात्मकता आती है ।     और इसी स्थिति में पहुँचाने के लिए हम लोगों को  श्रीमहावाणी ने ये पद्धति दी ।   श्रीमहावाणी जी के पद गाइये ...इसमें जो झाँकी हैं ...उसका चिन्तन कीजिए ।   चिन्तन में सेवा लीजिए - निकुँज की वीथिन में सोहनी लगाने की ...या आपको जो रुचे ।   इसी को प्रगाढ़ कीजिए ...इसी भावना के प्रवाह में बहिये ....ये तो कर सकते ही हैं आप और हम , नही ?     तब देखना एक स्थिति बनेगी ....आपका हृदय शुद्ध होता जाएगा ....हृदय में संस्कारों की जितनी गाँठें हैं , सब छिन्न भिन्न हो जाएँगीं ....आप संसार की क्रिया करोगे तो ....किन्तु बाध्य होकर ...करना ही है ....कहकर । आपका हृदय अब शुद्ध पवित्र हो गया है ....नाम जाप कीजिए .....उससे प्रगति और होती ही जाएगी ...फिर नेत्रों से अश्रु बहेंगे ....दुःख के नही ...सुख के ...आनन्द के ....अपने भाग को मनाते हुए कि ...आहा !   श्यामा श्याम के ब्याहुला में हम शामिल हैं !     और हमारे सामने युगल सरकार दुलहा दुलहन के रूप में विराजे हैं ....कीजिए दर्शन !     रसात्मक युगल सरकार को ऐसे देखना है जैसे पी जाओगे क्या नयनों से .....और जिह्वा से उनका युगल नाम मन्त्र .....बस ....बस ....ये दो चीज़ आपने पकड़ ली कि ...नेत्र से उनका रूप दर्शन ....भावना के द्वारा ....और नाम का वास आपकी जिह्वा में । 


मैं सच कह रहा हूँ ....चिन्तन हृदय से ...और वाणी से नाम जाप ....फिर ये निकुँज की लीला आपके सामने प्रकट है ....प्रत्यक्ष है ....मेरा विश्वास कीजिए । 


॥ दोहा ॥


मोहें बने निकुंज में, दंपति रति झूल्हैं। 

हास बिनोदनि रँग रँगे, श्रीदुलहनि दूल्हें ।


दूलह दुलहनि जुगल कौ, रूप अनूप सिंगार । 

निरखि निरखि सुख बरनहीं, बिधिवत अमित अपार ॥ 

अति अपार को कहि सके, अद्भुत आभाऊप । 

को मर्कतमनि दामिनी, सहजानंद स्वरूप ॥ 

सहजानंद स्वरूप की, अहलादिनि अवतारि । 

विद्युतबरनी लाड़िली, मृगर्नैनी सुकुँवारि ॥


*************दिव्य दम्पति ,  पुष्पों से सजे उस दिव्य सिंहासन में  विराजमान हैं ...चारों ओर सखियाँ हैं ....कोई चँवर ढुरा रही हैं तो कोई  सौंज लेकर खड़ी हैं ....गायन और नृत्य तो चल ही रहा है ......और बड़े ही उन्मद रूप से चल रहा है ।  अब यहाँ श्याम सुन्दर ने  अपनी प्रिया जू को छूने के बहाने से उनके  हृदय के  हार को ठीक किया ....श्याम सुन्दर के स्पर्श करते ही रोमांच हुआ  प्रिया जू को और उन्होंने हाथ हटा दिया ।  ये सब सखियाँ देख रही हैं ...सखियों से भला कुछ छिपा रह सकता है क्या !  वो यहीं हैं ...और यहीं रहेंगीं ।  प्यारे जू !  यहाँ रस लगा है ....हरिप्रिया सखी गम्भीर बन कर श्याम सुन्दर को कहती हैं ।   कहाँ ?   श्याम सुन्दर पूछते हैं ....यहाँ इनके अधरों में ....हरिप्रिया अभी भी गम्भीर ही हैं ....वो प्रिया जू के अधरों को बताती हैं ....श्याम सुन्दर की रति में मती है इसलिए वो ये समझ नही पाते कि सखी विनोद कर रही है...प्रिया जी ने भी  अधरों को पोंछ लिया ....अब हो गया ?    प्रिया जू ने पूछा ...तो हरिप्रिया प्रिया जी को उत्तर न देकर ...लाल जू को बोली ...आप देखिए । लाल जू ने प्रिया के अत्यन्त अरुण रस भरे अधरों को छूआ .....तो प्रिया जी को  और रोमांच हुआ ...रोमांच तो लाल जू को अधिक हुआ .....”अब यहाँ भी है” ...हरिप्रिया रसमयी है ...रस केलि में इन रसिकों को कैसे उतारना है .....इसे आता है ।  “स्कन्ध में” ....हरिप्रिया गम्भीर ही है ....क्या है प्रिया जू के स्कन्ध में ?  श्रीरँगदेवि जू ने हरिप्रिया से पूछा ....तो हरिप्रिया बोलीं ....”कमल का पराग”....हरिप्रिया ने श्रीरंगदेवि जू को बताया ....तो  श्रीरंगदेवि जू समझ गयीं ...वो मुस्कुराते हुए चंवर ढ़ुराने लगीं ....अन्य श्रीललिता जू आदि ने पूछा ...तो श्रीरंगदेवि जू ने कहा ...”दम्पति रति झूल्हैं”....अरी सखियों !   अब रतिरंग में ये प्रवेश करना चाह रहे हैं ....और इनकी चाहना देखकर ही हरिप्रिया इन्हें प्रेरित कर रही है ।  ये सुनकर सब सखियाँ हंस पड़ीं ...और प्रिया जी शरमा गयीं । 


इस तरह हास्य विनोद चल पड़ा है ...और दुलहा दुलहन रति रँग में अब डूबने लगे हैं । 


सखियाँ इन्हीं को निहारकर मुग्ध हैं ....ये ऐसे लग रहे हैं जैसे नीलमणि और बिजली ...नील मणि नीली है ...और दामिनी में अद्भुत आभा ।  जो इनको देखे वो सब कुछ भूल रहा है ...बस यही यही उनके हृदय में बस गये हैं ।  हरिप्रिया यहाँ एक बात कहती हैं  अपनी समस्त सखियों से ...कि देखो जो हमारे दुलहा सरकार हैं ...ये सहज आनन्द रूप हैं ....और दुलहन सरकार  आनन्द की आल्हादिनी हैं ...सखियों ! ये आनन्द और आह्लाद के मिलन की वेला है । देखो तो !  आल्हादिनी कितनी तेजपूर्ण माधुर्य से भरी हैं ..विद्युत वरण है उनका, कोई भी देखे तो बस मोहित ही हो जाए ।  हरिप्रिया फिर कहती हैं ...कोई भी क्यों ?  स्वयं आनन्द को ही देख लो ...कैसे अपनी आल्हादिनी पर मुग्ध हैं ...और बस देखे ही जा रहे हैं । हरिप्रिया की बात सुनकर सब हंस पड़ती हैं ।


क्रमशः 

Hari sharan

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