google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 46

श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 46


!! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !! 


( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव ) 


( प्यास भी वही और पानीय भी...) 


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गतांक से आगे - 


ये निकुँज रस पान करने के लिए है ....इसे पीना है , इसे आप पीयोगे तो आपको प्यास और लगेगी , है ना आश्चर्य ! कि इससे प्यास बढ़ेगी तो बुझेगी कैसे ? इसी से ...यही प्यास को बढ़ायेगी और यही प्यास को बुझाएगी । ये निकुँज रस आनन्द का सिन्धु अपने में लिए हुए है ....अगाध रस भरा है इसमें ....सखियाँ इसी रस का पान करती रहती हैं ....प्रिया प्रियतम भी इसी रस का पान करते हैं ....और समस्त निकुँज वासी भी । यहाँ केवल रस है ...यहाँ केवल प्रेम सिन्धु लहराता है ....और यहाँ इसी का राज्य है । हमारे रसिकों ने कहा है ...”प्रेम के खिलौना दोऊ , खेलत हैं प्रेम खेल” । ये दोनों प्रेम के खिलौना हैं ...और प्रेम का ही खेल खेलते हैं ...उस प्रेम खेल में जो जो आवश्यक वस्तुयें लाई जाती हैं वो वस्तु भी प्रेम है ....और लेकर आने वाली ये जो सखियाँ हैं ....वो पूर्ण रूप से प्रेम ही प्रकट हैं । प्रेम ही सखियों का आकार धारण करके यहाँ सेवा में लगा है । उत्साह-उत्सव सब कुछ प्रेम ही है । यहाँ की लताएँ प्रेम हैं , यहाँ पुष्प प्रेम हैं ...यहाँ का गायन प्रेम है , यहाँ वादन प्रेम है ...यानि प्रेम ही प्रेम का ये प्रेमपूर्ण उत्सव है ।  


प्रेम तत्व ने ही चारों ओर अपना विस्तार किया है ।   


श्रीमहावाणी में वर्णित ये जो ब्याहुला आदि उत्सव हैं ...इसका उद्देश्य कोई घटना आदि बताना नही है ...ध्यान है इन सबका लक्ष्य । आप आँखें बन्द कीजिए और इन पदों को गाइये ....झाँकी आपके हृदय में प्रकट हो जाएगी ....और जब रस से भरे ये युगलवर हमारे हृदय में प्रकट हो गये और वो भी दुलहा दुलहन के रूप में , तो क्या आपको कुछ और करना शेष रह जाएगा ....नही । यही है रस ही रस का विलास । और यही रसिकों की उच्च स्थिति है ।


॥ दोहा ॥


सरस निकुंज बिराजहीं, उपजत सुख के पुंज। 

बना बनी रसरंग रँगे, गुंज करत निज कुंज ॥ 

कुंज बधाई गावहीं, गोरी सुभग सुजान । 

ललना लाल लड़ावहीं, गावैं सब सुखदान ॥ 

सुख श्रीराधा कृष्ण कौ, सेवैं सदा सुवेख। 

ब्याह-बिनोदनि सँग लिये, गुन अगाध इँदुलेख ॥


|| पद ||


सखी इंदुलेखा अमित गुन अगाधा। सेवैं सुख सदा श्रीकृष्ण राधा ॥ 

संग सहचरि भरी रंग राजैं, तुंगभद्रा रसातुंग छाजैं। 

चित्रलेखा चित्रांगी सुसंगा, रंगवाटी उसँग अंग अंगा ॥ 

मोहनी मोदनी मैंनकारी, सुंदरी सोहनी सोभना री। 

रागरंगी रंगीली रँगावलि, रसिक रंजनि रसीली रसावलि ॥ 

अपनि अपनी लियें सौंज ठाढ़ी, रूपसागर तें मथि मनहुँ काढ़ी। 

लागि रहि सबनि कें एक डोरी, जुगल-मुख-चंद्रमा की चकोरी ॥ 

जगर जगमगि रही जोति लोनी, फैलि मनु विपिन सुखमा सलोनी । 

श्रीहरिप्रिया कुंज सुख-पुंज सोहैं, कोटि कंदरप की कला मोहैं।॥ १६७॥


******कीजिए ध्यान । ब्याहुला उत्सव का ध्यान ।   


सुंदरतम सरस निकुँज में सखियाँ लेकर आयीं हैं इन युगलवर को । उस परम सुन्दर निकुँज में , लताएँ लिपटी हुयी हैं वृक्षों से , लताओं की डालियाँ पुष्पों से लदी हुयी हैं ....किन्तु वृक्ष उन्हें सम्भाले हुए है ...कृश लता झूल रही हैं पुष्पों के अति भार से ...उसमें भी भ्रमरों का झुण्ड । 


सखियाँ सौन्दर्य की धनी हैं .....वो चहकी हुई , प्रफुल्लित युगल की सेवा में ही लगी हैं । 


पुष्पों का सिंहासन है ....दिव्य सिंहासन है ...उसी में विराजे हैं दुलहा दुलहिन ।   


इन्हीं युगलवर को देखकर तो ये सब जीवित हैं ....इन सबका आहार ही ये दर्शन है ।


तभी कुछ गौर वर्ण की सखियाँ जिसका रूप दर्पण के समान था ..इतनी गोरी थीं ..वो आगे , युगलवर के सामने आकर बैठ गयीं हैं ..हरिप्रिया सहचरी ने ही इनके बैठने की व्यवस्था बनाई थी ।


इन्होंने मृदंग मँगवाया ,हरिप्रिया अपनी सखियों से मृदंग मँगवाती हैं और इन्हें देती हैं ...बस फिर क्या था, अद्भुत मृदंग बज उठता है, और ये गोरी सखियाँ सब विवाह के गीत गाने लग जाती हैं ।


गाते गाते सब उन्मत्त हो गयी हैं ....कुछ सखियाँ तो उठ गयीं और अपने युगलवर को नृत्य दिखाने लगीं । मुस्कुराते हुए युगलवर बड़े ही प्रसन्न लग रहे हैं । अष्टसखियों में एक सखी हैं “इन्दुलेखा जू”। इन्हें बड़ा आनन्द आया ...ये झूमने लगीं हैं ....सारी सखियाँ अब इन इन्दुलेखा को देख रही हैं .....ये अमित गुणों की खान हैं .....इसलिए प्रियाप्रियतम इसे प्रेम करते हैं ...प्रेम तो प्रिया प्रियतम सबको करते हैं ...क्यों की प्रेम के सिवा यहाँ और कुछ है ही नही ...किन्तु इन्दुलेखा जू उत्सव आदि की बड़ी उपासिका हैं ...और उत्सव में भी ब्याहुला उत्सव ! ये तो इनका प्रिय उत्सव है ....ये झूम रही हैं .....इनकी मत्तता देखते ही बनती है । तभी प्रिया जू ने अपने पीछे देखा तो इन्दुलेखा भाव में डूब गयीं हैं ...और उनके अंग अंग में थिरकन हो रही है ...ये देखकर प्रिया जू मुस्कुराते हुए संकेत करती हैं ....कि आगे आकर आप नृत्य दिखाइये । बड़ा संकोच होता इन्हें ......किन्तु इनकी जो सखियाँ हैं ( रसिकों ! प्रत्येक सखियों की अपनी आठ आठ सखियाँ हैं , जिन्हें मंजरी भी कहते हैं ) इन्दुलेखा जू की अष्ट सखियों में जो प्रमुख हैं ....जिनका नाम है तुंगभद्रा जू ...वो आगे आने के लिए कहती हैं ....ये सखी इन्दुलेखा जू थोड़ी संकोची हैं ....संकोच के साथ ही ये आगे आजाती हैं ...प्रिया जू उनको देखकर मुस्कुराती हैं ...फिर संकेत करके कहती हैं ...नृत्य दिखाओ । अब तो इन्दुलेखा ...लाल जू की ओर देखती हैं ....लालन भी संकेत करते हैं ....कि नृत्य दिखाओ । बस फिर क्या था ....तुंगभद्रा सखी जो इन इन्दुलेखा जू की सखी हैं ...वो कहती हैं ...नव दम्पति की आज्ञा मानी ही ज़ानी चाहिए । सखी जू ! आप नृत्य कीजिए ...ऐसा अवसर अब कहाँ आयेगा ....इसलिए । अब तो इन्दुलेखा जू का मुखमण्डल पूर्ण अरुण हो गया है .....वो प्रिया जू के चरणों में देखती हैं ....मन ही मन प्रणाम करती हैं ....फिर नृत्य ! आहा ! ये गौर वर्ण वाली इन्दुलेखा जब नाचती हैं ....तब इनके अंगों में जो थिरकन हो रही है उससे शोभा और बढ़ रही है ....इन्दुलेखा जू के गौर भाल पर पसीने की बूँदे झलक रही हैं ....उससे इनका सौन्दर्य और बढ़ गया है .....नृत्य की भाव भंगिमा से इनके हृदय में विराजित हार जब उछलते हैं तब तो ऐसा लगता है मानों क्षीर सिन्धु में ज्वार आगया हो । ये नृत्य उल्लास कुछ समय तक चलता रहा .....अब तो सबके देखते ही देखते .....कुछ सुंदरियाँ सामने से आ रही हैं ये सबने देखा ...ये बहुत सुन्दरी थीं .....हरिप्रिया सखी ने बताया .....चित्रलेखा , चित्रांगी , सुसंगा , मोहनी , मोदनी , मैंनकारी , सुन्दरी , सोहनी , शोभना , रागरँगी , रसिक , रसीली , रसावलि आदि आदि । ये सब सखियाँ दुलहा दुलहन के पीछे जाकर खड़ी हो गयीं हैं ....अब ये जैसे खड़ी हैं ....इनके हाथों में सेवा की सामग्रियाँ हैं । जो भी इनको देख रहा है .... युगल सरकार के पीछे सखियाँ और सौंज हाथ में लिये .....अद्भुत झाँकी थी ये । ये सखियाँ ऐसी लग रही थीं जैसे “रूप सागर से इन्हें मथकर निकाला गया हो”। इस झाँकी का दर्शन करते हुये ये सखी इन्दुलेखा जू और और उन्मत्त होकर नृत्य करने लगीं थीं । धीरे धीरे सखियाँ चकोरी बन गयीं ....इनकी आँखें चकोरी बन गयीं ...और युगल चन्द्र । ये सब सखियाँ सरस निकुँज में विराजे इन रसिक दम्पति को देख कर देह सुध भूल गयी हैं ।चारों ओर रस ही रस का विस्तार है । और युगल दम्पति की शोभा तो इतनी बढ़ गयी है कि ....करोड़ों काम देव भी इनके आगे तुच्छ हैं ।


अब आगे क्या कहें ? जब रस सिन्धु में सभी डूब गए हैं ।     


जय जय श्रीराधे , जय जय श्रीराधे , जय जय श्रीराधे ।  


पूरा निकुँज जयघोष कर उठा था ।


क्रमशः 

Hari sharan 

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