श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 45
!! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !!
( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव )
!! प्रेम विह्वल , आनन्द निमग्न !!
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गतांक से आगे -
सच पूछो तो , सखियों का प्रेम ही युगल को विह्वल बना देता है । यही सखियाँ हैं जो दो को एक कर देती हैं । आनन्द निमग्न हैं नवल दम्पति , इनको आनन्द मग्न करने वाली कौन हैं , ये सखियाँ ही तो हैं । ब्याहुला हुआ , उत्सव क्या महामहोत्सव हुआ । इस महामहोत्सव की रचयिता कौन ? ये सखियाँ । अब देखिए ! मण्डप में सुन्दर विवाह सम्पन्न हुआ ...उसके बाद सखियाँ इन्हें लेकर गयीं रंगमहल में । वहाँ भी सखियों ने युगल के चित्त को रस रंग से भर दिया .....किन्तु अब सखियों ने विचार किया की इन्हें दिव्य कुँज में ले ज़ाया जाए ...जहाँ इनका मिलन हो । उधर - सुन्दर से सुन्दर कुँज तैयार हो गया । उस कुँज के चारों ओर सरोवर हैं ...कमल के पुष्पों का खिलना वो बड़ा मधुर लग रहा है ...उससे सुगन्ध की वयार चल रही है ।
सखियाँ दम्पति युगल को उठाती हैं .....और चलने के लिए कहती हैं । युगल मुस्कुराते हैं ....और चल देते हैं । हरिप्रिया पाँवड़े बिछा रही हैं ...अष्ट सखियाँ चारों ओर से चँवर ढुराती हुई चल रही हैं । ऊपर से लताएँ पुष्प बरसा रहे हैं । आगे आगे सखियाँ नृत्य करती हुई चल रही हैं ...इस तरह उस दिव्य रंग भरे कुँज में सखियाँ युगल को लेकर आयीं । युगलवर के प्रवेश करते ही वो कुँज तो और शोभायमान हो गया था । सामने एक सुन्दर पुष्पों का सिंहासन था , वो सिंहासन पूर्ण रूप से पुष्पों का ही बना था ...और पुष्पों में भी कमल का । उसी में सखियों ने जाकर युगल को विराजमान कर दिया । अब सखियाँ दर्शन करने लगीं ...सिर में मुकुट इनके कितना सुन्दर लग रहा था ...और प्रिया जू के शीश में चंद्रिका ! उसकी शोभा का क्या वर्णन किया जाए ।
दोनों दुलहा दुलहन रस रंग से भरे दिखाई दे रहे हैं ...रति रस इनके हृदय में ही बढ़ रहा था उसी का दर्शन सखियों को दोनों के नयनों में हो रहे थे ...अरुण नयन हो गए ।
सखियाँ कुँज के लता छिद्रों से , कोई वृक्ष की ओट से , कोई दूर , तो कोई पास ...इस तरह सब दर्शन कर रही हैं .....और अपने नयनों को धन्य बना रही हैं ।
॥ दोहा ॥
करि प्रवेस निज कुञ्जबर', राजत बनारू बनी ।
रसरंगनि रस बिलसहीं, मोहत मुकुटमनी ॥
मुकुट मनी धन धनी दोउ दूलह दुलहनि बाल ।
मंजु कुंज में बिलसहीं, मोहनि मोहन लाल ॥
॥ पद ॥
बना बनी की जोर बनी।
नित नवकुंज मंजु मंदिर में दूलह रसिक रसिक दुलहनी ॥
मोहन मोहन मैंन मुकुटमनी मुकुटमनी स्यामा धन-धनी ।
श्रीहरिप्रिया प्रति प्रति छिन प्रमुदित निरखि निरखि सोभासुखसनी ॥१६६॥
****क्या जोरी बनी है आज तो । हरिप्रिया कहती हैं ।
ये नव दुलहा हैं और इनके साथ इनकी नव दुलहिन हैं ....और ये कुँज भी नव कुँज हैं .....यहाँ सब कुछ नवीन है , नया नया है । हरिप्रिया ही रीझ रीझ कर अपनी सखियों को बता रही हैं ।
सखियाँ झूम झूम कर इन नवेली नवल के सौन्दर्य सुधा का पान कर रही हैं । हरिप्रिया कुछ देर के लिए रुक जाती हैं ....फिर बोलना शुरू कर देती हैं ।
श्याम सुन्दर प्रिया जू के पास खिसकते हैं ....और और .....जब उन्हें प्रिया के श्रीअंग का स्पर्श होता है ...तब ये रोमांचित हो उठते हैं ....हरिप्रिया हंसती हैं ....इन्हें लग रहा है हमें पता नही ...किन्तु हे रस शिरोमणि ! हम सब जान रही हैं समझ रही हैं कि तुम्हें अब काम केलि को सुसंपन्न करना है ....रति विलास में उतरना है । हरिप्रिया कहती हैं ....अपना नाम तो सार्थक करोगे ही ना ! “रसिक राई”......यही नाम अनादि है तुम्हारा । रसिकों के तुम मुकुट मणि हो ...ये हम सब जानती हैं ....प्यारे ! हंसती हैं हरिप्रिया ....”ये तुम्हारी ही हैं”।
श्याम सुन्दर जब ये सुनते हैं तो प्रिया जू शरमा कर थोड़े दूर हो जाते हैं ।
हरिप्रिया के साथ पूरी सखियाँ खिलखिला पड़ती हैं .....फिर गम्भीर हो जाती हैं और बस इन शोभा निधान दम्पति को अपलक निहारती हैं , निहारती हैं और बस निहारती ही जाती हैं ।
क्रमशः
Hari sharan
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