google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 44

श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 44


!! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !! 


( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव ) 


!! रतिरूप दम्पति की रतिमती सखियाँ !! 


*************************************


गतांक से आगे - 


निकुँज में सखियों की प्रधानता है , कहना होगा कि ये सखियाँ इन दम्पति किशोर की छाया हैं । 


ये शुद्ध प्रेममयी हैं , काम यानि किसी भी इच्छा ने इनका स्पर्श नही किया है ...पूर्व में कई बार कहा जा चुका है कि ....जो भी इच्छा इनके मन में उठती है ....वो इच्छा दम्पति की ही है ...ये तो इच्छा शून्य और प्रेमपूर्ण हैं । रति रूप ये श्यामाश्याम हैं तो रतिमती ये सखियाँ हैं ...इसे ऐसे समझिये कि ....दिन और रात की सन्निधि में जो सन्ध्या है ...ये मिलाती है दोनों को ...तो श्यामा श्याम भी दिन और रात की तरह हैं ये सखियाँ मध्य में सन्ध्या हैं ....दोनों सन्धि कराने यानि मिलन कराने में महती भूमिका निभाती है । इसलिए निकुँज उपासना वाले रसिक-साधक सखियों को नज़रअन्दाज़ नही कर सकते । यही मुख्य हैं ...यही दोनों को रति विलास में उतारती हैं । 


अहो , आश्चर्य ! नित्य मुक्त परब्रह्म इन सखियों के हाथों नाचता है .....ये कहती हैं ...प्रिया जी के साथ बैठो तो ये बैठते हैं ....ये कहती हैं ....पुष्प तोड़कर प्रिया जू का शृंगार करो , ये कहते हैं ...रूठ जाती हैं प्रिया जी तो इनको ये सिखाती हैं कि कैसे मनाना है । ये सेज सजाती हैं ...उनमें पुष्प बिछाती हैं ....दोनों को मिलाने का प्रबन्ध यही तो करती हैं । इसलिए इन सखियों को प्रणाम कीजिए ....और युगलवर का रंगमहल में दर्शन कीजिए ।


॥ दोहा ॥


जोरी सलोनी महल में राजत रंगभरी। 

गान-कला निर्तत अली, रिझवत रसनि ररी ॥ 

रिझवत श्रीहरिप्रिया कों, रति रस घात जनाय । 

सब बातनि में चतुर अति, चित्रा सखी सुहाय ।।


॥ पद ॥


चित्रासखी चतुर सब बातनि। जानति अति रति रस की घातनि ।। 

तिलकनि सौर सुगंधिक बैंनी कामिलका गुनभरी रसाला । 

कामनागरी नागरबेली सुसोभना मृगनैंनि बिसाला ॥ 

जया जयंती बिजया बिरजा बीना बालमती बन बेली। 

बिधु वदनी सुखसदनी स्यामा रम्या रदनी अँग अलबेली ॥ 

सजे सिंगार सिंगार सुंदरी रचि आभरन जथारुचि के। 

रायबेलि-माला पहिरावत लाय प्रसून सुमन सुचि के ॥ 

दरपन लै दिखरावति दरपा कंदरपा किये तिलक सँवारि । 

अछित लगाय लड़ाय ललन कौं पीवत पानी वारि निहारि ।। 

कोउ सखी रति मंगल गावति चोंप लगावति उरन उमाहि। 

कोउ सखी सैननि समुझावति अति सोहन मोहन तनचाहि ॥ 

रीझि रीझि भींजत दोउ प्यारे देखि देखि रस-बरषा-पुंज । 

महाप्रेम रसमत्त श्रीहरिप्रिया कीनौ आय प्रवेस निकुंज ॥ १६५ ॥


******अनन्त सखियाँ उस रँगमहल में प्रेम रस से मत्त होकर नृत्य कर रही हैं ...इस नृत्य को आरम्भ किया था हरिप्रिया सखी ने ...उन्हीं की उन्मत्तता देख सब नाचने लग गयीं थीं । तभी पीछे से हंसती खिलखिलाती श्रीचित्रा सखी जू आगे आयीं .....गौर वरण हैं इनका ...काव्यात्मक बोलती हैं ....इनकी मुस्कुराहट अत्यन्त मधुर है ....आज इन्होंने पीली साड़ी पहनी है जो इन पर जँच भी रही है । सबसे पहले श्याम सुन्दर के पास जाकर ये धीरे से बोलीं ...प्यारे ! लाड़ली के अंगों में अमृत है .....इसका पान करना .....फिर आप जीवित रहोगे । ये सुनते ही प्रिया जी चित्रा सखी की ओर देखकर शरमा सी जाती हैं । प्यारी ! आप सुधाधर हो ...आप अमृत का पान उन्मुक्त रूप से प्यारे को कराना ...नही तो आपकी रूप राशि के सिन्धु में ये डूब गये तो जीवित बच नही पायेंगे । 


चित्रा सखी रतिमती है ....इसलिए इसकी बातें “रस घात” करती हैं ।   


प्रेम की रीत को ये अच्छे से जानती हैं ......तो चित्रा सखी अपनी प्रिया जू के पीछे जाकर बैठ गयीं .....और अपनी सखियों से संकेत करके बोलीं ....शृंगार सामग्री लाओ ....थोड़ा और सजा दूँ ताकि इनकी मधुयामिनी और मधुर हो जाए । ऐसा कहकर श्रीजी के केशों को चित्रा सखी ने खोल दिया .....और जब वो केश खुले तो उसमें से सुगन्ध निकला जिसे श्याम सुन्दर ने अनुभव किया ...तो उनकी आँखें बन्द हो गयीं ...वो अपनी प्रिया के केशों के सुगन्ध में ही कुछ देर के लिए खो गये थे । सखियों ने चित्रा जू को सुन्दर पुष्पों का एक डलिया लाकर दिया .....अब तो चित्रा सखी श्रीजी की वेणी गूँथने लगीं ......उस समय श्याम सुन्दर ललचा रहे थे कि ....ये सेवा मुझे मिलनी चाहिए पर चित्रा चतुर है ...मुझ से मेरी सेवा छीन ली । चित्रा सखी वेणी में सुन्दर सुन्दर फूलों को गूँथ कर ....सजा रही है ......श्यामा जू के नयन इस समय प्रेम से भरे लग रहे हैं ....उसमें काजल लगाकर उन्हें और कटिले बना रही हैं । कृश कटि वाली श्रीराधिका जू आज अत्यन्त सुन्दर लग रही हैं ....ये कोमल लतिका के समान प्रतीत हो रही हैं ...इन्हें देखकर श्याम सुन्दर मोहित हो गये हैं ....वो बस त्राटक ही लगा बैठे हैं । “नज़र लग जाएगी”...कहकर श्याम सुन्दर को दूसरी ओर देखने को कहती हैं चित्रा सखी , उस समय सब सखियाँ हंस पड़ती हैं । 


किन्तु ये क्या ? देखते ही देखते सौन्दर्य का सागर ही मानौं उस रँगमहल में उमड़ पड़ा था ....कुछ सखियाँ वहाँ आगयीं थीं .....वो बहुत सुंदर थीं ....इनके हाथों में आभूषण थे ....जो इन्हें प्रिया जू को लगाने थे । इनके नाम हरिप्रिया सखी सबको बताती हैं ......जया , जयन्ती , विजया , वीणा , बालमती ...ये प्रिया जी को आभूषण पहनाती हैं ....हाथों में कंगन हैं , हृदय में सुन्दर सा हार है ...कानों में करनफूल हैं । नही नही , अब सखियाँ पुष्प भी लेकर आयी हैं ....ये बड़ा सुखद लग रहा है अन्य सखियों को । राय बेली की माला एक सखी लाई और प्रिया जू को धारण कराया ....कमल के पुष्प चरणों में चढ़ा दिए । मस्तक में रोरी का तिलक लगा दिया ....माँग मोतियों से भर दी । तभी एक सखी जिसका नाम है ...दर्पा जू ....ये दर्पण दिखा रही हैं प्रिया जी को ....और एक सखी है जिसका नाम है ....कंदर्पा जू ....जो माथे का तिलक ठीक कर रही हैं । 


फिर ये सब दूर चली जाती हैं ......क्यों ? क्यों की रूप दर्शन अच्छे से करने हैं तो वो अत्यन्त निकट से सम्भव नही है ...उचित दूरी से ही रूप माधुरी का दर्शन होता है । वहाँ से ये सब सखियाँ दर्शन करती हैं ....सखियों को दर्शन करते हुए जब देखा तो लाल जू भी ललचा गए ...वो भी उठकर कुछ दूर जाकर अपनी प्यारी को देखते हैं .....हरिप्रिया हंसते हुए कहती हैं ...ये आपकी ही हैं ....अब देखते रहना , जितना देखना हो ...अभी तो जाओ और दाहिनी ओर चुपचाप बैठ जाओ । लाल जू झेंप जाते हैं ...और जाकर दाहिनी ओर श्रीजी के बैठ जाते हैं ।  


सखियाँ निहार रही हैं अपनी स्वामिनी जू को ....और पानी वार कर पी रही हैं ...ताकि इन्हें कोई नज़र ना लगे । अब तो रस बढ़ने लगा रंगमहल में .....सखियाँ उन्मत्त हो गयीं इन युगल को देख देखकर ....सब गीत गाने लगीं ....बजाने लगीं ....नृत्य की उन्मत्त प्रस्तुति देने लगीं । जब अष्ट सखियों ने देखा की रंगमहल रस में डूबने लगा है ....तो उन सबने अब हरिप्रिया से कहा कि ...दम्पति को निकुँज में ले चलो । तब हरिप्रिया ने प्रार्थना की ...और युगलवर को निकुँज में ले जाने की तैयारियाँ होने लगीं थीं । 


क्रमशः


Hari sharan

Post a Comment

0 Comments