google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 43

श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 43


!!  दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री  !! 


(  श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव  ) 


      !!  रँग महल की झाँकी  !! 


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गतांक से आगे - 


॥ दोहा ॥


आनँद में उमगाय कें, भरी सबै सुख रंग। 

लै आईं अलि महल में, फूली सब अँग अंग ॥ 

अँग अंगनि रस रँग रँगी, आनँद अवधि परी जु। 

लाड़ लड़ावै चंपलता, चित में चोंप भरी जु॥


|| पद ॥


चंपलता चित चोंप भरी। अँग अंगनि रस रंग ररी ॥ 

मृगलोचनि सुभचरिता चंद्रा चंद्रलत्तिका प्रिय सहचरी। 

मनिकुंडला मंडली कंदुकनैनि सुमंदिरा मनमंजरी ॥ 

मनिमाला मेधा मधुमालती मदनमंजरी मनोरमा । 

महाबिचित्रा मित्रामोदा अनुरागिनि अनोपमा ॥ 

आनंदलता अद्भुता आभा अमितप्रभा आनंदभरा। 

लाड़लड़न को लाड़ लड़ावत लाड़ लड़ी सब लाड़ परा ॥ 

मधुरा मधुर मृदंग बजावत गरबीली गावत गुन गीत। 

चंदमुखी मुखचंग बीनवर बाला सुरसाला जु पुनीत ॥ 

रंग रह्यौ कछु कह्यौ परत नहिं उमह्यौ आनंदसिंधु अपार । 

तन मन मगन भये सबहिन के अति रसलीन रही न सँभार ॥ 

बना बनी बैठे बनि बानिक राजत छबि छाजति अनहोनी। 

श्रीहरिप्रिया किसोर किसोरी जोरी गोरी स्याम सलोनी ॥ १६४॥


********श्रीहरिप्रिया सखी ने अपने हृदय के भावों को व्यक्त किया था ....अष्ट सखियों ने अनुभव किया कि दम्पति सुख के लिए अब  इनको रँगमहल में ले जाया जाए .....तभी अष्टसखियों में से श्रीचम्पकलता जू ने दम्पति मुख चन्द्र को निहारा ।  उनकी अब मधु मिलन की इच्छा है । ये जानते ही  चम्पकलता जू  तुरन्त रँगमहल में गयीं ...वहाँ की सजावट सुन्दर हो , और इन युगल के अनुकूल हो ।   वैसे रँगमहल सज गया है ....और सुखद पर्यंक की बिछा है ,  चारों ओर कमल के पुष्प हैं ,  जिनकी सुगन्ध से  महल महक रहा है ।   ये सब देखकर चम्पकलता जू को बहुत अच्छा लगा । वो महल के द्वार पर खड़ी हो गयीं ....दो कलश जल से भरकर रख दिए ...उनके ऊपर आम्र और पीपल के पल्लव । संकेत किया  श्रीरँगदेवि जू को ...कि अब दम्पति को रँगमहल में लाया जाये ।


बस फिर क्या था !    सखियों ने वाद्य बजाने शुरू कर दिए ....जै जै जै के शब्द सुनाई पड़ रहे हैं निकुंज में ,  आगे आगे सखियाँ नृत्य करने लगीं ।   अष्ट सखियों ने  युगल सरकार को निवेदन किया कि ....अब आप रँगमहल में पधारें ।    ये सुनते ही श्याम सुन्दर तो उछल पड़े और प्रसन्नता से बोले ....चलो , शीघ्र चलो ।    श्याम सुन्दर को इस तरह आतुर देख  सखियाँ तो हंस पड़ीं ....प्रिया जू शरमा रही हैं ,  वो बस नीचे देखकर मंद मंद मुस्कुरा रही हैं ।   हरिप्रिया पाँवड़े बिछाती हुई आयी ...और स्नेह से भरकर बोली ....हे रसिक शेखर !  आपको जितनी शीघ्रता रस में उतरने की है  उससे ज़्यादा हमें रसिक शेखर को रस में डूबते हुए देखने की है ...प्यारे !  अब समय है गयो है ...आप अपनी प्रिया जू के संग रंग महल में पधारो ।  बस इसके बाद तो  शहनाई गूंज उठी थी ...पुष्प बरस रहे थे युगल के ऊपर । रँगदेवि जू और सुदेवी जू चँवर ढुराते हुये चल दीं थीं । युगल सरकार दुलहा और दुलहन के भेष में  सबका मन मोह रहे हैं ।  जयजयकार हो रहे हैं ....ललिता जू  , विशाखा जू  ये  गीत गाती हुयी चल रही हैं ।     इस प्रकार रँगमहल में इन नव दम्पति ने प्रवेश किया ।    


ना ,  ऐसे प्रवेश नही पाओगे ......लो जी !  ये हरिप्रिया आगयीं ,  जिसे नेग लेना है । 


द्वार रोक लिया .....और कहा .....नेग तो लेके ही रहूँगी । 


श्याम सुन्दर ने अपने हृदय से मोतियों की एक माला उतारी और हरिप्रिया को दे दी ....प्रिया जू ने भी अपने हृदय से मोती की ही माला उतार कर हरिप्रिया को प्रदान कर दी ।  बस फिर क्या था ...हरिप्रिया ने आनन्दमग्न होकर प्रिया जू की माला श्याम सुन्दर को और श्याम सुन्दर की माला प्रिया जी को पहनाई ....और  नृत्य करने लगीं ।   


अब प्रवेश भी तो करने दो ......थक गए हैं दोनों ।  ऐसा कहकर युगल दम्पति को चम्पकलता जू ने प्रवेश कराया ...और  उस दिव्य अद्भुत महल में ....उस महल के एक आसन में पहले दोनों को विराजमान कराया ।  और फिर अपने उमंगित चित्त से प्रिया प्रियतम को लाड़ लड़ाने लगीं थीं ।


उस रंगमहल में  युगलवर  मात्र भी आते हैं ,  और आने के लिए तो अनन्त सखियाँ भी उसमें समा जाती हैं .....आज अनन्त सखियाँ उस महल में उपस्थित हैं ।    रँगमहल के दिव्य आसन में दम्पति विराजमान हैं ।  अब हरिप्रिया कहती हैं - सखियों ! देखो तो हमारी  ये चम्पकलता सखी जू ...कितने उमंगित चित्त से प्रिया लाल को लाड़ कर रही हैं । प्रेम रँग से इनका अंग अंग कैसे सराबोर हो उठा है ।    आप सहज विराजिये ....चम्पकलता कहती हैं ।  “आप अपने चरण ऊपर रख लीजिए ..आपको अच्छा लगेगा”,     कितनी भाव पूर्ण हैं ये ।     तभी सब सखियों ने देखा कि एक अत्यन्त सुन्दर , मृगनयनी , सुन्दर चरित्र वाली ...एक सखी वहाँ आगयीं ...हरिप्रिया ने बताया इनका नाम है ....चन्द्रलता सखी ....नही नही , ये अकेली नही आयीं हैं यहाँ ,  इनके साथ और भी हैं ....इन्हीं के समान  कंदुक जैसे नयन वाली ...सुन्दर अंगों वाली ...”मणिमंजरी सखी जू”  ये नाम भी हरिप्रिया ने ही बताया था ।   एक सखी तो बहुत सुन्दर थी ..इनका नाम था ....”मदन मंजरी जू” ।    ये सब सेवा में लग गयी हैं ....सबमें प्रेम रस भरपूर है ...और दिव्य आभा से ये प्रकाशित हो रही हैं ।   एक सखी और हैं ....जिनका नाम है ...”मधुरा सखी”  ये मधुर गीत गाती हैं इसलिए इनका नाम मधुरा है ...हरिप्रिया ने बताया ...और ये भी बताया कि ये मृदंग भी बजाती हैं । तभी  सबके सामने देखते ही देखते हरिप्रिया ने ही मृदंग लाकर रख दिया गया .....युगल चरणों में प्रणाम करते हुए मधुरा सखी जू ने गीत गाना और  मृदंग बजाना आरम्भ कर दिया था ।  किन्तु ये क्या !  तभी वीणा बजाती हुयी एक सखी और आगयीं  और आकर दम्पति को प्रणाम करते हुए बैठ गयीं ....उनकी उँगलियाँ वीणा के तारों में नृत्य कर रहीं थीं । इनका नाम है “चन्द्रमुखी जू “  ये कहते हुए अब हरिप्रिया ने नाचना शुरू कर दिया,  हरिप्रिया को नृत्य करते देख  अन्य सखियाँ भी नाचने लगीं,  रस रंग बरस पड़ा ।  दम्पति किशोर  ये सब देखकर  स्वयं ही रस रँग में भींग गये थे ।     


जय जय हो दुलहा दुलहन सरकार की ।  पूरा निकुँज जयजयकार करने लगा था ।


क्रमशः

Hari sharan

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