google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 42

श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 42


!!  दोउ लालन लाड़ लड़ावौ री  !! 


( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव ) 


     !! रस रंग महल पधरावौ री !! 

******************************


गतांक से आगे - 


॥ दोहा ॥ 


लै बलिहारी श्रीहरिप्रिया, डोर छोर मनमत्त । 

कहत चलौ लै महल में, कीजै रँगरस रत्त ॥


॥ पद ॥


दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री। छबि निरखत नैंन सिरावौ री ॥ 

रस रंगमहल पधरावौ री। पैसारें पद परसावौ री ॥

साजिंत्र बाजिंत्र बजावौ री। बहु बिबिध बधावौ बधावौ री ॥ 

नवकुंज में केलि किलावौ री। मैंननि भरि भरि रस पावौ री ॥ 

सुख सेजको सुख बिलसावौ री। रंगीले के रंग रचावौ री ॥ 

रंग स्याम सु गौर रँगावौ री । उज्जल तन तेज करावौ री ॥ 

मुख जै जै सबद सुनावौ री। अति आनँद में उमगावौ री ॥163


****अब तो मोहन का मन  अपनी आल्हादिनी पर अति आसक्त हो रहा है । प्रिया जू के अतिशय सौकुमार्यता को देखकर ये मचल उठे हैं । ये शृंगार रस की सार हैं ....इनके अंग अंग में रति रस का श्रोत है ....जिसे पान करना चाहते हैं  हमारे श्याम सुन्दर ।   ये लीला भी तो अपने से अपने में है ।   प्रिया जू अलग कहाँ हैं  लाल जू से ...और लाल जू कहाँ अलग है प्रिया जू से ।   अलग न होते हुए भी अलग होना ...यही लीला का विस्तार करना है ।   


चलिए दर्शन कीजिए - पहले हमारी लाड़ली जू के दर्शन कीजिए ...दुलहन के भेष में इनका स्वरूप कितना रति रस से  भरा लग रहा है ।    अपने प्रियतम के प्रति ये कितनी उदार हैं । 


सखियाँ दुलहा को ही देख रही हैं ....वो अपनी लाड़ली को नही देखतीं .....क्यों ?   इसलिए कि अपनी दृष्टि द्वारा प्रिया जी का स्पर्श भी होगा तो उन्हें भार लगेगा ।   कितनी गर्मी है  हम सबकी दृष्टि में .....सखियाँ कहती हैं ....हम जब टकटकी लगाकर देखेंगी तो  हमारी सुकुमारी हमारी दृष्टि से ही झुलस जायेंगीं ।    इसलिए ये  लाड़ली को नही देखतीं ।   


लाल साड़ी पहनीं हैं आज ,  सिर में सिन्दूर से माँग भरी है ....उन कजरारी नयनों में मोटा काजल लगा है .....हृदय में कभी न मुरझाने वाली कमल की माला पहनी है ....हाथों में चूड़ियाँ हैं .....कटि अत्यंत क्षीण है ...जिसमें करधनी है ....करधनी मणियों की है ....करधनी का भार देखकर लगता है  ये कटि क्या इस भार को भी सह पाएगी ।  गम्भीर नाभि है .....श्याम सुन्दर का मन ,इसी नाभि सरोवर में ही तो मीन बनकर विहार करने का है ।  


हरिप्रिया सहचरी मत्त होकर कहती हैं - सखियों !  हमें तो बहुत आनन्द आरहा है ...किन्तु हमें अपना ही आनन्द नही देखना ....हमें इनका सुख भी देखना है ....देखो तो कितना समय हो गया ...ये दोउ सुकुमार बस बैठे ही हैं ....अब इन्हें  आपस में मिलने दो ।  


“अरी सखियों !  डोरना तो खुल गया अब काहे की देरी है , हमारी प्रिया से अब तो मिला दो” ।


हाथ जोड़कर बेचारे श्याम सुन्दर सखियों से बोले थे । 


ये देख-सुन कर  हरिप्रिया बलैयाँ लेते हुये कहती हैं ...प्यारे !  अब चिंता मत करो ये तुम्हारी ही हैं ....कहते हुए हरिप्रिया के नेत्र सजल हो उठते हैं ।  भाव में बहे अश्रुओं को पोंछते हुए हरिप्रिया अपनी सखियों को कहती हैं .....सखियों !  अब इन रंगीले दम्पति को रँग महल में ले चलो ...वहाँ इनको रस मत्त होकर केलि में डूबने दो ।   


हरिप्रिया श्याम सुन्दर को देखकर झूम उठती हैं .....फिर वो बोलती जाती हैं .....इनको लाड़ करो ,  इनको देखकर अपने नयनों को शीतल करो ,   सखियों !  रस से भरे रंग महल में इन्हें ले जाओ ...और वहाँ सुरत सेज पर पधारकर इनके पाँव पड़ो ।  पाँव क्यों पड़ें ?  हरिप्रिया बोलीं ...इनसे आग्रह करो कि - आप प्रेम केलि का विस्तार करो ।   साज बाज बजाओ ....नाचो गाओ ...उन्मुक्त हो कर  इन्हें खिलाओ ,  इन्हें खेलने दो ।   हरिप्रिया भाव  उन्मद के कारण अब कुछ बोल नही पा रही हैं .....वो बस श्याम सुन्दर को निहार रही हैं  और मुग्ध हैं । 


सुरत सेज को सजाओ , उसमें भिन्न भिन्न झांकियाँ दिखाओ ...हरिप्रिया फिर बोलना आरम्भ करती हैं ।    सखियों !   दोनों को रँग दो ।  कैसे रँगे ?   हरिप्रिया कहती हैं ..प्रिया जू को श्याम रँग से रंग दो और लाल जू को गौर रंग से । दोनों एक दूसरे के रंग में रंग जायें ..बस ऐसा कर दो ।  


दोनों को मिला दो ,  दोनों को एक कर दो ...सखियों ! ऐसा कर दो कि कोई पहचान ही ना पाए ....कि श्याम कौन हैं और गौर कौन हैं ।  हरिप्रिया अब आनन्द में झूम उठी हैं .....”सब जै जै करो...इन दोनों युगलवर को इसी से सुख मिलेगा  और इन्हें जिसमें सुख मिले हमें वही करना चाहिए”।  हरिप्रिया इतना कहकर  मौन हो जाती हैं । तभी बाजे गाजे बजने शुरू हो जाते हैं ...नृत्य आरम्भ हो जाता है ।  लताओं ने सुगन्धित पुष्प,  देवताओं की तरह बरसाने  शुरू कर दिए थे ।


क्रमशः


Hari sharan

Post a Comment

0 Comments