google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 41

श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 41


      !! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !! 


       ( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव ) 


              !! डोरना लीला !! 


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यह रस और कहाँ है ? प्रिया प्रियतम को लाड़ लड़ाने में जो सुख है ...वो सुख और कहाँ है ? हाँ , ये रस उनके लिए है ...”जिनके सर्वस जुगल किशोर” । “इनके सिवा और हमारा कौन है”, ये सोच जब पक्की हो जाये ....तो उनके लिए है ये रस । अद्भुत से भी अद्भुत सुख मिलेगा आपको । आप सोच नही सकते ..उस सुख में निमग्न हो जाओगे । थोड़ा विचार करो तो , इनके सिवा हमारा और कोई है क्या ? और कोई रस है क्या , जो नित्य हो और नूतन हो ?     


ये ब्याहुला उत्सव इतने आनन्द का है कि सब सखियाँ अपने को भूल चुकी हैं ....अपने प्रिय नव दम्पति को निहार कर ही ये सब निहाल हो गयीं हैं ।    


जुवा खिलाती हैं दोनों को ...और हारते हैं लाल जू ....हारने ही थे ...हारते हैं ....सखियाँ हाँसी करती हैं ...ठिठोली करती हैं ...अपनी प्यारी जू का पक्ष लेकर श्याम सुन्दर को छेड़ती हैं ....पर श्याम सुन्दर को भी बड़ा सुख मिल रहा है ....ये अपनी प्रिया से कभी जीतना चाहते ही नहीं हैं । 


निकुँज में आनन्द बढ़ता ही जा रहा है ....श्रीमहावाणी में लिखा है - सखियों ने एक विधि की ....ये विधि थी “डोरना” की ...यानि कंगन बन्धन की । ये डोरी बांधी जाती है कलाई में ....फिर इसे खोलना होता है .....चलिये , रसिकों ! इस रसमय विधि का सुख लूटिए ।  


॥ पद ॥


नहिं छूटै बरजोर लालन डोरना। तुम चितवत (कहा) चहुँओर ॥ ला० 

लीजै कोउ बुलाय, लालन० । जो अब करै सहाय ॥ ला० 

हमतो हैं सब एक, लालन० । जिनकें एकहि टेक ॥ ला० 

जो पै देहिं छुड़ाय, लालन० । परौ प्रिया जू के पाय ॥ ला०


॥ दोहा ॥ 


पाँय परै सेही भये, अर क्यों तजत अरैल । 

लाजभरे कहि सकत नहिं, छल करि हारे छैल ॥


॥ पद ॥


- छैलबर रहे लजाय लालन डोरना। दृष्टि चरनतर लाय ॥ ला० 

श्रीरंगदेवी दियो छोर लालन० । भई निरखि महारस बोर ॥ ला०

 आनँद बढ्यौ अपार लालन० । श्रीहरिप्रिया लै बलिहार ॥ ला०


******सखियाँ रसमयी हैं ....रस रँग से पूरी तरह भीजीं हैं ....इनके प्यारे और प्यारी , दुलहा दुलहन बनकर इनको सुख जो दे रहे हैं , इनको और क्या चाहिए ।  


“अब ये बांधा जाएगा”


रोरी में भिगोकर जब वो लाल हो गया उस डोरी को लेकर हरिप्रिया आयीं ....सब देख रहीं हैं , सखियाँ तो देख ही रही हैं , प्रिया जू और लाल जू भी चकित होकर देख रहे हैं ।


ये क्या है ? पास में जब हरिप्रिया आयीं और लाल जू से हाथ आगे करने के लिए कहा ...तो हाथ आगे करते हुए लाल जू ने पूछा । 


ये आप दोनों की परीक्षा है ....हंसते हुए हरिप्रिया ने डोर बाँध दिया । डोरी सुन्दर है ...रेशम की है ...केवल डोरी ही नही बांधी उसमें कुछ वस्तुयें भी बाँध दीं .....जैसे - काजल , छोटा सा अस्त्र चाकू , आइना छोटा सा , हल्दी की गाँठ आदि । केवल एक गाँठ लगाई हरिप्रिया ने लाल जू की कलाई में ।


फिर लाड़ली जू की बारी आयी ....तो उसमें चार गाँठ ...वो भी कस कर ।


काजल क्यों ? लाल जू को कौतुक है । 


ताकि आप दोनों को नज़र ना लगे । हरिप्रिया विधि में लगी है और उत्तर भी दे रही है । 


और ये चाकू ?    


ताकि मेरे नव सुकुमार दम्पति को को कोई शत्रु हानि न पहुँचाये । हरिप्रिया भाव में बोली थीं ।


श्याम सुन्दर कलाई में बंधे डोरना को ही देख रहे हैं ।     


आप को प्यारी जू से मिलना है ना ? हरिप्रिया पूछती है ।


हाँ , शीघ्र मिलना है ...इतना विलम्ब क्यों ...विवाह तो हो गया ना ? 


इन नव दुलहा की ये बातें सुनकर सारी सखियाँ हंस पड़ीं ।   


किन्तु , आपको पहले ये डोरना खोलना पड़ेगा । हरिप्रिया के ये कहते ही ....


“इसे तो मैं अभी खोल देता हूँ”.....ऐसा कहकर वो अपनी कलाई की डोरी खोलने लगे ।


नहीं , ऐसे नही ...आप प्रिया जू का खोलोगे और प्रिया जू आपका डोरना खोलेंगी ।


श्याम सुन्दर सोच में पड़ गये ....अपनी कलाई देखी फिर प्रिया जू की .....समझ गये ....बोले ...चतुर बन रही हो ...पक्ष अपनी स्वामिनी का ही लोगी .....श्याम सुन्दर के मुख से ये सुनते ही हरिप्रिया हंसीं ....क्यों प्यारे ! ऐसा क्या पक्ष लिया ? गाँठ प्रिया जू की पक्की है ....तो पुरुष भी तो आप हो ....इतना भी नही खोल सकते ! हरिप्रिया के कान में श्रीरंगदेवि जू ने कुछ कहा ...तो हरिप्रिया हंसने लगीं ....और हंसते हुए बोलीं ....ये खोलो तब जानें कि तुम खोलना भी जानते हो .....ये सुनते ही पूरा निकुँज ठहाका लगाकर हंसने लगा ....सखियाँ हरिप्रिया की पीठ ठोक रहीं हैं .....हरिप्रिया अभी भी हंसे जा रही है ।     


ठीक है ...चलो ....हम खोल देंगे इस डोरना को । श्याम सुन्दर ऐसा कहकर आगे बढ़े तो हरिप्रिया बोलीं ...पहले प्रिया जू खोलेंगी .....श्याम सुन्दर बोले ...ठीक है । हरिप्रिया ने प्रिया जू को आगे किया ....वो आगे आयीं और लालन का कंकन डोर खोलने लगीं .....दो ही गाँठ तो लगाये थे ...खोल दिये प्रिया जू ने ....बस फिर क्या था ...तालियाँ बजाकर सखियाँ मत्त हो गयीं .....किन्तु सभी निकुँज वासियों ने उस समय देखा कि उस कंगन डोर को जिसे हमारी प्रिया जी ने खोला था , लेकर तुरंत प्रिया जी के चरणों में दबा दिया । ये क्या किया ? श्याम सुन्दर पूछते हैं ...हरिप्रिया उत्तर देती हैं ...प्यारे ! अब तुम हमारी किशोरी जू के नीचे दबे ही रहोगे । सखियाँ इस बात पर भी उन्मुक्त हंसने लगीं ....सब आज हरिप्रिया को ही देख रहे हैं ।


अब बारी आपकी ...प्यारे ! खोलो प्यारी जू का “कंकन डोर”।  


खुश होकर आगे बढ़े श्याम सुन्दर .......प्रिया जी भी आगे खिसकीं ।


डोरना खोलने लगे .....पर गाँठ पक्की बाँधी है हरिप्रिया ने ...खुल नही रही ।


सारी सखियाँ तालियाँ बजाने लगीं .....प्यारे ! जीत न पाओगे हमारी प्यारी से । सब सखियाँ कह रही हैं ....पसीने आगये श्याम सुन्दर को .....वो बुद्धि बल का प्रयोग करते हैं ...किन्तु नही खोल पाते ....अब शरमा रहे हैं ....चारों ओर देखने लगे हैं । 


नही खुल रहा ? हरिप्रिया दुखी होने का स्वाँग करती है । फिर कहती है किसी को बुला लो । 


इस बात पर सारी सखियाँ फिर हंसने लग जाती हैं ....एक डोरना नही खोल पा रहे ....सुहाग सेज पर क्या करोगे ? सखियों का हंस हंस कर बुरा हाल है । वो लगे हैं गाँठ खोलने .....पर उनसे खुल नही रहा । वो इधर उधर देखते हैं ....तो सखियाँ हाथ हिलाकर कहती हैं ...हम सब तो इनकी हैं ..इनके पक्ष की है .....तुम अपने बल से खोलो ।   


सखी ! नही खुल रहा । बेचारे आखिर बोल पड़े ।   


तो हरिप्रिया ने कहा ....हमारी स्वामिनी जू के पाँव पड़ो ....बेचारे करते क्या ....प्रिया जी के चरणों में झुके ....लाज के मारे ऊपर दृष्टि उठा न सके .....अपनी दृष्टि प्रिया जी के चरण तल में ही लगा लिया ....तभी श्रीरंगदेवि जू आयीं और ऊपर की पक्की गाँठ खोल दी ....फिर तो लाल जू ने प्रसन्न होकर डोरना खोल दिया । सखियाँ नाच उठीं ....गाने लगीं ...हास्य विनोद चल पड़ा ....आनन्द अपार बढ़ गया । शहनाई की ध्वनि ने ब्याहुला उत्सव में और मंगल चाव की सूचना दे दी थी ।  


“जय जय दुलहा दुलहन सरकार की” 


सब सखियाँ उछल कर लगातार बोलती रहीं ।


क्रमशः

Hari sharan

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