google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 चैतन्यमहाप्रभु श्रीजगन्नाथ में समा गये... || भाग-53

चैतन्यमहाप्रभु श्रीजगन्नाथ में समा गये... || भाग-53


जगन्नाथ स्वामी नयन पथगामी भवतुमे...

( जगन्नाथाष्टकम )


माँ शची ने देह त्याग दिया महाप्रभु !


गोविन्द नामक सेवक ने आकर सूचना दी ।


गम्भीर हो गए चैतन्य… एक क्षण के लिए कम्पन हुआ था महाप्रभु के देह में ।


आषाढ़ का महीना लग गया है… जगन्नाथ रथयात्रा का समय आ रहा है… इसलिये जगन्नाथ पुरी में लोगों की भीड़ आनी शुरू हो गयी थी  ।


आज महाप्रभु गम्भीर हैं… कुछ ज्यादा ही गम्भीर ।


उनके मुखारविन्द से एक अपूर्व तेज़ प्रकट हो रहा है...


इतना तेज़ कि… कोई मुखारविन्द में देखने की हिम्मत भी नही कर रहा ।


आज प्रातः चैतन्य महाप्रभु श्रीमद्भागवत की कथा सुन रहे थे...


पता नही क्या हुआ… एकाएक आवेश में उठे… और जगन्नाथ मन्दिर की ओर दौड़ पड़े...।


इस तरह कभी भी महाप्रभु अकेले मन्दिर नही जाते थे...


सबको आश्चर्य हो रहा था कि… आज महाप्रभु अकेले दौड़े क्यों जा रहे हैं !


मार्ग में जो भक्त महाप्रभु को इस तरह दौड़े हुए देख रहे थे… वो अचम्भित थे… और वो भी देह भान भूल कर महाप्रभु के पीछे दौड़ रहे थे ।


चारों ओर से महाप्रभु के भक्त दौड़ पड़े थे… महाप्रभु के पीछे ।


आज भीड़ भी कुछ ज्यादा ही थी… रथ यात्रा के लिए यात्रियों का आना शुरु था ।


हरि बोल !   हटिये… सामने से हटिये… हरि बोल !


ये कहते हुए महाप्रभु के भक्त जन भीड़ को हटा  रहे थे… पर महाप्रभु को आज किसी की परवाह नही थी… उनकी दृष्टि में आज एक मात्र जगन्नाथ भगवान ही सामने थे ।


लोगों से टकराते… गिरते… उठते… महाप्रभु बस दौड़े जा रहे थे… मन्दिर में प्रवेश कर गए  महाप्रभु ।


नित्य जिस गरुणस्तम्भ से  दर्शन करते थे… वहाँ आज नही रुके… लोगों ने सोचा था यहीं से दर्शन करेंगे… पर नही...


आज तो सीधे गर्भगृह में प्रवेश कर गए ।


आश्चर्य !  महाप्रभु के गर्भगृह में प्रवेश करते ही… मन्दिर के दरवाजे अपने आप लग गए थे ।


गर्भगृह में एक मात्र पुजारी थे… जो जगन्नाथ भगवान की अर्चा कर रहे थे...।


उस पुजारी ने देखा… रोये जा रहे हैं महाप्रभु...


मुखारविन्द मानो चन्द्रमा का गोला ही लग रहा था...।


महाप्रभु हाथ जोड़कर खड़े थे… और  प्रार्थना किये जा रहे थे ।


हे जगत के नाथ !    इन कलियुग के जीवों का क्या होगा ?  


क्या काल के प्रभाव से ये आपके चरणों से दूर ही रहेंगे… और संसार सागर में डूबते उतरते… दुःखों से कभी दूर न जा सकेंगे ?


हे नाथ !    कृपा करो… आप को इनके ऊपर कृपा करनी ही होगी ।   नही तो बेचारे इसी तरह भव सागर में फंसे रहेंगे… नाथ ! कृपा करो ।


बस मैं इतना ही कहूँगा… कि कोई भी जीव आपके… राम, कृष्ण, हरि, नारायण… उन नामों का उच्चारण करे… तो आप उन्हें सम्भालेंगे… मुझे वचन दीजिये नाथ ! 


कुछ नही देखेंगे… बस आपका नाम लिया… चाहे भाव से हो… चाहे कुभाव से हो… आप  उनका ख्याल रखेंगे… आप उनके कर्मों का हिसाब मात्र नही देखेंगे… मुझे वचन दीजिये ।


पुजारी ने देखा… महाप्रभु के हृदय से करुणा का स्रोत फूट रहा था ।


कलियुग के जीवों के कल्याण की इन्हें कितनी फ़िक्र थी...।


महाप्रभु रोये जा रहे थे… नाथ ! आपको न्यायाधीश ही नही बनना है जो मात्र पाप पुण्य का हिसाब ही करता है… आपको ये भी ध्यान रखना है कि ये सब जीव आपके बच्चे हैं… बालक हैं… आप इनके नाथ हो… जगत के नाथ हो ।


इसके बाद महाप्रभु धड़ाम से गिर गए...


पर कुछ ही क्षणों में… उठ कर खड़े हो गए और  आनन्दित होकर नाचने लगे थे… जय जगन्नाथ ! जय जय जगन्नाथ ! 


आपने मेरी बात मान ली… मेरे प्रभु !  हे करुणा सिन्धु ! 


अब इस चैतन्य को भी अपने में समा लो… मैं  अब आपसे दूर नही रह सकता… हे नाथ !


ये कहते हुए दौड़े महाप्रभु जगन्नाथ भगवान के विग्रह की ओर ।


ये क्या कर रहे हैं आप ? नही महाप्रभु !   आप  श्रीविग्रह को आलिंगन नही कर सकते… ऐसा  मत कीजिये ।


पर आज महाप्रभु किसी की बात मानने वाले नही थे… स्वयं जगन्नाथ भगवान की भी नही… वो  अब एक होना चाहते थे… विश्वात्मा से एक होना… जगन्नाथ से एक होना...


अब दूरी सहन नही हो रही थी… द्वैत को समाप्त कर अद्वैत हो जाना चाहते थे ।


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काँचना नामक एक सेविका थी विष्णु प्रिया की...


नवद्वीप में...।


नित्य प्रातः… स्नानादि से निवृत्त होकर… महाप्रभु के चरण पादुका की सेवा करके… महामन्त्र का जप करती थीं… विष्णु प्रिया ।


एक बार… सोलह अक्षरों वाला… महामंत्र


हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।


एक बार बोलतीं… फिर एक दाना चावल का  बर्तन में डालतीं ।


दोपहर तक ये करती थीं… फिर उतने ही चावल का भात बनातीं… भोग लगातीं… और उसे प्रेम से ग्रहण करती थीं ।


यही नियम था नित्य विष्णु प्रिया का ।


आहा !  कितनी बड़ी तपस्या !  


बड़े बड़े ऋषि मुनि… साधू इठलाते इतराते हैं… अपनी तपस्या दिखा दिखा कर… पर देखो… इस विष्णु प्रिया को...।


आज प्रातः से ही हिचकी आ रही है प्रिया को ।


  "श्री कृष्ण चैतन्य… श्री कृष्ण चैतन्य"... यही कहते हुए बीती थी प्रिया की रात...


साथ की सेविका काँचना ने कहा भी था… आप आज सो नही रहीं क्या बात है ? 


पता नही… नींद नही आ रही ।


3 बजे ही उठ गयीं थीं  विष्णु प्रिया… और नीम के पेड़ के नीचे जाकर… उस मन्दिर में… जहाँ पादुका रखी थी… महाप्रभु की...


वहीं बैठ कर… महामन्त्र का जाप करती रहीं ।


लोग आये मिलने के लिए… पर मना कर दिया था  काँचना को विष्णु प्रिया ने… आज मैं किसी से नही मिलूंगी।


समय बीतता जा रहा था… काँचना को घबड़ाहट हो रही थी ।


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आप को मैं रोकूँगा… आप महाप्रभु ! जगन्नाथ के विग्रह को नही छू सकते… आप आगे मत बढ़िए...।


पर ये प्रेम का समुद्र आज थमने वाला कहाँ था...


ज्वार भाटा आ चुका था इस प्रेम समुद्र में तो ।


दौड़े महाप्रभु… ऐसे दौड़े जैसे कोई बिजली कौंधी हो ।


हे नाथ ! 


जोर से बोले… और अपने बाहु में भर लिया  जगन्नाथ भगवान के श्री विग्रह को  महाप्रभु ने… और समा गए महाप्रभु… जगन्नाथ में ।


शरीर सहित समा गए...।


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महाप्रभु !


काँचना ने सुनी… एक जोर से आवाज आई थी   विष्णु प्रिया की ।


आवाज सुनते ही… काँचना ने दरवाजा खोला… या कहूँ… तोड़ा… और भीतर का दृश्य जब देखा… तो बिलख उठी थी… काँचना ।


महाप्रभु की पादुका में… विष्णु प्रिया का मस्तक था ।


और विष्णु प्रिया के प्राण… उनके अपने  "प्राण"  में समा गए थे  ।


नवद्वीप शोकाकुल हो गया था ।


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जगन्नाथ मन्दिर का द्वार खुला...


पर वहाँ तो मात्र जगन्नाथ ही थे… चैतन्य विलीन हो चुके थे जगन्नाथ भगवान में ।


इतना विरह हुआ… महाप्रभु के भक्तों को… कि कितने भक्त तो समुद्र में कूद कर अपने शरीर को ही त्याग दिए ।


कितनों ने जगन्नाथ पुरी छोड़ दी ।


पर कुछ ऐसे भी थे… जो जगन्नाथ पुरी में चैतन्य महाप्रभु की गद्दी कहकर धन और कीर्ति कमाना चाहते थे… पर इससे क्या होगा ।


चैतन्य तो… "चैतन्य" में विलीन हो चुके थे...


कितने आश्रम हैं दुनिया में… कितने मठ हैं… कितने महन्त हैं… पर चैतन्यता कितनों में है ?


मैं तो महाप्रभु श्री कृष्ण चैतन्य के चरणों में बारम्बार प्रणाम करता हूँ… और एक भिखारी की तरह… झोली फैलाकर यही माँगता हूँ… कि  मुझे उस प्रेम रस की एक बून्द भी मिल जाए… तो मैं निहाल हो जाऊँ ।


आज अच्छा नही लग रहा… कुछ खाली सा लग रहा है ।


लग रहा है… मेरा  "चैतन्य" खो गया...


पर मुझे फिर भान हुआ… "चैतन्य" खोता नही है… वह तो सर्वत्र छा गया है… बस आँखें चाहिए… और प्रेम से सिक्त हृदय चाहिए...।


पर मेरे निमाई !  मेरे गौरांग ! मेरे चैतन्य महाप्रभु !  मेरे पास तो न आँखें हैं… न प्रेम से सिक्त हृदय… कृपा करो...

आप चाहो तो हो जाएगा… मेरी प्रार्थना सुनोगे ना ? 


आज यहीं पर  "चैतन्य चरित" का विश्राम ।


यही महामन्त्र आपको प्रिय था मेरे चैतन्य महाप्रभु...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।


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