चैतन्य चरित" पर कुछ अपनी बात...|| भाग-52
प्रणामो दुःखशमनस्तं नमामि हरिं परम्...
(श्रीमद्भागवत)
ओह ! आज ये सब लिखते हुए अच्छा नही लग रहा ।
कैसे विदा लूँ… कैसे जाने दूँ… उस प्यारे निमाई को… उन लक्ष्मी के पति गौरांग को… विष्णु प्रिया के "प्राण" को… और मेरे आराध्य बन चुके चैतन्य महाप्रभु को !
नेत्र रो रहे हैं… अविरल बरस रहे हैं...।
चैतन्य को खोजा… और जब चैतन्य मिला… तो "मैं" खो गया...।
मेरी दीदी ने मुझ से कहा… लोग शायद बोर हो रहे हैं… कितना विस्तार कर दिया… ''चैतन्य चरित" को ।
पर मेरा जबाब था… लोगों के लिए मैं लिख ही कहाँ रहा हूँ !
मैं तो अपने ही भीतर "चैतन्य" को खोज रहा था...।
साधकों ! एक घटना का उल्लेख करना आवश्यक समझता हूँ मैं ।
इस "चैतन्य चरित" को लिखने की शुरुआत करते हुए… मुझे डर लग रहा था… कि मैं लिख कैसे पाऊँगा...।
मुझे सम्पूर्ण चैतन्य महाप्रभु की जीवनी भी पता नही थी...
हाँ… बचपन में, वृन्दावन वाले रास धारी स्वामी श्री हरि गोविन्द जी की "चैतन्य लीला" अवश्य देखी थी… पर बचपन में… इतना स्मरण भी नही था।
सोचा… प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी की… "चैतन्य चरितावली" ग्रन्थ देख लूंगा… और जैसी प्रेरणा मिलेगी लिखता जाऊँगा ।
यही करता रहा था...।
पर बीच में प्रयाग राज का कुम्भ आ गया… सेल्फ ड्राइविंग करके एक महिने के लिए… सारे भागवत के कार्यक्रम स्थगित करके… कुम्भ के लिए निकल गया… घर वाले नाराज भी थे… अगर ऐसे ही करोगे तो दो बच्चे हैं… परिवार है… क्या खायेंगे ?
पर ठाकुर जी तो सब देखते ही हैं ना… ये विश्वास मेरे मन में दृढ़ था और दिन प्रतिदिन दृढ़ होते ही जा रहा है… अस्तु ।
मैं निकल गया कुम्भ । अब जब दूसरे दिन कुम्भ में "आज के विचार" में चैतन्य चरित का सीरियल लिखने के लिए बैठा… तो मेरे पास प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी की "चैतन्य चरितावली" ग्रन्थ नही था… मैं भूल गया था घर में ही ।
अब क्या करूँ ?
मैंने आँखें बन्द की… और भावना जगत में जाकर लिखना शुरू किया… जैसे " विष्णु प्रिया का प्रसंग"... मैं रोता था और लिखता था… भाव इतना बन गया था मेरे मन में... वो विष्णु प्रिया का त्याग… निमाई का घर छोड़ना… मेरे अंदर तक प्रवेश कर गया था… मैं कुम्भ में कहाँ था… मैं तो निमाई के साथ ही हो लिया था… और चैतन्य बनने के बाद तो उनको मैंने छोड़ा ही नही।
डर था मुझे… हरि ! तू भावना में लिख रहा है… (अब हल्के शब्दों में बोलूँ तो भावना मतलब… कल्पना) पर चरित्र की प्रमाणिक भी तो होनी चाहिये ।
तब मुझे याद आया… प्रयाग में ही झूँसी है… वहीं प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी रहते थे… शायद वहाँ मुझे "चैतन्य चरितावली" मिल जाए ।
ये बात भी मेरे दिमाग में चार पाँच दिन के बाद आई थी...
गाड़ी लेकर में निकलने ही वाला था कि… मेरे मित्र जानकी मन्दिर के युवराज राम रोशन दास जी आ गये… इन्हीं के यहाँ मैं रुका था...।
बोले… आप कहाँ जायेंगे महाराज जी ! चलिये श्री राजेन्द्र दास जी ने हम दोनों को बुलवाया है । मैंने अपनी बात उनसे कही कि मुझे एक ग्रन्थ लेना है… मुझे जाने दीजिये… पर उनका कहना था… वहाँ भी... श्री राजेन्द्र दास जी के कैम्प में भी बुक स्टॉल है… आपको वहाँ मिल जायेगा… मैं कहता हूँ ।
मुझ में एक कमी है… कि मैं किसी की बातों को काट नही सकता ।
उनकी बातों को भी न काट सका… मैं मिला श्री राजेन्द्र दास जी से… बातें हुयीं… पर वो ग्रन्थ मुझे नही मिला ।
जैसी चैतन्य महाप्रभु की इच्छा ! ऐसा विचार कर मैं फिर अपने मैं लीन हो गया… क्या करता ।
10 दिनों तक ऐसे ही लिखता रहा… भावना में बहता हुआ लिखता था… अष्टयाम की सेवा शुरू कर रखी थी मैंने… ये मैंने किसी को बताया भी नही था...।
अकेले में रहना ही मुझे प्रिय लगता था वहाँ… कुम्भ में ।
एक दिन… एक वृद्ध महात्मा जी मुझे खोजते हुए आ गये मेरे कैम्प में ।
मुझे चेहरे से नही पहचानते थे… हरिशरण ? यही पूछा ।
हाँ… कहिये… मैंने उनसे कहा ।
आपके लिए लाया हूँ मैं ये... कहते हुए उन्होंने अपने थैले में हाथ डाला… और प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी की चैतन्य चरितावली निकाल कर मेरे हाथ में रख दी… मैं उस ग्रन्थ को अपने माथे से लगाकर रो पड़ा… पर रोने से ही गड़बड़ हो गयी… वो महात्मा जी वहाँ से जा चुके थे ।
मैं बाहर दौड़ा… पर वो मुझे नही मिले ।
मैंने लोगों से भी पूछा कि... एक महात्मा आये थे आपने देखा क्या ?
पर नही… सबने मना कर दिया...।
मेरी समझ में नही आया… कि ये हुआ क्या ?
वो कौन थे ?
और मुझे "ये ग्रन्थ चाहिए" ये बात मैंने किसी को बताई भी नही थी ।
जनकपुर के भावी महन्त श्री राम रोशन दास जी को भी मैंने इतना ही कहा था कि… मुझे ग्रन्थ लेना है… कौन-सा… क्या… ये उन्हें भी नही बताया था...।
मैं उस रात और रोया… अपने ठाकुर जी के सामने खूब रोया… जब मैंने अपने लिखे पूर्व के "आज के विचार" को चैतन्य चरितावली से मिलाया… तब मैं चकित था… मैंने जो कल्पना की थी… (जिसे मैं भावना कहूँ तो ज्यादा ठीक रहेगा)...
बिल्कुल सही थी… हर चरित्र की प्रामाणिकता सिद्ध हो रही थी ।
जो मैंने लिखा था… वह ठीक था...
हाँ बस लिखने की शैली में भिन्नता थी ।
साधकों ! मैं कुछ नही कहना चाहता… न मैं ये कह रहा हूँ कि ये चमत्कार है… न मैं ये कह रहा हूँ कि… मैं कोई बहुत बड़ा भक्त हूँ ।
पर… इतना अवश्य कहूँगा… ये सब मुझ से लिखवाया मेरे कन्हैया ने… ये पक्की बात है ।
कल के चरित्र में… चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ भगवान के श्री विग्रह के समा जायेंगे… और उधर विष्णु प्रिया अपने प्राणों को अपने प्राण चैतन्य में समर्पित कर देगी...।
पर मैं ?
कल का चैतन्य चरित… उफ़ !
श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव ।
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