google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 माँ शची का परलोक गमन || भाग-51

माँ शची का परलोक गमन || भाग-51



शची नन्दन जय गौर हरि...

(कृष्ण दास)


नवद्वीप में आज प्रातः ही जगन्नाथपुरी से एक चैतन्य का अनुयायी आया था...।


वो सती साध्वी विष्णु प्रिया चरण पादुका की पूजा में लीन थीं ।


चैतन्य की पादुका !


...जैसे भरत जी श्री राम की पादुका के आधार पर अपने जीवन को सम्भाले थे… उद्धव जी श्री कृष्ण की पादुका को लेकर बद्री नाथ धाम में विराजमान हुए थे...।


ऐसे ही चैतन्य प्रिया विष्णु प्रिया ने अब अपना इष्ट  महाप्रभु के पादुका को ही बना लिया था ।


जगन्नाथ मन्दिर की प्रसादी विष्णु प्रिया के लिए आती थी ।


जगन्नाथ भगवान का अंग वस्त्र विष्णु प्रिया के लिए  मन्दिर से भेजा जाता था ।


विष्णु प्रिया अपने सिर से लगाती… और पूजा घर में रख देती थीं ।


पर शची माँ… जबरदस्ती करके वह वस्त्र… चुनरी ओढ़ने के लिए प्रेरित करती रहतीं...।


जब विष्णु प्रिया नही मानतीं… तब माँ शची यही कहतीं… पति आज्ञा सर्वोपरि होती है… ये सब  विष्णु प्रिया !  तुम्हारे पति निमाई ने भेजा है… पति का अपमान होगा...।


ओह !   अपमान होगा ?


नही… अपमान मैं अपने पति का कैसे कर सकती हूँ...


तब विष्णु प्रिया वह वस्त्र भी… और जगन्नाथ भगवान के आभूषण भी पहन लेती थीं ।


एक सेवक भेज दिया था अपनी माँ शची के लिए  चैतन्य महाप्रभु ने जगन्नाथ पुरी से ।


वही सेवक इधर उधर का काम करता था… बाकी  माँ शची की चरण सेवा करना… रसोई बनाना… ये सब विष्णु प्रिया ही करतीं ।


आज सुबह ही कोई भक्त आया था जगन्नाथ पुरी से...


उससे मिलने के बाद… पता नही क्यों माँ शची  बहुत उदास सी हो गयीं थीं ।


माँ शची के मुख मण्डल का तेज़ आज समाप्त सा हो गया था ।


विष्णु प्रिया ने ये अनुभव किया ।


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अर्ध रात्रि के समय  विष्णु प्रिया के पास आयीं माँ  शची ।


माँ ! विष्णु प्रिया लेटी थीं… माँ को देखते ही उठ गयीं।


माँ !  क्या हुआ ?   सब ठीक तो है ना  ? 


खींचा अपने पास विष्णु प्रिया को और गले से लगाकर रो पड़ीं ।


बेटी ! फिर माथे को चूमा विष्णु प्रिया  के… माँ शची ने ।


पर बताओ ना माँ !  आज आपको क्या हो गया  है ? 


बेटी !   आज  जगन्नाथ पुरी से निमाई का एक भक्त आया था… तब से मन रो रहा  है… हृदय फटा जा रहा है...।


पर वो ठीक तो हैं ना माँ !  विष्णु प्रिया घबड़ा गयीं थीं ।


कुछ नही बोलीं माँ शची...।


माँ बताओ ना ! वो ठीक तो हैं ना ?


शून्य में तांकती रहीं माँ शची ।


जब बहुत बार पूछा तब माँ शची ने बताया...


निमाई चार दिन पहले कूद गया था रात्रि के समय,  समुद्र में  !


ओह !  हे भगवान !  माँ ! कुछ हुआ तो नही ना ?


बिलख उठी थीं  विष्णु प्रिया ।


जैसे तैसे होश आया उसे… पर अब ठीक है निमाई ।


उन्हें कुछ न हो माँ… भले ही भगवान मुझे उठा ले ।


विष्णु प्रिया ने रोते हुए कहा।


ना… ना… बेटी !   जब तक निमाई इस धरती पर है… तब तक तुझे भी रहना है !


माँ !  ये क्या कह रही हो आप… मैं ऐसा वचन कैसे दे सकती हूँ ?


हाँ… बोल… तू अपने प्राणों को नही त्यागेगी !    


माँ ! पर आज इस अर्ध रात्रि को आप ये सब कहने क्यों आई हैं... मुझे कुछ अनहोनी सी  लग रही है माँ ! 


तू सती है बेटी !  तुझे जो लग रहा है… वह सही है !


माँ !   पहेली न बुझाओ ना ! बताओ ना क्या बात है ?


बेटी !  मेरा शरीर अब नही रहेगा  !


गम्भीर होकर माँ शची ने कहा ।


माँ !  ऐसा मत कहो… मैं अकेले इस घर को नही सम्भाल पाऊंगीं...


फिर कुछ सोच कर बोली विष्णु प्रिया… मैं भी आपके साथ जा रही हूँ… आप इधर प्राण त्यागेंगी… मैं भी गंगा जी में कूद कर अपने प्राणों का विसर्जन कर दूंगी ।


नही… तू ऐसा नही करेगी...


आवाज धीमी होती जा रही थी माँ शची की ।


बेटी !   मुझे बाहर लेकर चल ना !  तुलसी के पास ।


विष्णु प्रिया रो पड़ी… आप मिश्र परिवार के सब सदस्य जिद्दी क्यों हो… आपका बेटा भी जिद्दी… और आप माँ... आप भी ?


मेरी ओर तो देखो… मैं अकेली कैसे रहूँगी इस घर में ? 


माँ ! मत जाओ ना !    विष्णु प्रिया रोये जा रही है ।


बेटी !   अब समय आ गया है मेरा… मत रोक मुझे  ।


ये कहते हुए… विष्णु प्रिया का सहारा लेकर  माँ शची तुलसी के पास आ गयी थीं ।


अब शरीर में ताकत नही है… माँ शची के ।


विष्णु प्रिया की गोद में लेट गयीं ।


बेटी !  निमाई कहता है… भगवान का नाम अंतिम समय सुनने से मुक्ति मिलती है… बेटी !  प्रिया !   सुना ना भगवन्नाम !


सुना ना महामंत्र… माँ शची ने जब बार बार कहा...


तब विष्णु प्रिया ने हिलकियों के साथ सुनाना शुरू किया...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।


सिर एक तरफ झुक गया… साँसे रुक गयीं… माँ शची की...।


माँ !


दहाड़ मारकर रो पड़ी विष्णु प्रिया ।


************************************** 


विष्णु प्रिया ने ही अपनी सासू माँ का अंत्येष्टि कर्म करवाया...


गंगा जी में स्वयं स्नान किया...।


रात्रि में संकीर्तन हुआ...।


रो गयीं अकेली विष्णु प्रिया चरण पादुका में अपना सिर पटक पटक कर… अब और कितना कष्ट  दोगे मुझे विधाता...!


शेष चर्चा कल...


जय शची नन्दन… जय जगन्नाथ...


विष्णु प्रिया प्राण धन… गौर हरि...


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