प्रेम का पागलपन - चैतन्य महाप्रभु || भाग-50
हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासी क्वासि महाभुज…
(श्रीमद्भागवत)
शरीर सन्न पड़ जाता है… कँप कँपी छूटने लगती है...
शरीर से पसीना बहने लगता है… मुख पीला पड़ जाता है… आँखों से आँसू छोटी छोटी बातों पर बहते रहते हैं...।
गला भर आता है… अपने प्रिय की बातें करते ही शब्द ठीक ठीक उच्चारण भी नही हो पाता ।
देह में रोमांच होता है… कभी कभी हँसी आती है… तो कुछ ही देर में जोर से रोने का दिल करता है...
साधकों ! ये सब प्रेम के लक्षण है… आपने कभी ऐसा अनुभव किया है ?
"ना ! जी ! ऐसा तो किसी दुश्मन को भी न हो"
हाँ… सही कहा… पर याद रहे… ये सौभाग्य बि
विरलों को ही मिलता है… सदियों में कोई एकाद प्रेमी पागल ऐसा निकलता है… जिसे पाकर ये धरती धन्य हो जाती है… उसकी आह से निकलने वाली साँसों से दिशाएँ पवित्र हो जाती हैं ।
ऐसा प्रेमी जिस नदी में नहाता है… वह गंगा भी अपने आपको धन्य समझती है… सागर झूम उठता है...।
"ना ! जी ! हमें नही बनना ऐसा प्रेमी"
मुझे हँसी आई… चैतन्य कोई बन नही सकता !
ये तो स्वयं प्रेमावतार थे… प्रेमी बना नही जाता ।
वो तो ईश्वर के द्वारा ही गढ़ा गया होता है...
या ये कहूँ तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी… कि सच्चा प्रेमी दूसरा ईश्वर ही होता है ।
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गम्भीरा लीला...
जगन्नाथ पुरी में चैतन्य महाप्रभु रह रहे हैं आजकल ।
अब यहीं रहेंगे… और यहीं से अपने जगन्नाथ में समा जायेंगे ।
कई दिन पहले मुझ से एक मेरी साधिका ने प्रश्न किया था...
मैं चाहता तो उस प्रश्न का उत्तर उसी समय दे देता… पर मैंने नही दिया ।
प्रश्न था उनका… चैतन्य महाप्रभु श्री धाम वृन्दावन में क्यों नही रहे ?
श्री कृष्ण से इतना प्रेम होने के बाद भी… उनके धाम से प्रेम होने के बाद भी श्री वृन्दावन में क्यों नही रहे ?
मैं उस प्यारी साधिका को कहना चाहता हूँ...
ये बताने के लिये कि… प्रेमी जहाँ रहे… उसका प्रियतम वहीं है ।
ये ताकत… ये ठसक… उसके प्रेम की है...।
कबीर दास जी जीवन भर काशी में रहे… पर अंतिम समय मगहर में जाकर शरीर को त्यागा...
इसीलिए कि उन्हें अपने निष्ठा की ठसक थी… काशी में मरने से मुक्ति तो सबको मिलती है… मुझे भी मिले तो क्या बड़ी बात हुयी… फिर "राम की बहुरिया" बनने का मतलब क्या हुआ ?
साधकों ! प्रेमी एक अलग ही ठसक से भरा होता है… वो जहाँ होता है… उसका प्रियतम वहीं होता है...।
वह जहाँ होता है… वहीं वृन्दावन होता है… वहीं बाँसुरी बजती है उसके प्रेमास्पद की… वहीं महारास होता है ।
आप कहोगे… श्री धाम वास का मतलब क्या हुआ फिर ?
हमारे जैसे साधकों के लिए...
जिनको डर है… कि मन कहीं गलत जगह में न फंस जाए...
ऐसे नए नवेले साधकों के लिए...
श्री धाम किला है… दुश्मनों से बचने का… दुश्मन हैं - काम क्रोध लोभ ईर्ष्या… इनसे बचाती है हमें ये दिव्य धाम वृन्दावन ।
पर चैतन्य महाप्रभु जैसे भगवतरूप… तो जहाँ बैठें वहीं श्री धाम वृन्दावन बना लें… कबीर दास जी जैसे मगहर को भी काशी बनाने का माद्दा रखते हैं ।
आइये ! अब ये "गम्भीरा लीला" है...
हम अब चैतन्य चरित के उत्तरार्ध में ही चल रहे हैं ।
चैतन्य महाप्रभु का कितना आवेश… कितना प्रेम का उफान… उफ़ !
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रघुनाथ दास से आज श्रीमद्भागवत के रासपंचाध्यायी को सुन रहे थे चैतन्य महाप्रभु ।
"श्री कृष्ण अंतर्ध्यान हो गए… गोपियों को छोड़ कर"
रघुनाथ दास ने देखा… समय हो गया है… रात्रि ज्यादा हो रही है… मन में विचार किया… अब ज्यादा कथा सुनाना ठीक नही होगा… ऐसा विचार कर… रघुनाथ दास प्रणाम करके चले गए ।
अर्ध रात्रि में नींद खुल गयी महाप्रभु की...
चित्त में वही कथा थी… जो अभी सुनाकर गए थे...
"श्री कृष्ण अंतर्ध्यान हो गए… गोपियों को छोड़कर"
ओह ! बिना श्री कृष्ण के कैसे रह रही हैं गोपियाँ ।
दौड़ पड़े… समुद्र की ओर...
सब सोये हुए थे चैतन्य के अनुयायी… किसी को पता भी नही चला कि कब निकल गए महाप्रभु ।
महाप्रभु समुद्र की रेत में दौड़े जा रहे हैं… हा कृष्ण ! हा कृष्ण !
बस मुखारविंद से यही उच्चारण हो रहा है...
सामने दिखा… नीला समुद्र...
नीला… रुक गए चैतन्य...
उसी नीले समुद्र में उन्हें श्री कृष्ण दिखाई देने लगे ।
लहरें उठ रही थी… पूर्णिमा की रात्रि थी...
आकाश में पूर्ण चन्द्रमा को देखा… नीचे नीला समुद्र… उसकी सुभ्र लहरें...
मुस्कुराये चैतन्य… आहा ! मैं भी पागल था… अरे ! श्री वृन्दावन धाम में तो देखो महारास हो रहा है !
बस… इतना विचार मन में कौंधा ही था कि चैतन्य महाप्रभु ने छलाँग लगा दी… सागर में ।
सागर की लहरें महाप्रभु को उछालती रही… पछाड़ती रही ।
पर इन प्रेमी पागल को क्या परवाह… ये तो अपने श्री कृष्ण के साथ महारास कर रहे थे… नाच रहे थे...।
पूरी रात ऐसे ही बिता दिए...
उफ़ ! क्या पागलपन है यार !
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महाप्रभु नही हैं...
गोविन्द नामक महाप्रभु के सेवक ने आकर सबको बता दिया ।
क्या ?
चैतन्य के परिकर में हाहाकार मच गया ।
तू कहाँ था गोविन्द ?
सब लोग उस सेवक गोविन्द को डाँटने लगे थे...
मैं क्या करता… रघुनाथ दास जी भागवत सुना रहे थे… और काफी देर तक सुनाते रहे… मैं बाहर ही सो गया… सो क्या गया… बस नींद आ गई थी मुझे ।
सब लोग इधर उधर दौड़ लगाने लगे महाप्रभु को खोजने के लिए… कोई समुद्र के किनारे ढूंढने लगा था ।
तभी… एक मछुआरा… जो चिल्लाये जा रहा था… हरि बोल… हरि बोल ! हरि बोल !
अरे ! क्या हुआ ? इसे क्या हुआ ?
महाप्रभु को खोजने निकले एक सेवक ने उस मछुआरे की ये स्थिति देखी तो पूछ लिया ।
अजी ! क्या बताएं… ये सुबह सुबह मछली पकड़ने गया था जाल लेकर… तभी मछली तो आई नही… इसके जाल में एक मनुष्य का शरीर आ गया । अन्य मछुआरों ने आकर सारी बात बता दी थी ।
अब वो शरीर किसी ब्रह्म राक्षस का है या प्रेत का है… पता नही ।
पर उस शरीर को इसने जैसे ही छूआ… ये तो पागल हो गया ।
कोई ओझा हो… हो इसका भूत उतार दे… हम तो उसका बड़ा आभार मानते… मछुआरों ने कहा ।
चैतन्य के अनुयायी समझ गए...
उस मछुआरे को… एक तरफ ले गए...
और बड़े प्रेम से बोले… बताओ… कहाँ हैं वह शरीर जिसे तुमने समुद्र में पकड़ा था ।
मछुआरा लेकर गया उन्हें… और शरीर दिखाया ।
आहा ! स्वर्ण के समान कांति वाला शरीर… जो धूल धूसरित हो गया था… रोम रोम से कृष्ण कृष्ण कृष्ण… यही निकल रहा था ।
साँसे हल्की चल रही थीं...
तुरन्त महाप्रभु को उठाया… और लेकर चल पड़े थे… वैद्य राज के पास ।
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वैद्यराज आप दो घड़ी से इलाज कर रहे हैं… पर महाप्रभु को कोई लाभ क्यों नही हो रहा ?
वैद्य राज से सब लोगों ने कहा ।
मेरी भी कुछ समझ में नही आ रहा… अपने हाथ खड़े कर दिए वैद्यराज ने ।
निराशा का वातावरण बन गया था वहाँ ।
कोई रोने लगा… अब क्या होगा ? कोई कहे भुवनेश्वर ले चलो… वहाँ मैं जानता हूँ एक वैद्य जी को… वो राज वैद्य हैं ।
कोई कुछ… कोई कुछ...
तभी रघुनाथ दास आ गये...
आपने ही कल रात्रि में भागवत की कथा सुनाई थी ना ?
हाँ… रघुनाथ ने कहा ।
ये देखो ! महाप्रभु की दशा ? सब लोगों ने चैतन्य को दिखाया ।
नेत्रों से अश्रु प्रवाह चल पड़े… रघुनाथ दास के ।
अपराध हो गया मुझ से… "श्री कृष्ण अंतर्ध्यान हो गए" … यहीं तक कथा सुनाई थी मैंने… तभी ये सब हुआ है । मुझे कथा को वियोग में नही छोड़ना चाहिए था… गोपिकाओं के साथ मिलन करा देना चाहिए था… गलती हो गयी… रोते हुए कह रहे थे रघुनाथ दास ।
रघुनाथ ने अब "गोपी गीत" (भागवत का प्रेम गीत है ये )... चेतना आने लगी महाप्रभु के देह में ।
और जैसे ही गोपी गीत को पूरा किया… तुरन्त उठकर रघुनाथ दास को प्रगाढ़ आलिंगन किया था चैतन्य महाप्रभु ने ।
श्री कृष्ण मिल गए… श्री कृष्ण मिल गए… गोपियों को श्री कृष्ण मिल गए… ये कहते हुए महाप्रभु नाचने लगे थे ।
इस घटना के बाद चैतन्य के अनुयायी सावधान रहने लगे… क्यों कि अब इनका भावावेश बढ़ता ही जा रहा था ।
शेष चर्चा कल...
यार ! हमें पागल ही रहने दो… हम तो पागल ही अच्छे हैं ।
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