google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 आज के गुरुओं को चैतन्य महाप्रभु से शिक्षा लेनी चाहिए || भाग-47

आज के गुरुओं को चैतन्य महाप्रभु से शिक्षा लेनी चाहिए || भाग-47



स्फुरतु नो शची नन्दनः...

( रूप गोस्वामी )


मैं यात्रा में हूँ… मधुबनी (बिहार) जा रहा हूँ...


26  फ़रवरी से मिथिलाञ्चल के सिद्ध महादेव कपिलेश्वर भगवान को कथा सुनाने...।


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मेरे एक मित्र हैं… वैष्णव है… साधू हैं ।


कल मैं उनके पास बैठा हुआ था...


उनके पास एक वृद्ध साधक आये… उनके इष्ट थे  भगवान शंकर...


उनकी बड़ी निष्ठा थी भगवान शंकर पर… मैंने अनुभव किया।


वो मन्त्र भी जपते थे पञ्चाक्षरी… रुद्राक्ष पहने थे...।


और उन्होंने कहा था उनके ये इष्ट बचपन से ही हैं… और ये पञ्चाक्षरी मन्त्र ॐ नमः शिवाय… उन्हें किसी सन्यासी महात्मा ने दिया था… और  फिर उसके बाद वो मिले नही… उन सन्यासी महात्मा जी का कोई आश्रम भी नही था… जहाँ जाकर वो उनसे साधना सम्बंधित बातें पूछते… उनका ये कहना था ।


उम्र रही होगी करीब उनकी 70 वर्ष की ।


मेरे जो मित्र थे वैष्णव ...उनसे वो सलाह लेने आये थे कि साधना कैसे की जाए ?


मेरे मित्र ने कहा… आप मेरे शिष्य बनें… और तुलसी की माला धारण करें… मन्त्र  राम नाम का लें… और अपना इष्ट  बदल कर भगवान राम को अपना इष्ट बनाएं ।


वो बेचारे वृद्ध चुप हो गए...।


पर वो बोलते गए… बोलते गए… उन्होंने अंतिम में ये कहा… कि भगवान शंकर ही ये चाहते हैं  कि आप श्री राम के भक्त बनें ।


वो बेचारे वृद्ध साधक… बस इतना ही बोले… मैं अपना इष्ट चेंज नही कर सकता ।


साधकों !  इष्ट बदलते रहने से कोई लाभ नही है… ये बात आप अच्छे से याद रखें ।


आप ने अगर 10 वर्ष तक किसी को इष्ट माना है… तो उन इष्ट की छाप आपके मानस पटल पर बन गयी है...।


आप अगर उसके बाद इष्ट चेंज करते हैं… तो 10 वर्ष तक की साधना कहाँ गयी ? फिर आपको नए इष्ट के प्रति निष्ठा जगाने में इतना ही समय लगेगा… और ये सहज भी नही होगा… आरोपित होगा ।


क्यों कि आप इष्ट से प्रेम होकर चेंज नही कर रहे… आप एक व्यक्ति से प्रभावित होकर अपनी साधना को बदल रहे हैं...।


मेरे पागल बाबा कभी किसी का इष्ट नही बदलवातें… न मन्त्र ।


मैं बड़ी विनम्रता से कह रहा हूँ… आज के गुरुओं को अपने सम्प्रदाय की संख्या बढ़ाने में ही ध्यान नही देना चाहिए… साधक का जिससे भला हो  वही काम करना चाहिए ।


चैतन्य महाप्रभु के चरित को हम जब पढ़ते हैं… तब ये प्रसंग भी आता है… और चैतन्य ने बड़े मनोवैज्ञानिक तरीके से इसका समाधान किया है...।


हम इस चैतन्य चरित को आगे  पढ़ें… और विचार करें  ।


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काशी में तीन महिने तक रहने के बाद… चैतन्य जगन्नाथ पुरी की ओर चल पड़े थे ।


चैतन्य महाप्रभु के दो अंतरंग शिष्य थे… रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी ।


पर इनके एक भाई और थे… जिनका नाम था अनूप ।


एक बार ये तीनो भाई… रूप , सनातन और अनूप...


इनके मन में एक बार प्रबल वैराग्य जाग्रत हुआ… चैतन्य महाप्रभु के बारे में सुनकर… कि कोई  निमाई पण्डित… परम विद्वान्… पर एक दिन सब कुछ छोड़कर सन्यासी बन गए...


उनकी मस्ती… उनका आनंद… आहा !   इन भाइयों के मन में भी आया… चलो !   कितनी सेवा तो की इस यवन की… क्या मिला ? आज भी हमारे साथ हिन्दू कहकर ये हमें अपमानित करता है ।


( ये किसी मुसलमान के यहाँ कार्यरत थे… उस समय इन्ही लोगों का शासन था… ये अच्छे पद पर थे… पर  )


ऐसा विचार कर… ये  निकल गए थे चैतन्य के पास ।


महाप्रभु इन्हें मिले थे जगन्नाथ पुरी में ।


तीनों ने चरण पकड़ कर बहुत प्रार्थना की… हमें कृष्ण मन्त्र की दीक्षा दो...।


तीन दिन लगे इन लोगों को... चैतन्य देव को मनाने में...।


मान गए बाद में महाप्रभु ...और बोले ...कल मैं  तुम्हें दीक्षा दूँगा ।


उस रात इन तीनों भाइयों को ख़ुशी के मारे नींद नही आई थी...


पर अनूप शून्य में तांकते रहे थे...।


सुबह ही स्नान करके ये तीनों जब चैतन्य के पास गए… और मन्त्र लेने के लिए तैयार ही थे कि...


अनूप रो पड़े...


क्या बात है… आप रोते क्यों हैं ?  महाप्रभु ने पूछा ।


रूप और सनातन ने भी कहा - क्या बात है भैया !  क्यों रो रहे हो ?


तब अनूप ने रोते हुए कहा था...


भगवन् !   मेरे इष्ट श्री सीता राम जी हैं… बचपन से ही मैं सीता राम जी की भक्ति में ही लीन हूँ… मन्त्र भी राम राम जपता हूँ ।


रोते हुए बोले अनूप… मैंने कल रात बहुत कोशिश की… कि मैं अपना इष्ट बदल लूँ… मैं श्री कृष्ण को अपना इष्ट मानूँ...।


पर हे महाप्रभु !  मुझ से ये नही हुआ… मुझे मेरे धनुर्धारी श्री राम ही प्रिय हैं… मैं अपने प्राण त्याग सकता हूँ… पर अपना इष्ट नही बदल सकता… अब आप ही बताएं मैं क्या करूँ ?


रूप और सनातन अपने भाई को देखते रहे थे… चकित होकर ।


पर तुमने तो हमें कभी नही बताया ? रूप ने पूछा ।


मैं अपने इस प्रेम को छुपाना चाहता था… पर अपने गुरु से कैसे छुपाऊँ !


सब लोग अनूप की बातें सुनकर स्तब्ध हो गए… सब चैतन्य के अनुयायी चैतन्य की ओर ही देख रहे थे ।


आहा !  अनूप के मुख से इतनी बातें सुनते ही… महाप्रभु उठे...


और दौड़ कर अनूप को गले से लगा लिया… और कहा...


तुम मेरे प्रिय हो अनूप !


तुम से हम सब लोगों को ये शिक्षा लेनी चाहिए कि… अपने इष्ट के प्रति कितनी निष्ठा होनी चाहिये… तुम धन्य हो… तुम परम भक्त हो...।


मैं स्वयं कहता हूँ आज… कि तुम्हें स्वयं श्री कृष्ण भी आकर कहें… कि राम को छोड़कर मुझे इष्ट बना लो… तो भी तुम्हें नही बनाना चाहिए… तुम  राम राम जपो… यही मन्त्र तुम्हारे लिए अति उत्तम है… आहा !  तुमने तो एक आदर्श दे दिया… भक्तों को...।


इतना कहकर महाप्रभु जी ने… अनूप को छूआ… प्रगाढ़ आलिंगन करते रहे… और रोते रहे ।


राम… राम… राम… तीन बार कान में पढ़ दिया अनूप के ।


तभी साक्षात् श्री राम के दर्शन प्राप्त हो गए थे अनूप को ।


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मुरारी गुप्त… हाँ यही नाम था इन भक्त का ।


ये भी चैतन्य से मन्त्र दीक्षा लेने आये थे...


इनकी अपूर्व भक्ति थी… भक्ति देखकर ही  महाप्रभु जी ने इन्हें कृष्ण मन्त्र की दीक्षा दी ।


पर ये क्या...


10 दिन के बाद महाप्रभु के पास मुरारी गुप्त  आये...


और महाप्रभु के चरणों में अपना सिर पटक पटक कर बहुत रोये ।


क्या बात है मुरारी ! तुम परेशान हो… तुम अपने आप से लड़ रहे हो… मत लड़ो… जो बात है बताओ… देखो ! गुरु से कोई छुपाव ठीक नही होता… बताओ क्या बात है ?


मुझे पाप लगेगा… गुरु का अपराध होगा… गुरुमन्त्र का अपराध होगा… मुरारी रोये जा रहे हैं ।


अगर तुमने अपने हृदय की बात नही बताई… तब अपराध होगा… बताओ क्या बात है  ?  गम्भीर होकर चैतन्य ने कहा ।


हे महाप्रभु !  मैं बाल्यावस्था से ही हनुमान जी की आराधना करता हूँ… हनुमान जी ही मेरे इष्ट हैं… मेरे इस देह में आवेश भी आता है हनुमान जी का… मैं बचपन से ही श्री राम जय राम जय जय राम… इसी विजय मन्त्र का जाप करता रहा हूँ ।


आपसे मन्त्र लेने के बाद मैंने… बहुत कोशिश की… कि मैं आपके द्वारा दिए गए… श्री कृष्ण मन्त्र का ही जाप करूँ… और इष्ट श्री कृष्ण को ही बनाऊँ… पर नही हो पाया… मेरे चित्त में हनुमान जी और श्री राम  बहुत गहरे बसे हुए हैं...।


इन दस दिनों में… मैंने बहुत कोशिश की...


आपने सही कहा… मैं अपने आप से लड़ता रहा… पर असफल हो गया… मैं क्या करूँ  महाप्रभु ?  आप बताइये !


कुछ देर महाप्रभु आँखें बन्द करके बैठे रहे… फिर आँखें खोलकर बोले… तुम तो पूर्व जन्म के ही  हनुमान भक्त हो… और ये जो श्री राम जय राम जय जय राम… जपते हो… वो इसी जन्म का नही है… कई जन्मों से श्री राम भक्ति में लीन हो… तुमने मुक्ति मांगी नही… भक्ति ही माँगते रहे… तो मुक्ति तुम्हें मिली नही… भक्ति तुम्हारे अंदर कूट कूट के भरी हुयी है...।


नही… मुरारी !  मैं गुरु तुम्हें आज्ञा देता हूँ… श्री कृष्ण मन्त्र नही… तुम राम मन्त्र का ही जाप करोगे… खूब करो...।


आहा !  श्री राम… कितने सुंदर… कितने सौम्य… कितने दयालु… कृपालु… ये कहते हुए  आवेश में स्वयं आ गये थे महाप्रभु जी ।


मैं हूँ श्री राम… देखो ! ये कहते हुए धनुष बाण धारण किये श्री राम का दर्शन अपने ही शरीर में महाप्रभु जी ने कराया ।


तभी मुरारी को भी आवेश आगया… श्री हनुमान जी का ।


"जय श्री राम" इतने जोर से बोले मुरारी… कि   ये ध्वनि को सुनकर सब लोग डर ही गए थे… लाल मुख मण्डल हो गया था मुरारी का ।


मैं आपका… सेवक… हनुमान...!


क्या आज्ञा है  मेरे  प्रभु !  क्या आज्ञा है मेरे श्री रघुनाथ जी ! 


हुंकार भरते हुए मुरारी ने कहा था ।


हे हनुमान !  तुम बस मेरे इसी मन्त्र का जाप करो… यह विजय मन्त्र है… और इससे बड़ा कोई मन्त्र तुम्हारे लिये नही है ।


तब कुछ ही क्षण के बाद महाप्रभु भी मूर्छित हो गए थे… और उनके चरणों में मुरारी भी मूर्छित ही पड़े थे ।


शेष चर्चा कल...


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साधकों !   कभी भी अपना इष्ट मत बदलना...


किसी व्यक्ति विशेष से प्रभावित होकर अपनी साधना को मत बदलना… मन्त्र मत बदलना...।


मार्ग मत बदलना...।


अगर मार्ग बदलते रहोगे… तो पहुँचोगे कब यार !


ये बात  गुरुओं को भी समझनी होगी… क्यों कि  भक्त तो भोला होता है… उसके अंदर बस श्रद्धा है...।


पर  गुरुओं को  भक्त का जिसमें कल्याण हो… उसके बारे में सोचना चाहिए… न की अपने  सम्प्रदाय बढ़ाने के बारे में ।


ये बात मैं बड़ी विनम्रता से कह रहा हूँ ।


कुम्भ में 1 महिने रहने के बाद… मानसिक रूप से तो मैं पूर्ण स्वस्थ हूँ… पर शारीरिक रूप से कुछ कमजोरी है… पर शरीर है… इसका क्या  !


आज के लिये बस इतना ही...


ये संकीर्तन चैतन्य महाप्रभु खूब गाते थे...


राम राघव राम राघव राम राघव रक्ष माम् 

कृष्ण केशव कृष्ण केशव कृष्ण केशव पाहि माम् ।



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