काशी में चैतन्यमहाप्रभु और प्रकाशानन्दसरस्वती || भाग-46
श्चेतो कस्मान्मम निजपदे गाढ़मुप्त चकार...
( चैतन्य चन्द्रामृत )
प्रयागराज से चलते चलते काशी, भगवान विश्वनाथ की नगरी में पहुँचे थे चैतन्य महाप्रभु ।
साथ में चैतन्य के अनुयायी भी थे...।
तपन घोष नामक एक बंगाली भक्त थे… जो काशी में ही रहते थे ।
महाप्रभु के प्रति इनके मन में असीम असीम श्रद्धा थी… सो महाप्रभु इन्हीं के यहाँ रुके ।
तपन घोष के एक मित्र थे… जो महाराष्ट्र के ब्राह्मण थे… अच्छे धनी परिवार के थे… दो तीन पीढ़िया बीत गयी थीं काशी में रहते हुये ।
सत्संगी थे… काशी में कोई भी सन्त या विद्वान आता सत्संग के लिए ये अवश्य जाते।
तपन घोष के यहाँ रुके हैं महाप्रभु जी… तो इन महाराष्ट्रियन ब्राह्मण को निमन्त्रण दिया था तपन घोष ने ।
आज शाम को संकीर्तन होगा… मित्र ! आपको आना है… हम काशी वासियों का ये परम सौभाग्य है कि… चैतन्य महाप्रभु यहाँ पधारे हैं… तपन घोष ने कहा था ।
पर काशी में संकीर्तन ? यहाँ तो वेदान्त की चर्चा होनी चाहिए...
उन महाराष्ट्र के ब्राह्मण ने कहा था ।
आप मित्र ! आज तो पधारें...
दो दिन बाद आपके घर में वेदान्त की चर्चा हो जाए… तपन घोष ने मित्रवत सहज होकर ये कहा… और चल दिए ।
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ये महाराष्ट्र के ब्राह्मण एक साधक थे… काशी के प्रसिद्ध विद्वान प्रकाशानन्द सरस्वती के ।
हाँ , प्रकाशानन्द सरस्वती… ये वेदान्त के उद्भट विद्वान् थे...।
ब्रह्म बोध सम्पन्न इनके शिष्यों की संख्या काशी में पाँच हजार थी ।
ये कहीं भी चलते थे… तो पाँच हजार दण्डी सन्यासी इनके पीछे चलते थे ।
इन्हीं के पास में नित्य सत्संग को आते थे ये महाराष्ट्र के ब्राह्मण ।
हे भगवन् ! कोई चैतन्य महाप्रभु आये हैं… यही नाम बताया था मुझे तपन घोष ने… कह रहा था कि… आज संकीर्तन...।
हँसे प्रकाशानन्द सरस्वती… ओह तो वह पागल यहाँ भी आ गया !
अरे ! नाचना गाना… रोना… ये सब क्या सन्यासी को शोभा देता है… तुम्हीं बताओ ?
अरे ! सन्यासी को तो वेदान्त की चर्चा ही सुहाती है… ये क्या भक्ति भाव...?
फिर हँसते हुए बोले… काशी में ये भाव भक्ति कोई नही खरीदने वाला उस बंगाली सन्यासी चैतन्य महाप्रभु का ।
पर तुम जाओ… देखो !
और मैंने ये भी सुना है कि वह रोता बहुत है...
जाओ… उसका नाटक देखो… और मुझे बताना ।
प्रकाशानन्द सरस्वती ने उस महाराष्ट्र के ब्राह्मण से कहा ।
आज शाम को जा रहा हूँ मैं… भगवन् ! आप को वहाँ की सारी लीला बताऊंगा । उस ब्राह्मण ने इतना कहा… और चल दिया था ।
पर तुम मत फंस जाना, उसके जादू में...
ये बंगाली लोग काला जादू जानते हैं… ये कहते हुए प्रकाशानन्द खूब हँसे थे।
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आइये मित्र ! बस महाप्रभु आने ही वाले है...
अब संकीर्तन शुरू होगा...
आप पूरा आनन्द लेकर जाइएगा ।
तपन घोष ने उन महाराष्ट्र के ब्राह्मण से निवेदन किया और बड़े प्रेम से बैठाया ।
तपन घोष का घर भर गया था आज...
काशी में रहने वाले जितने बंगाली परिवार थे सब आये थे...
और भक्ति भाव के साधक काशी के कुछेक लोग भी थे ।
उस महाराष्ट्र के ब्राह्मण ने देखा… सामने से चैतन्य महाप्रभु आरहे हैं ।
दिव्य तेज़… अरुण अधर… गौर वर्ण… अत्यंत कोमल शरीर...
गैरिक वस्त्र...।
कन्धे पर हाथ रखे हुए हैं महाप्रभु… सनातन गोस्वामी के… चले आ रहे हैं ।
हे कृष्ण ! हे मधुसूदन ! हे गोविन्द !
फिर मृदंग बज उठे… झाँझ एकाएक बजने लगे...
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
नेत्रों से अश्रु प्रवाह चल पड़े...
जितने वहाँ दर्शक बनके आये थे… वो सब अब दर्शक नही रहे थे...
इस महासंकीर्तन के हिस्सा बन गए थे ।
सब की आँखों से आँसू बह रहे थे… सबको रोमांच हो रहा था ।
मृदंग की थाप… झाँझ की आवाज… सबके हृदय को आंदोलित कर रहा था… चैतन्य महाप्रभु का… बीच बीच में "हरि बोल" कहना… लोगों को और आनन्द सिन्धु में डुबो रहा था ।
पहले पहले तो वो महाराष्ट्र का ब्राह्मण हँसता रहा… ये सब देखकर ।
पर जब देखा कि महाप्रभु की प्रेम ऊर्जा फ़ैल रही है… और जो भी इसकी परिधि में आरहा है… उसे प्रेम के बन्धन में बाँध रही है ।
मन तो कर रहा था… उस महाराष्ट्र के ब्राह्मण का… कि मैं भी उठूँ… नाचूँ… गाऊँ… रोऊँ... हा कृष्ण ! कहकर चिल्लाऊं !
पर शुष्क ज्ञान के संस्कार थे हृदय में… वो कैसे रोने देते...
वो कैसे नाचने देते...?
हरि बोल ! हरि बोल ! हरि बोल !
संकीर्तन का विश्राम हो गया...।
चैतन्य के देह से सुगन्ध निकलने लगी थी… कमल की सुगन्ध ।
अब तपन घोष ने सबसे आग्रह किया...
प्रसाद अवश्य लेकर आप जाएँ...
हाँ… हाँ प्रसाद लेकर ही जायेंगे… पर मुझे महाप्रभु से मिलना है ।
उन महाराष्ट्र के ब्राह्मण ने तपन घोष से कहा ।
पर अभी महाप्रभु प्रसाद ग्रहण कर रहे हैं… तपन घोष ने कहा ।
हम भी ब्राह्मण ही हैं… खाते हुए उन्हें देख लेंगे तो कुछ गलत नही होगा ।
कुछ रूखे स्वर में बोले थे ये महाराष्ट्र के ब्राह्मण ।
ठीक है आइये… तपन घोष महाप्रभु के पास ले आये ।
सनातन गोस्वामी साथ में थे महाप्रभु जी के ।
अभी भी भावावेश में ही हैं महाप्रभु...
महाप्रभु ! ये बैंगन का भर्ता… ये साग की पकौड़ी...
ये भात… दाल… ये मिष्टी दही… ये सन्देश मिठाई… सनातन गोस्वामी महाप्रभु को खिलाना चाहते हैं… पर महाप्रभु खा नही रहें… वो बस… "कृष्ण कृष्ण कृष्ण"...यही कहते हुए रो रहे हैं ।
ये सब कृष्ण का ही प्रसाद है… महाप्रभु !
ये श्री कृष्ण का ही जूठन महाप्रसाद है… सनातन गोस्वामी ने कहा ।
इतना सुनते ही… चैतन्य महाप्रभु फटाफट खाने लगे… कहाँ है मेरे कृष्ण का जूठन ? लाओ… मैं उस महाप्रसाद को खाऊंगा...।
हँसे… जोर से ताली बजाकर हँसे वो महाराष्ट्र के ब्राह्मण ।
नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश कर गयी थी… उस भवन में ।
खाते खाते रुक गए महाप्रभु ।
कौन है यहाँ ? ये कौन है ?
सनातन गोस्वामी ने महाराष्ट्र के उस ब्राह्मण को देखा ।
सन्यासी होकर बहुत माल खाते हो आप ?
ये कहते हुए हँसा… वो ब्राह्मण… और संस्कृत में श्लोक बोलने लगा...
जो उसके गुरु प्रकाशानन्द सरस्वती बोलते थे...
" विश्वामित्र, पराशर आदि मुनिगण केवल वायु, जल पत्ते खाकर रहते थे फिर भी काम वासना के शिकार हो गए...
और जो अब घी दूध से बने पदार्थ खाकर अपने आपको जितेन्द्रिय मान रहे हैं… वो पांखडी हैं "।
चैतन्य महाप्रभु ने उस ब्राह्मण की ओर देखा… अब मुस्कुराये...
और तुरन्त एक संस्कृत का श्लोक भी सुना दिया...
"बलवान सिंह - हाथी ये सब खूब खाते हैं… खाते ही रहते हैं… पर वर्ष में एक बार मात्र सम्भोग करते हैं… परन्तु कबूतर पक्षी तो तिनका और पत्थर के कणों को ही खाता है… फिर भी नित्य सम्भोग करता है… क्यों ?
हे ब्राह्मण ! आप बता सकते हो क्यों ?
महाप्रभु ने उस ब्राह्मण से ही पूछा ।
कोई उत्तर नही था उस ब्राह्मण के पास...
नीचे सिर कर लिया… और हाथ जोड़कर बोला… महाप्रभु ! कल मेरे यहाँ आप पधारें… कृपा करें ।
काशी के समस्त सन्यासी मेरे यहाँ रहेंगे… आप को अवश्य आना है ।
ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर कहा ।
पर मैं किसी सभा इत्यादि में नही जाता… महाप्रभु ने मना किया ।
नही… कोई सभा नही है… सब अपने ही लोग रहेंगे… आप को आना ही पड़ेगा… ब्राह्मण ने तपन घोष की ओर देखते हुए कहा ।
ठीक है… मैं आऊंगा ।
खुश होकर वो ब्राह्मण गया...
और सारी बातें, घटना... प्रकाशानन्द को बता दी थीं ।
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पाँच हजार ब्रह्म बोध सम्पन्न सन्यासी शिष्यों के साथ प्रकाशानन्द सरस्वती सभा में बैठे हैं ।
सब इन्तजार में हैं कि चैतन्य महाप्रभु के साथ आज शास्त्रार्थ होगा ।
समय बीता जा रहा है… पर क्या हुआ… क्यों नही आये चैतन्य… महाराष्ट्र के ब्राह्मण ने तपन घोष के यहाँ अपने कुछ लोगों को भिजवाया… पर वहाँ पता चला… कि… मणिकर्णिका घाट में स्नान करने के लिए निकले हैं महाप्रभु जी ।
फिर भगवान विश्वनाथ के दर्शन करते हुए आयेंगे।
बहुत समय लगेगा… प्रकाशानन्द ने कहा ।
पर इंतज़ार तो करना ही था ।
पर कुछ ही समय बाद...
हरि बोल ! हरि बोल ! हरि बोल !
संकीर्तन की सुमधुर आवाज सुनाई दी सबको ।
झाँझ, मृदंग… सब बज रहे थे ।
इतनी भीड़ आ गई है साथ में… कि ये स्थान तो छोटा पड़ जाएगा… उस आयोजक ब्राह्मण को चिन्ता होने लगी थी ।
काशी की जनता ही मानो इस नगर संकीर्तन में उमड़ पड़ी ।
आश्चर्य ! गुरु जी ! काशी की जनता तो प्रबुद्ध है… फिर ऐसे नाच गाने में भी...!
जादू जानता है… ये चैतन्य ! और नाचना गाना मूर्खों को प्रिय है ही… प्रकाशानन्द ने झेंप कर कहा ।
महाप्रभु आये… पसीने बह रहे हैं… आँसू निकल रहे हैं...
भाव में डूबे हैं महाप्रभु ।
जैसे ही सभा के मंच पर जाने लगे… उस ब्राह्मण ने रोक दिया… आपके चरणों को तो धो लूँ !
नही… मैं स्वयं धोऊंगा… चैतन्य स्वयं जल का पात्र लेकर अपने पाँव धोने लगे थे ।
सब लोग देख रहे हैं...।
प्रकाशानन्द सरस्वती ने देखा… दिव्य तेज़ प्रकट हो रहा है… मुखारविन्द से महाप्रभु का ।
पर ये क्या… ये तो वहीं बैठ गए… जहाँ अपने पाँव धोये थे ।
इतनी दैन्यता ? प्रकाशानन्द उठे… और जाकर निवेदन किया… आप सन्यासी हैं… ब्राह्मण थे पूर्व में… इस तरह नीचे न बैठें सभा में आसन ग्रहण करें ।
महाप्रभु ने हाथ जोड़कर कहा… मैं ब्राह्मण नही हूँ… मैं क्षत्रिय भी नही हूँ… मैं न वैश्य हूँ… न शुद्र ।
मैं सन्यासी भी नही हूँ… न गृहस्थी… न ब्रह्मचारी… न वानप्रस्थी...।
फिर मेरा सम्मान क्यों ?
मैं कुछ नही हूँ… इतना कहते हुए प्रकाशानन्द के चरण छूने लगे थे चैतन्य ।
फिर आप क्या हैं ? आपका परिचय क्या है ?
सारी सभा मुड़ चुकी थी… इस दृश्य को देखने के लिए ।
आहा ! अपना परिचय देते हुए महाप्रभु ने कहा...
मैं ?
मैं तो श्री कृष्ण प्रेमी के चरणों का दास… दासों का भी दास हूँ...
मैं तो प्रेमियों के चरणों की धूल हूँ… मैं तो प्रेमियों के चरणों में ही अपना स्थान चाहता हूँ... हे कृष्ण! हे कृष्ण ! कहते हुए फिर रोने लगे थे ।
महाप्रभु ।
जबरदस्ती हाथ पकड़ कर सभा के मंच में बैठाया था प्रकाशानन्द ने ।
आप सन्यासी हैं… फिर आप वेदान्त की चर्चा क्यों नही करते ?
महाप्रभु से पूछा ।
मेरे गुरुदेव ने मुझे वेदान्त चर्चा की आज्ञा नही दी… शायद मैं इसका अधिकारी नही हूँ...।
आपको किसकी आज्ञा दी है आपके गुरु ने ?
प्रकाशानन्द ने पूछा ।
कृष्ण मन्त्र दिया है मुझे… और कहा है कृष्ण कृष्ण जपो !
मुझे आज्ञा उन्हीं की माननी चाहिए ना ?
इसलिये मैं कृष्ण कृष्ण जपता हूँ… महाप्रभु ने उत्तर दिया ।
पर सन्यासी को पञ्चाक्षरी जपना चाहिए… भगवान शंकर ही हमारे सन्यास धर्म के इष्ट हैं… प्रकाशानन्द ने स्पष्ट किया ।
जहाँ मणिकर्णिका है, जहाँ गंगा बहती हैं… जिस स्थान में स्वयं महादेव विराजकर मुक्ति को बाँटते हैं… किन्तु कुछ मूर्ख सन्यासी हैं… जो इस दिव्य काशी को छोड़कर अन्य स्थानों में भटकते हैं ।
ये भरी सभा में चैतन्य महाप्रभु को सुनाने के लिए प्रकाशानन्द ने कहा था...।
हँसे महाप्रभु ! हे मेरे मित्र ! गंगा कौन हैं ?
क्या मेरे श्री कृष्ण के चरणों की धोवन नही हैं ? क्या मेरे कृष्ण के चरणों से नही निकली है गंगा ?
और काशी पति भगवान विश्वनाथ अपने मस्तक में जिस गंगा को धारण करते हैं… क्या वो मेरे श्री कृष्ण का चरणोंदक नही है ?
और मित्र ! भगवान शंकर जो मुक्ति काशी में बैठकर लुटा रहे हैं… वो क्या इसलिए नही… कि..."राम राम" का जप करते हैं शंकर जी... इसलिए मुक्ति बाँट रहे हैं !
महाप्रभु के मुखारविन्द से ये शास्त्र सम्मत बातें सुनकर प्रकाशानन्द चुप हो गए… सभा स्तब्ध हो गयी ।
आप कहना क्या चाहते हो ?
प्रकाशानन्द ने पूछा ।
करुणा से भर गए चैतन्य महाप्रभु...
कुछ नही होगा ये अहंकार पालने से...
ये वाणी का विलास… ये विद्वत्ता… मैं सन्यासी… ये गृहस्थी… इन सबसे… क्या देह भाव ही पुष्ट नही होता ?
हे प्रकाशानन्द महाशय ! मेरे इतने शिष्य… मेरी इतनी कीर्ति… इन सबसे कुछ हाथ नही लगने वाला ।
आँखों में आँखें डाल कर बोल रहे थे चैतन्य ।
आप श्री कृष्ण का नाम लो… मेरी बात मानो हे श्री पाद प्रकाशानन्द ! आप कृष्ण का भजन करो...।
श्री कृष्ण के चरणों का चिन्तन करो...
भगवान शंकर भी वही करते हैं...।
गाओ ! अहंकार गलेगा...
नाचो ! देह भान छूटेगा...
रोओ ! चित्त पिघल जाएगा...
सारे संस्कार जल जायेगे...
मुक्त तो तुम हो ही..."मैं बन्धन में हूँ"... ये मिथ्या धारणा तुमने बना ली है...
इसको हटाओ… और इन शुष्क ज्ञान में ज्यादा मत पड़ो...
प्रेम ही है सार ! प्रेम करो… प्रेम...
बोलो ! प्रकाशानन्द ! हरि बोल !
हरि बोल !
हरि बोल !
ये कहते हुए गले से लगा लिया चैतन्य ने प्रकाशानन्द को ।
रोमांच हो गया… शरीर में कम्पन होने लगा ।
नेत्रों से अश्रु बहने लगे...
पर… रो नही रहे थे प्रकाशानन्द ।
हाथ पकड़ कर झकझोरा चैतन्य ने...
इनको बहने दो… मत रोको… ये तुम्हारे संस्कार हैं… आज खाली हो जाओ… भीतर से शून्य हो जाओ… सब बहा दो ।
जोर से चिल्लाये… प्रकाशानन्द… हरि बोल !
हाँ… और जोर से बोलो… प्रकाशानन्द ! शरमाओ मत...
फिर जोर से चिल्लाये… हरि बोल !
नेत्रों से अश्रु प्रवाह चल पड़े थे...
चरणों में धड़ाम से गिरे प्रकाशानन्द, चैतन्य महाप्रभु के।
प्रेम की दीक्षा मिल गयी थी प्रकाशानन्द को ।
इन्हीं प्रकाशानन्द का नाम प्रबोधानन्द सरस्वती हुआ ।
जिन्होंने श्री धाम वृन्दावन आकर… " वृन्दावन महिमामृतम् " नामक एक अद्भुत ग्रन्थ की रचना की थी ।
शेष चर्चा कल ...
अतएव तार मुखे ना आइसे "कृष्ण नाम"
कृष्णनाम, कृष्णस्वरूप - दुइ तो समान ।
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