नाम जापक साधकों के लिये || भाग-45
कलौ तद् हरि कीर्तनाद्...
( श्री मद्भागवत )
साधकों !
क्या कारण है… मेरे साधक ऐसे ऐसे हैं… जो नित्य एक लाख भगवन्नाम जप करते हैं… पर कोई विशेष लाभ दिखाई नही देता ।
उनकी स्थिति में कोई विशेष फर्क पड़ता हुआ दिखाई नही दे रहा… क्या कारण है ?
कल गौरांगी ने मुझ से कहा… पागलबाबा आपको बुला रहे हैं ।
ओह ! पता नही क्यों इतना सुनते ही मेरे नेत्रों से अश्रु बहने लगे थे ।
मैं गया… चरणों में साष्टांग प्रणाम किया था मैंने।
बहुत दिन लगा दिया ?
बाबा ! कुम्भ में था… आपसे ही आज्ञा लेकर गया था ना !
पर कुम्भ से आये हुये तो तुम्हारे 4 दिन हो गए हैं !
बाबा इतनी आत्मीयता से पूछ रहे थे… जैसे इनको मुझ से बहुत मतलब है… ऐसे निरपेक्ष सन्त जब लीला करें तो मुझे हँसी आनी स्वाभाविक ही थी ।
अच्छा ! आज श्री धाम वृन्दावन की परिक्रमा देने चलोगे ?
मैं ख़ुशी से झूम उठा था… गौरांगी की ओर देखते हुए बोला… बाबा ! ये तो बहुत आनन्द की बात है...।
अच्छा आ जाना दोपहर को 3 बजे… बाबा की आज्ञा सिर माथे पर...।
3 बजे आजाऊंगा… wow… बहुत आनन्द आएगा… गौरांगी ।
वो मुझे देखती रही थी ।
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3 बजे मैं पहुँच गया था कुञ्ज में...
बहुत साधक थे… सब आज अपने सद्गुरुदेव भगवान के साथ परिक्रमा लगाने के लिए उत्सुक थे।
गौरांगी बाबा के साथ है… मुझे बाबा ने अपने पास बुला लिया है ।
धूप आज हल्की है… ठीक है… हल्की धूप है… नही तो कल की धूप तो बहुत तेज़ थी… गौरांगी तुझे तो गर्मी बर्दाश्त नही होती ना… तेरा तो सिर दुखने लग जाता...
वो हँसनें लगी… बाबा मौन हैं ।
परिक्रमा लगाते हुए… एक बड़े से नाला में… "श्री राधा" लिखा हुआ एक स्टीकर… पड़ा मिला...
गौरांगी ने उसे निकाल लिया… और बाबा से बोली… बाबा ! बताओ नाली में "श्री राधा"...! कितना बड़ा अपराध है !
लोग ऐसा क्यों करते हैं… ये तो बहुत बड़ा पाप है ।
गौरांगी बोले जा रही थी...।
मैं बाबा के मुख की ओर देख रहा था...
बाबा थोड़ी देर बाद बोले… नाली में भी "श्री राधा"...!
आहा ! सर्वत्र "श्री राधा" ...अच्छे बुरे हर जगह में "श्री राधा"...।
इतना बोलकर बाबा फिर चुप !
मैंने गौरांगी की ओर देखा… तो वह सिर नीचे करके बस चली जा रही थी...।
यमुना जी का किनारा आगया था ।
हम सब लोग वहीं बैठ गए… यमुना की बालुका में ।
बाबा गौरांगी की ओर देखकर - हम सबके लिए बोले...
तुम सब लोग एक दिन में कमसे कम 1 लाख नाम जप तो करते हो… है ना ?
सब लोगों ने कहा… जी बाबा ! करते हैं ।
गौरांगी ! तुम तो 3 लाख नाम जप करती हो ?
उसने भी सिर झुकाकर कहा… जी बाबा !
पर क्या कारण है… जितनी उन्नति होनी चाहिए थी… उतनी नही हो रही… जैसी स्थिति बननी चाहिये थी… वो नही बन पा रही...।
क्या तुम्हें पता है… एक लाख नाम जप नित्य करना… ये कोई साधारण बात नही है… एक लाख नाम जापक चाहे तो विश्व के समस्त रोगों को खत्म कर सकता है… जो चाहे वही पा सकता है ।
विश्व की अशान्ति मिटा सकता है… नाम में इतनी ताकत है ।
पर यहाँ तो अपनी ही शान्ति नही मिट रही… कारण क्या है तुमको पता है ? बाबा ने गौरांगी से पूछा ।
गौरांगी कुछ नही बोली...
बाबा ने मेरी ओर देखा… मैं भी कुछ नही बोला।
बाबा ने गम्भीरता के साथ कहा… नाम का पूर्ण फल न मिलने का कारण है… परदोष दर्शन… दूसरे की निन्दा !
बाबा बोले… याद रहे… दूसरों की निन्दा तुम जितनी करोगे… उतना ही नाम जाप का फल रिसता चला जाएगा...।
( साधकों ! मैंने कभी भी बाबा को परदोष दर्शन करते हुए नही देखा… आज भी गन्दी नाली में "श्री राधा" लिखा हुआ मिला स्टीकर मिला… तो उसकी भी निन्दा न करते हुए… नाली में भी राधा नाम ! आहा ! ऐसी भावना को अपने हृदय में स्थान दिया )
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दस नामापराध… इससे बचना बहुत जरूरी है...
नाम जप साधकों को… ये जानना अति आवश्यक है… नही तो… अँधा रस्सी बनाये… पीछे से भैंसा का पड्डा रस्सी को चबाता जाए...।
हमारी यही हालत है… बाबा ने कहा।
नही तो एक बार नारायण नाम लेने से… अजामिल नर्क जाने से बच गया… सोचो कितने पाप किये थे उसने… पर मात्र नारायण नाम लेने से ही।
और तुम लोग एक लाख नाम नित्य जपते हो… फिर भी स्थिति वहीं की वहीं ! क्यों ?
बाबा बड़े प्रेम से हम सबको समझा रहे थे ।
चैतन्य महाप्रभु ने इस दस नामापराध से बचने की शिक्षा अपने शिष्यों को दी है… पागल बाबा इतना बोलकर… दस नामापराध गिनाने लगे थे।
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1) किसी की भी निन्दा करना… ये पहला अपराध है ।
बाबा बोले… निन्दा से बचो… हमारा ये अपराध बहुत बनता है… इसलिये हमको वो लाभ नही मिलता नाम जप का… जो मिलना चाहिए ।
2) महादेव शिव शंकर को छोटा समझना...
बाबा बोले… भगवान शंकर वैष्णवों के गुरु हैं… गुरु को निम्न कैसे समझ सकते हो तुम ? ये बहुत बड़ा अपराध है।
3) गुरु की आज्ञा न मानना...
गुरु जो कहे… उसे मानो… गुरु की आज्ञा पालन में कभी भी प्रमाद मत करो...।
4) वेद और शास्त्र की निन्दा करना...
बाबा बोले… ये वेद और शास्त्र भगवान के द्वारा ही रचित हैं...
क्यों कि गीता में ही भगवान श्री कृष्ण ने कहा है… "आचार्य मेरा ही रूप है "... और दूसरी बात- शास्त्र लिखने वाले जो थे… वो निरपेक्ष थे… उन्हें न अपने नाम की परवाह थी… न यश या कीर्ति की चाह थी… जो सत्य है… वो लिख दिया गया...।
इसलिये वेद और शास्त्र की निन्दा कभी मत करना… अगर करते हो तो ये नामापराध में आता है ।
5) नाम की महिमा सुनकर ये कहना कि… ये तो अतिशयोक्ति है ।
यानि नाम की महिमा को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत किया गया है...।
ऐसा अगर आप सोचते हैं… तो ये नामापराध में आता है… ये अपराध है… नाम की महिमा इतनी है कि… "अकथ" है...।
उसे कहा नही जा सकता...।
इसलिये कभी भी ये मत सोचना कि… नाम की महिमा ऐसे ही है… या हमें नाम के प्रति लगाने के लिए ये सब कहा गया है...।
नही… नाम की महिमा… अद्भुत है ।
6) ये भी नामापराध में आता है… कि नाम की बात करते हुए… अन्य साधनों की निन्दा करना ।
जैसे - नाम जप ही श्रेष्ठ है… ध्यान व्यान बेकार है…या तीर्थों में जाना बेकार है।
बाबा बोले… निन्दा से बचना बहुत जरूरी है… किसी में भी दोष दृष्टि रखना अपराध है।
7) कोई बात नही… भगवन्नाम हमारे पापों को मिटा देगा...
पाप हो गया है… इतना नाम जपते तो हैं… इसी नाम से पाप भी कटते जायेंगे… ऐसा सोचना भी नामापराध है।
नाम जप के भरोसे पाप करना...।
बल्कि पाप अगर हो गया है… तो भगवान से कहना… पाप को भोग लूंगा मैं… पर नाम का उपयोग पाप के प्रायश्चित में नही करूँगा ।
आप ऐसी भावना करेंगे… तो देखिये नाम जप का फल आपको तुरन्त मिलेगा ।
8) नाम जप को दान पुण्य तीर्थ इत्यादि की श्रेणी में रखना ।
नही… आप क्यों भूल जाते हैं… कि नाम और नामी (भगवान) में कोई अंतर नही है… दोनों एक ही हैं… नाम नामी दोनों अभेद हैं।
फिर कहाँ इसकी तुलना आप… तीर्थ, व्रत, पुण्य इत्यादि के साथ कर रहे हैं...।
9) जिसके मन में श्रद्धा नही है… उसे भी नाम की महिमा सुनाना ।
बाबा बोले… ये भी नामापराध है… अश्रद्धावान को भगवन्नाम के साधना का उपदेश करना… ये ठीक नही है।
हाँ… सत्संग दें… पहले उसे ध्यान इत्यादि के द्वारा शान्त करें… नियम में आबद्ध करें उसे… फिर जब श्रद्धा जागे तब इस गोपनीय नाम महिमा को प्रकट करें।
बाबा ! ऐसा क्यों ? गौरांगी ने पूछा ।
क्यों कि गौरांगी ! तर्क से तुम नाम की महिमा को सिद्ध नही कर सकतीं… ध्यान तर्क से सिद्ध हो जाएगा… पर नाम की साधना से क्या चमत्कार हो सकता है… इस बात को तुम बुद्धि से सिद्ध नही कर सकतीं… ये तो अनुभव का विषय है… नाम का जाप करो… और उसका असर देखो !
बाबा हँसे… एक वॉशिंग पाउडर का विज्ञापन परिक्रमा मार्ग में छपा हुआ था… बाबा उसे दिखाते हुए बोले… क्या लिखा है इसमें ? गौरांगी ने कहा… "पहले इस्तेमाल करो… फिर विश्वास करो !
हम सब साधक हँसे...।
बाबा बोले… बस नाम की महिमा भी ऐसे ही है… पहले नाम जपो… तब अनुभव में आएगा… कि इसकी महिमा क्या है !
10) नाम जपते हुये "मैं देह हूँ" ये विचार करना ।
ये अंतिम नामापराध है ।
नही… हम देह कैसे हो सकते हैं ? हम तो चिन्मय हैं… और चिन्मय होकर ही नाम का जाप करते हैं...।
ये शरीर हम नही हैं… हम मन भी नही हैं… बुद्धि भी नही है… चित्त और अहं भी नही है… हम तो आत्मतत्व है।
ऐसा विचार करते हुए नाम जपना...।
( साधकों ! इस स्थिति में नाम जपा नही जाएगा… प्रकट होगा )
बाबा ने बड़े प्रेम से कहा… कोशिश करो… ये दस अपराध से तुम बच जाओ… अगर नही कर सकते हो… तो कम से कम निन्दा से तो बचे रहो… किसी की निन्दा मत करो… सब सही है… सब ठीक है… गलत तुम्हारा अहंकार है… निंदनीय तुम्हारा ईगो है… बाकी और कोई निंदनीय नही है… सब लीला चल रही है लीला बिहारी की… ऐसा विचार करो… फिर देखो… तुम्हारी नाम जप की साधना कितनी जल्दी उन्नति करवाती है… आध्यात्मिक उन्नति।
हमारी परिक्रमा पूरी हो गयी थी...
पता ही नही चला ना गौरांगी ! इतनी जल्दी !
हरि जी ! पागलबाबा साथ हों तो ये पूरा जीवन भी क्षण के समान कट जाए...।
हाँ… बात तो सही है… प्रेम का ही स्वरूप हैं बाबा तो ।
शेष "चैतन्य चरित" कल...
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्...
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