google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 चैतन्य महाप्रभु का रूप गोस्वामी को उपदेश || भाग-44

चैतन्य महाप्रभु का रूप गोस्वामी को उपदेश || भाग-44


यन्मुहूर्तम् क्षणं वापि वासुदेवं न चिन्तयेद...

( भक्ति सुधा )


भावातिरेक नित बढ़ता ही जा रहा था इस श्री धाम वृन्दावन में ।


चैतन्य महाप्रभु को इस तरह यहाँ रहने देना  उचित नही होगा… ऐसा विचार कर… मथुरा ले आये चैतन्य के अनुयायी...


फिर यमुना के किनारे किनारे प्रयाग राज में चले गए थे महाप्रभु ।


बड़े विद्वान्… कवि हृदय… बुद्धिमान...


ऐसे रूप गोस्वामी चैतन्य के चरणों में नमित हुए थे ।


अपने हृदय से लगा लिया महाप्रभु ने...


जाओ !  श्री धाम वृन्दावन जाओ...


मैं तो जगन्नाथ पुरी में ही वास करूँगा… पर  हे रूप !  तुम जाओ श्री धाम वृन्दावन !


पर नाथ !   भक्ति तत्व का कुछ उपदेश मुझे करिये ना ! 


रूप गोस्वामी ने हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए पूछा था ।


यही नवधा भक्ति है… इसका पालन करो...


भक्ति साधना में ये नवधा तत्व हमारे जीवन में आजायें… तो समझो… भक्ति तत्व को हमने आत्मसात् कर लिया… फिर ईश्वर हमसे दूर कहाँ ? 


( साधकों !  इस लेख को अवश्य पढ़ें, भक्ति मार्ग के साधक को… ये चैतन्य का उपदेश अवश्य पढ़ना चाहिए )


चैतन्य महाप्रभु प्रयाग राज में… (अरैल) यमुना के किनारे बैठ कर… अपने प्रिय शिष्य रूप गोस्वामी को उपदेश करने लगे थे  ।


************************************** 

                         

                           (1)


   तुम्हारा कोई कितना भी अपराध करे… पर तुम्हें उसे क्षमा करते जाना है… अपने मन को  अशान्त नही करना है… हृदय में शान्ति बनी रहे… इसका प्रयास करते रहना है ।


यमुना का किनारा है… हवा शीतल चल रही है… हवा के कारण गैरिक उत्तरीय उड़ रहा है महाप्रभु का… जिसके कारण उनका वह गौरांग  बड़ा दिव्य लग रहा है...


चरणों में हाथ जोड़कर बैठे हैं… रूप गोस्वामी जी...


उनको उपदेश कर रहे हैं महाप्रभु...


याद रहे  रूप !   अशान्ति के कारण भले ही लाखों हों… पर हमें कारणों में नही जाना है… हमें कारण नही गिनने हैं… हमें तो अपने हृदय  रूपी मन्दिर को शान्त रखना है… क्यों कि इसी हृदय मन्दिर में ही तो विराजमान हैं ना… भगवान  ।


( तभी सामने एक यज्ञ चल रहा था… यज्ञ का यजमान आहुति दे रहा था… तभी एक दुष्ट व्यक्ति  गाली देने लगा था यजमान को...


तब उस दृश्य को दिखाते हुये… महाप्रभु ने कहा… रूप ! देखो ! 


अशान्त होने का कारण है… इस यजमान बने व्यक्ति के पास… क्यों कि वह दुष्ट व्यक्ति विघ्न डाल रहा है… पर यजमान भी अगर उसे गाली देने लग जाए… तो सफलता किसे मिली ? यज्ञ करते हुए यजमान को ?   या  उस दुष्ट व्यक्ति को ?


रूप गोस्वामी ने हाथ जोड़कर कहा… दुष्ट व्यक्ति सफल हुआ… क्यों कि वो चाहता ही यही था कि… इसके यज्ञ में ,  मैं विघ्न डालूं… और यजमान विचलित हो जाए… महाप्रभु ने सामने उदाहरण देकर समझाया)


इसलिये शान्ति बनाये रखना… हृदय को शान्त रखना… चाहे कुछ भी हो… भक्ति साधना की ये पहली सीढ़ी है।


*************************************** 


                              (2)


समय का सम्मान करो ...


देखो  रूप ! समय का सम्मान करो...


ये समय भगवत् रूप ही है...


श्रीमद्भगवतगीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं… कालोस्मि !


मैं ही काल हूँ...।


तो समय का दुरूपयोग करना… भगवान का ही अपमान करने के बराबर है… इसलिये हर क्षण का उपयोग करो...


भगवान के चिन्तन से रहित जो समय जाता है… वो व्यर्थ ही जाता है… ऐसा समझो… इसलिये अपने समय को व्यर्थ मत गंवाओ ।


महाप्रभु ने समझाया ।


**************************************** 


                              (3)


दुनिया में राग द्वेष नहीं करना...


हे रूप गोस्वामी !  द्वेष कड़वा जहर है , तो राग मीठा जहर है ।


ये कहते हुए चैतन्य महाप्रभु हँसने लगे...


देखो !    एक स्त्री थी अपने प्रियतम से बहुत प्यार करती थी...


एक बार बड़े प्रेम से आँखें बन्द करके अपने प्रिय के ध्यान में लीन थी… कि तभी उसे अपनी सौत याद आ गयी...


बस उसका हृदय अभी तक प्रफुल्लित था… पर हृदय में सौत के आते ही… उसका हृदय तो जलने लगा...।


अपने प्रियतम की जगह उसे सौत ही स्मरण में आने लगी...


उसकी शान्ति खत्म हो गयी… उसका आनन्द खत्म हो गया ।


महाप्रभु मुस्कुराते हुए  बोले… हे रूप !    उस स्त्री की शान्ति किसने खत्म की… बता सकते हो ?


हाथ जोड़कर रूप गोस्वामी ने उत्तर दिया… द्वेष ने  ।


हाँ… और उस द्वेष के कारण हृदय जलने लगा...


क्यों कि हमारे दिल को द्वेष जलाता है...।


राग से पक्षपात होता है… तो  द्वेष से शत्रुता का निर्माण होता है...


पर याद रहे… ईश्वर की अनुभूति तभी होती है… जब हमारा हृदय राग और द्वेष से रहित हो जाए ।


**************************************


                             (4)


जीवे दया...


समस्त जीवों पर दया करो...


हे  रूप !  सभी में वही है… उसके सिवा और कुछ है ही नही ।


वाणी से भी कभी कटु वचन मत बोलो… क्यों कि वह प्यारा तो सबमें है ना… फिर हम कुछ कटु वचन बोलेंगे तो उसके हृदय को कष्ट पहुंचेगा ना… और हृदय में भगवान बैठे हैं… उन्हें ही कष्ट दे रहे हो तुम… इस बात को भूलो मत ।


महाप्रभु प्रसन्न चित्त से आज उपदेश कर रहे हैं  रूप गोस्वामी को ।


                               (5)


शरीर से कुछ न कुछ कर्म तो होता ही रहता है...


इसलिये ये भी ध्यान रहे कि...हमारे कर्म किसी को दुःख न पहुंचाए ।


                                (6)


दूसरे के हक़ की वस्तु हम तक न आये...


और आ भी जाए तो ईमानदारी से हम उसे लौटा दें ।


                                           

                              (7)


परस्त्री और परपुरुष से सम्बन्ध न बने… ये याद रहे ।


साधक होकर अगर हमारे जीवन में मर्यादा नही है… तो काहे के साधक ?


सबमें ईश्वर बुद्धि से व्यवहार करें ।


( साधकों ! इस सम्बन्ध में हमारे पागलबाबा कल कह रहे थे… समस्त स्त्रियां हमारी श्री राधा रानी की सखियाँ हैं… इनका आदर करो… इनके प्रति  आल्हादिनी शक्ति हैं ये सब… ईश्वर की… ऐसी भावना रखो… हृदय में गलत भाव आये… तो मन ही मन क्षमा माँगो )


                                 (8)


नामे रूचि...


भगन्नाम में रूचि बढ़ाओ ।


नाम की साधना करो...


खूब नाम जपो… चाहे भाव से हो… या कुभाव से… कैसे भी हो… पर नाम का जाप करो… खूब करो...।


बोलो… हे कृष्ण !  हे माधव ! हे गोविन्द !


हर 5 पाँच मिनट में… उसे याद करो...।


                             (9)


और मन को कृष्ण चिन्तन में लगाओ...


सब जगह उनका ही हाथ है… सबमें वही हैं… काले के रूप में भी वही गोरे के रूप में भी वही… सब कुछ उनके नजरों के सामने ही है… उनसे कुछ छुपा नही है  ।


वे प्रसन्न हैं… फिर तुम क्यों दुःखी हो...


मालिक वो है… तुम तो मुनीम हो… संसार में घाटा भी हो रहा है… तो मालिक का हो रहा है… तुम्हारा नही… तुम तो नाचो… गाओ… उसका नाम लो...।


बस यही बोलते रहो… और यही सोचते रहो...


कि मैंने तो अपने कृष्ण को हृदय में बसा लिया है… अब मैं निर्द्वंद हूँ… मैंने सब कुछ उन्हीं के  चरणों में  चढ़ा दिया है… अपने आपको भी ।


हे रूप गोस्वामी !   बस यही याद रहे… इस भक्ति के मार्ग में आनन्द ही आनन्द है… सर्वत्र आंनद… सर्वदा आनन्द !


इतना कहते हुए… भाव में डूब गए थे  चैतन्य महाप्रभु ।


रूप गोस्वामी ने चरणों में प्रणाम किया… और महाप्रभु की आज्ञा से श्री धाम वृन्दावन की ओर चल पड़े थे ।


अब आगे… काशी जायेंगे चैतन्य महाप्रभु ।


शेष चर्चा कल...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।



Post a Comment

0 Comments