सन्यास नियम" के प्रति कठोर - चैतन्यमहाप्रभु || भाग-43
पदापि युवतीभिक्षु न स्पर्शेद...
( श्रीमद्भागवत )
आज की बात कहूँ… उससे पहले मैं प्रयागराज कुम्भ - का एक संस्मरण आपको सुनाना चाहता हूँ...
एक महात्मा थे… पहले पायलट थे… फिर सन्यासी बन गए ।
उनका कैम्प लगा था...।
उनके एक शिष्य नेपाल के थे… जो मेरे साधक थे ।
उनका आग्रह कुछ ज्यादा रहा… आप चलिए ना ! देखिये कितना बड़ा… कैम्प लगाया है हमारे गुरु जी ने ।
मैं गया… शाम का समय था… जाने में काफी समय लगा… क्यों कि आम व्यक्ति का प्रवेश नही था वहाँ तक… और जो जा रहे थे… वो सब डॉलर कंट्री के थे ।
मैं भीतर गया… वो बाबा बैठे हुए थे… उनके चारों ओर मात्र विदेशी युवतियाँ ही थीं… वो भी खुले बालों में… तेज़ परफ़्यूम लगाकर… इधर से उधर घूम रही थीं ।
मुझे उन बाबा ने… अपने कक्ष में बुलवाया ।
बहुत बड़ी टीवी लगी हुयी थी उनके कक्ष में...
भौतिक सामग्रियाँ सब थीं… वहाँ ।
मेरी ये बात समझ में नही आई कि सेवा में पुरुषों को न रख कर विदेशी युवतियों को रखने का औचित्य क्या ?
आपको जानकर आश्चर्य होगा… जो उन सन्यासी के शिष्य थे… उनको भी भीतर प्रवेश नही दिया गया था ।
मेरे सामने चाँदी के प्लेट में… काजू बादाम सब आ गये थे ।
पर वो सब खाने की मेरी इच्छा नही हुयी… पता नही किस पैसे का ये सब होगा...!
मैं जब जब उनकी ओर देखता… वो कामुक अंदाज में खड़ी युवतियां ही दिखाई देती...
बाल खुले… टी-शर्ट पहनी हुयीं...
महाराज जी ! एक बात पूछूँ ?
मैंने हाथ जोड़कर ही उनसे पूछा ।
हाँ… पूछो ! क्या बात है ?
मैंने कहा… हमारे शास्त्रों में लिखा है… कि सन्यासी को मूर्ति की स्त्री का भी स्पर्श नही करना चाहिए… फिर ये सब ?
मुझे डर नही लगा… क्यों कि मुझे न इनसे कोई दक्षिणा लेनी थी… न मुझे कोई स्वार्थ ही था।
उनके चेहरे की रंगत उतर गयी थी...
मुझ से बोले… सन्यासी को भी प्रारब्ध भोगना पड़ता है...।
ये सब मेरा प्रारब्ध है… जो मेरे साथ है...।
मुझे हँसी आई... प्रारब्ध के वश में अगर अपने आप को सन्यासी मानेगा तो फिर सन्यासी और संसारी में अंतर ही क्या हुआ ?
फिर आप विशेष कैसे हुए ?
आप भी भोगों में लिप्त हैं… और ये बेचारे संसारी भी...
अगर आप भी विषय भोगों को प्रारब्ध मानकर भोग रहे हैं… तो आप सन्यास धर्म का अपमान कर रहे हैं… मैंने कहा ।
इसके बाद मैं तुरन्त उठ गया… और अपने जानकी मन्दिर कैम्प में आ गया था ।
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चैतन्य महाप्रभु के एक परम प्रिय भक्त...
भिक्षा करने के बाद… चैतन्य महाप्रभु हरड़ खाते थे...।
हरीतकी… इसे आयुर्वेद में महान औषधि बताया गया है ।
ये भक्त भोजन के बाद… चैतन्य महाप्रभु को नित्य देते थे हरड़ ।
और दिन तो मांग कर लाते थे… तब देते थे… पर आज चैतन्य महाप्रभु के बिना मांगे ही दे दिया ।
तब आश्चर्य से देखा था… महाप्रभु ने… ये कहाँ से लाये तुम ?
प्रभु ! आप को इसकी आवश्यकता पड़ती है… तो मैंने कल… एक हरड़ आपको दे दिया था… और दूसरा मैंने रख लिया था ।
जाओ ! विवाह करो !... चैतन्य ने गम्भीर होकर कहा ।
वो भक्त चौंक गया… ये क्या ? विवाह करो ?
हाँ… गृहस्थ धर्म अपनाओ… तुम सन्यासी बनने योग्य नही हो...।
चैतन्य महाप्रभु ने कहा… गृहस्थ होकर त्याग करना… और सन्यासी होकर संग्रह करना… ये दोनों ही गलत हैं ।
साधकों ! चैतन्य महाप्रभु ने… उन भक्त को गृहस्थ आश्रम में भेजा… और वहीं रहकर भक्ति करो… ये शिक्षा दी ।
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परम वीतराग सन्त… छोटे हरिदास ।
चैतन्य के परिकरों में से एक ये भी हैं ।
भिक्षा लेने के लिए गए...
माधवी नामक एक युवती , जो उस घर की मालकिन थी...
उससे बातें करने लग गए ।
समय ज्यादा हो गया...
वापस भिक्षा लेकर आये...
तो प्रेमावतार का यह रूप जब देखा… हरिदास आश्चर्य में भर गए थे ।
पर करते क्या… बात तो सही थी… महाप्रभु की ।
कहाँ रह गए थे ? चैतन्य देव ने आँखों में आँखें डालकर पूछा ।
हरिदास ने उत्तर दिया… वो माधवी… उसके घर से भिक्षा लेने के लिए गया था भगवन् !
क्या तुम्हें पता नही है… स्त्री से वार्ता हमारे सन्यास धर्म में निषेध है ?
हरिदास कुछ नही बोले… सिर झुकाकर नयनों से अश्रु बहाते रहे ।
जाओ… आज के बाद मुझे अपना मुख मत दिखाना ।
ओह ! इतनी कठोरता ? हरिदास धड़ाम से धरती पर गिर गए… बहुत प्रार्थना की… अनुनय विनय किया… पर नही ।
और 5 दिन बाद ही… इन हरिदास ने प्रयाग राज के संगम में अपने शरीर को डुबो दिया… और जन्म मरण से मुक्त हो गए ।
ये बात जब सुना चैतन्य महाप्रभु ने… तब वो इतना ही बोले...
सन्यास धर्म का पालन साधारण नही है...
स्त्री में क्या दोष है महाप्रभु ? एक ने पूछा ।
तपन घोष ! दोष स्त्री में कहाँ हैं… दोष तो हमारे में है… दोषों की खान तो हम हैं… विकार , वासना , काम , ये सब हमारे अंदर भरा हुआ है… ये नही जाता...
हे तपन घोष ! ये सब विकार मन में ही रहते हैं… अनेक जन्मों के संस्कार के कारण...
जैसे बारिश में… रंग बिरंगे कीड़े जहां तहाँ से निकल आते हैं… ऐसे ही अनुकूल वातावरण पाते ही… ये सब विकार भी मन में पनपने लग जाते हैं...। इसलिये मेरा स्पष्ट मत है… स्त्री से दूर ही रहना चाहिए सन्यासी को...।
जो वास्तव में तत्व को जानना चाहते हैं… वो इन सब से दूर रहे ।
अय्याशी करने वाला कभी साधू नही हो सकता ।
पर हरिदास ने तो ऐसा कुछ नही किया था ना !
तपन घोष ने पूछा ।
कितना समय लगता है… जन्मों जन्मों के विकार मन में ही तो हैं… अनुकूलता पाते ही वो प्रकट होंगे ही… ये पक्की बात है ।
महाप्रभु ने कहा ।
सब लोग आज महाप्रभु का ये कठोर रूप देखकर चकित थे ।
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साधकों ! मैं उन सन्यासी के यहाँ से चल दिया था ।
मन में यही सोचता रहा...कि अब सन्यास किस दिशा में जा रहा है ?
पता नही ...
पर रजोगुण का जो तांडव इस सन्यास धर्म में आजकल दिखाई दे रहा है… ये अच्छा संकेत तो बिलकुल नही है ।
महाप्रभु के ये वाक्य कितने सही हैं ना !
स्त्री में दोष नही है… स्त्री तो करुणा की मूर्ति हैं...
दोष हमारे अंदर है… इसलिए बचना है ।
शेष चर्चा कल...
हरि बोल हरि बोल , मुकुन्द माधव गोविन्द बोल !
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