चैतन्य की बृजधाम यात्रा || भाग-42
सब जग को यह माखन चोरा भेष धरयो वैरागी...
( मीरा बाई )
बृज भूमि में प्रवेश करते ही चैतन्य महाप्रभु को आवेश आ गया ।
मथुरा के विश्राम घाट में सर्वप्रथम स्नान किया था महाप्रभु ने ।
फिर गिरिराज गोवर्धन की ओर चले गए ।
चारों ओर घूम घूम कर देखते रहे थे...
क्या देख रहे हैं आप प्रभु ! साथ के परिकरों ने पूछा ।
यहाँ राधा कुण्ड कहाँ है ?
कोई नही बता सका कि राधा कुण्ड कहाँ है ?
क्यों कि सब कुछ लुप्त हो गए थे...
वैसे तो भगवान श्री कृष्ण के परमधाम जाते ही सब कुछ लुप्त हो गया...
पर श्री कृष्ण के पड़पोते बज्रनाभ जी ने बृज को प्रकट किया था...
पर काल के प्रभाव से… और यवनों के आक्रमण से… सब कुछ लुप्तप्रायः ही था ।
चैतन्य महाप्रभु ने… गिरिराज के मध्य… दो खेतों के बीच में एक कुण्ड था… वहीं श्री राधा भाव हृदय में प्रकट होने लगा महाप्रभु जी के… स्नान करने के बाद चैतन्य महाप्रभु ने उदघोषणा की… कि यही श्री राधा कुण्ड है… और यहाँ जो जो भक्त स्नान करके आचमन लेगा… वो धन्य होगा… उसे हर वस्तु प्राप्त होगी… और प्रेम लक्षणा भक्ति से उसका जीवन भर जाएगा ।
भावातिरेक में चैतन्य महाप्रभु दौड़े… श्री धाम वृन्दावन की ओर ।
जैसे ही श्री धाम की सीमा में पहुँचें… पीछे से आवाज आयी…
कन्हैया ! लाला !
चैतन्य ने पीछे मुड़कर देखा… एक बूढ़ी मैया पुकार रही थी ।
चैतन्य दौड़े उसके पास… सीधे उस मैया की गोद में जाकर बैठ गए थे...
ये मेरी यशोदा है...
भावावेश में थे चैतन्य...।
मैया ! माखन खिला ना !
हाँ… मुझे पता था… कुरुक्षेत्र में हुयी… तुम दोनों की बातें मुझे सब पता है… मुझे राधा ने बताया था… कि विरह का रस चखने के लिए तो तू गौरांग बना है...।
यशोदा अपने कर कमल चैतन्य के सिर में फेरती रहीं...
फिर माखन खिलाया… अपने हाथों से...
कुछ ही देर में… वह मैया अंतर्ध्यान हो गयी थी ।
चैतन्य महाप्रभु वहाँ बैठकर अपनी मैया यशोदा को याद करके रोते रहे...।
यहाँ वह स्थान कहाँ है… जहाँ श्री कृष्ण ने कालीय नामक सर्प को नथा था...?
पर कोई इसका उत्तर नही दे पाया… सब निरुत्तर हो गए ।
तब यमुना के किनारे भ्रमण करते हुए… सभी लुप्त स्थानों को प्रकट किया… यही स्थान है… जिसे कालीदह कहते हैं ।
कात्यायनी देवी के दर्शन करने हैं… मुझे !
एक रात्रि को ऐसा भाव आया महाप्रभु को...
आहा ! श्री कृष्ण प्रेम प्रदान करने वाली हैं श्री भगवती कात्यायनी ।
गोपियों ने इन्हीं की आराधना की थी… तभी महारास में उनका प्रवेश सम्भव हो पाया...।
उस अर्ध रात्रि को ही दौड़ पड़े थे चैतन्य...
पर वृन्दावन में ये सब स्थान अप्रकट ही थे ।
यमुना के किनारे… कदम्ब के तले...
उस दिव्य स्थान को खोज निकाला...
भगवती कात्यायनी ने प्रकट हो… दर्शन दिया चैतन्य महाप्रभु को ।
और उस चीर घाट … और कात्यायनी स्थल का दर्शन कराया ।
गोपेश्वर महादेव...।
जब महारास हुआ था… श्री धाम वृन्दावन में… हे मेरे मित्रों ! उस समय भगवान शंकर को भी उस महारास में प्रवेश तब मिला… जब वह गोपी भेष धारण करके आये...
ये कहकर चैतन्य महाप्रभु फिर वृन्दावन में उस स्थान को खोजने निकले थे...
बन्शी वट में… रात्रि के समय… महाप्रभु को महारास के दर्शन हुए… बाँसुरी सुनाई दी… उस बाँसुरी के सुनते ही महाप्रभु शिव शिव शिव… शम्भो… ये कहते हुए नाचने लगे थे ।
सुंदर गोपी का भेष धारण करके… महादेव प्रकट हुए...
उसी समय महारास भी चल रहा था… महादेव चैतन्य का हाथ पकड़ कर नाचे… उस रास रस में डूब गए थे महाप्रभु… कहते हैं… इस भाव जगत से निकलने में ही करीब 4 दिन लगे थे चैतन्य महाप्रभु को ।
यमुना के किनारे एक विशाल इमली का वृक्ष था… उसी के नीचे रहते थे… चैतन्य । (जिसे आजकल "इमलीतला" के नाम से जाना जाता है)
वास श्री धाम वृन्दावन में ही करते थे चैतन्य...
पर भिक्षा लेने के लिए… अक्रूर… भतरोड जाते थे...
ये श्री धाम वृन्दावन की सीमा में पड़ता है… जहाँ मथुरा के ब्राह्मणों ने यज्ञ किया था… और उन ब्राह्मणों की पत्नियों ने… यज्ञ की समस्त सामग्री श्री कृष्ण को खिला दी थी...।
ये कथा श्री मद्भागवत में है… और ये भाव चैतन्य को बड़ा प्रिय लगा था ।
श्री धाम की भूमि में लोटते थे चैतन्य… कभी कृष्ण कृष्ण कहकर उछलते थे… तो कभी हा राधा… हा राधा… कहकर दहाड़ मार मार कर रोते थे ।
एक दिन श्री धाम वृन्दावन की भूमि में भ्रमण कर रहे थे… तभी इनके कानों में आवाज गयी… कोई वृद्ध ब्राह्मण कथा कह रहे थे ।
भक्ति के चार द्वार होते हैं… नाम, रूप, लीला, धाम ।
और ये सब ब्रह्म ही हैं… मात्र "रूप" ही ब्रह्म हो ऐसी बात नही है...
नाम भी ब्रह्म है… उसकी लीला भी ब्रह्म है… और ये जो धाम है… ये धाम भी ब्रह्म ही है...।
ये सुनते ही व्यास गादी में बैठे उन बृजवासी ब्राह्मण को आलिंगन करने के लिए दौड़े… पर बीच में ही इन्हें रोक दिया गया था… तब ये मूर्छित ही हो गए ।
तब भी इनके मुख से यही निकल रहा था… धाम भी ब्रह्म है… नाम भी ब्रह्म है… साक्षात् ब्रह्म है ।
उसके बाद तो वो ब्राह्मण... बृज में जब तक रहे चैतन्य... तब तक साथ में ही रहे थे...
शेष चर्चा कल...
राधा कुण्ड श्याम कुण्ड गिरिगोवर्धन
मधुर मधुर बन्शी बाज्यो , यही है वृन्दावन ।
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