google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 गौरांगी की डायरी से .... भाग- 7

गौरांगी की डायरी से .... भाग- 7

 आज  के  विचार



साधकों !    ये चौपाई  श्रीरामचरितमानस की आपने सुनी ही होगी -


"कामी नारी पियारी जिमि, लोभी प्रिय जिमि दाम ,

तिमी रघुनाथ निरन्तर,  प्रिय लागहुँ मोहि राम"


"गौरांगी की डायरी"  से आपको कितना लाभ मिल रहा है मुझे नही पता पर  मेरे सामने कन्हैया  अपने आपको जिस तरह प्रकट कर रहा है ....वो अद्भुत है .....।


आपका "चिन्तन" क्या है ?   गौरांगी ने इस विषय पर लिखा है  ।


कामी व्यक्ति,   चाहे  प्रयोजन हो या न हो ..........उसके चिन्तन का केंद्र स्त्री ही होती है .......ऐसे ही  लोभी के चिन्तन का केन्द्र  धन होता है ......पर  आपका चिन्तन ?      


गौरांगी ने  इस चिन्तन के रहस्य को भी उजागर किया है ....।


आइये  -   मैं  हरिशरण  आपके और कन्हैया के  बीच से हट रहा हूँ ....आप स्वयं  "गौरांगी की डायरी"  का  आनन्द लीजिये .......और   अपने चिन्तन को सुधारिये  ।


Harisharan


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( आपका चिन्तन ?  )


अमेरिका में एक प्रयोग किया गया था   .....चार पांच  वैज्ञानिकों ने मिल कर कुछ भूखे व्यक्तियों पर प्रयोग किया ......कि  उनकी भूख के समय मनोदशा क्या होती है  !   


एक कमरे में बैठ गए ...........सुबह से कुछ नही खाया  और शर्त ये थी कि भोजन के सम्बन्ध में कोई बात नही करेगा ..........दुनिया भर की बातें करो .......हर विषय पर बात करो  पर  भोजन पर नही ।


इतिहास, भूगोल , चिकित्सा, राजनीती  हर विषय पर चर्चा चली ......पर एक विचित्र बात ये हो गयी  कि .........हर विषय  धीरे धीरे भोजन पर ही जाकर खतम हो रहा था  ।


अच्छा !   न चाहने के बाद भी  भोजन ही उनका मुख्य विषय बना रहा ।


क्यों ? 


क्यों कि वो भूखे थे........इसलिये भोजन की चर्चा तो होनी ही थी ।


कामी व्यक्ति  जो हर समय सेक्स का ही चिन्तन करता रहता है .........उसके चिन्तन  का केंद्र  स्त्री ही होगी ।


लोभी में धन पाने की असीम लालसा होगी ......वो  उसी का चिन्तन करेगा ..............हाँ  यही सच है   ।


अच्छा !  मुझे आप अगर पूछो - की पूर्वजन्म में हम क्या बनेंगे  तो  मैं आपके चिन्तन के केंद्र को  देखकर  बता सकती हूँ कि  आप पूर्वजन्म में क्या बनेंगे  !  


बहुत सीधा और सरल है ये तो ..........आपका मन बार बार किसका चिन्तन करता है ? ...........स्वयं विचार कर लो  ......समझ में आजायेगी  कि आप क्या हो  और आप  पूर्वजन्म में क्या बनोगे ! 


जो घर , भूमि,  का  चिन्तन करता रहता है ..........वो  छिपकली  सर्प मक्खी मच्छर  यही बनते हैं .........हाँ  ये सच है  ।


अच्छा आपको पता है  जो स्त्री का चिन्तन करता रहता है  वो स्त्री ही बनता है ......और जो पुरुष का चिन्तन करती है  वो दूसरे जन्म में पुरुष ही बनती है ...........अब ये आवश्यक नही  कि   मनुष्य में ही पुरुष स्त्री बने ..........चूहा  या  चुहिया     ऐसे योनि में भी आप जा सकते हैं ।


यह नियम आपको भयानक लग रहे हैं  ?       


नही ये नियम तो बहुत अच्छा है  ..........


कल मैं भागवत जी का पाठ कर रही थी ...............पाठ में  रासपंचाध्यायी का  पाठ था ............एक श्लोक के चिन्तन में  मैं रुक गयी ........वो श्लोक -  दशम स्कन्ध के उन्नतीसवें अध्याय का पैतीसवां श्लोक है .............."ध्यानेन याम पदयोः  पदवीं सखे ते" ।


गोपियाँ अपने कन्हैया से कहती हैं ...........प्रियतम !  तुम्हारा चिन्तन करते हुये  हम मर जायेंगी ......तब तो  तुमको   हमसे  अगले जन्म में  मिलना ही पड़ेगा .......क्यों कि  यही नियम है   ।


अब आप बताइये   -  आपका चिन्तन कहाँ है ?  


देखिये  !  ईमानदारी से  बताइयेगा  ।


आप अपने चिन्तन  का  केन्द्र  कन्हैया को  क्यों नही  बनाते  ?


अगर ऐसा आपने कर लिया  तो पक्का कह रही हूँ मैं,   वो भुवन सुन्दर कन्हैया आपके सामने खड़ा हो जाएगा ..........हाँ  सच  ।


क्या पूछा  आपने  ?     


कैसे करें ?       ये कैसे होगा  ? 


अजी !  आपने फिर वही समझ लिया ...........ये प्रेम का मार्ग है .....आपको क्या लगता है   रीढ़ की हड्डी सीधी करके  चार  घण्टे तक बैठना पड़ेगा  ?    या  साँसों को लेते रहना पड़ेगा .....लोहार को धौंकनी की तरह  ................।


प्लीज़ !  कन्हैया का ध्यान आप ऐसे करते हैं ........तो  मत कीजिये ......वो हँसता होगा ..........वो  तुम्हें देखकर हँसेगा .........कहेगा  ये पागल हो गया .......कैसे  साँस लेता है ............कभी आपको ऐसा नही लगा  कि   ध्यान में हम बैठे हैं  और  वो आकर कहीं हमारी नाक में ऊँगली करके ......................


ऐसे हमारे सौभाग्य कहाँ  ?   


फिर आप अपने भाग्य को  दूर भगा रही हैं  ...........वो  आपका ही है ।


और सच कहूँ तो  "वही" आपका है....बाकी सब तो  आने जाने वाले हैं ।


अच्छा ! आपने पूछा है कि .....क्या करें  ?  


तो मुझे एक बात बताइये .....आपका बेटा आपसे दूर है  पढ़ाई के सिलसिले में या  जॉब के लिये ..........तो क्या  आप उसका चिन्तन करने जब  बैठती हैं ......तब  क्या   आसन बांध कर ......या प्राणायाम करके बैठती हैं  ?    या रीढ़ की हड्डी सीधी करके ही  अपने पुत्र , या प्रियतम या पति को याद करती हैं ?  


फिर कन्हैया का ही चिन्तन ऐसे क्यों  ?      


इसका मतलब आप उसे अपना नही मानती ......याद रखिये  ये कन्हैया ही दुःख सुख में काम आएगा .......यही है  जो  तुम्हारा अपना है ।


क्या दोपहर का  भोजन बनाते हुये  एकाएक  आपको ऐसे ख्याल आया कि  दोपहर के बारह बज गए .........गैया चराने गया है कन्हैया .......भूखा होगा  ?    


नही आया  तो इस तरह चिन्तन करने की  आदत डालिये  ।


शाम का समय हो गया ............अब देखो  वो आरहा है .......कितना सुन्दर है ..........ग्वालों से घिरा हुआ है   ...........धूल लगी है   घुंघराली अलकों में ................बंशी फेंट में है .............


चिन्तन करो ना ? 


मैं दो दिन पहले गयी थी  एक परम विद्वान की भागवत कथा सुनने .....वो माखन चोरी की कथा में भी  अध्यात्म खोज रहे थे ..........और उन सब मधुर लीलाओं की  व्याख्या आध्यात्मिक परक कर दी.......सत्यानास कर दिया  कन्हैया के चिन्तन का......मुझे अच्छा नही लगा मैं वहाँ से निकल गयी  ।


अरे !   ये सब  कन्हैया की लीलाएं ....चाहे वो माखन चोरी हो ....या गौचरण.......या ऊखल बन्धन .....ये लीलाएं   चिन्तन के लिये हैं ...श्रीशुकदेव जी ने चिन्तन करने के लिये ये सब लीलाएं हमें  सुनाई हैं ।


क्या कभी आपको  ऐसा लगता है   कि  इस समय  हमारा  कन्हैया क्या कर रहा होगा .............?  


आप भी क्या सिखा रही हैं ...........अरे ! ये तो  मन की कल्पना है ......वो बड़े  दार्शनिक थे ....और वेदान्ती कहते थे अपने आपको ........"ब्रह्म चिन्तन में ही लगे रहो"     यही कहना था उनका  ।


मुझ से भी भिड़ गए थे  कुछ दिन पहले ......कहने लगे  ये सब  - मानसिक सेवा .....मानसिक ध्यान ...... कल्पना है  ।


मैंने भी कह दिया .......आप तो ब्रह्मास्मि कहते रहते हो .....मैं ब्रह्म हूँ ....ये भी कल्पना ही तो  है ......।


मैंने कहा........आप क्या समझते हैं  मैंने वेदांत का अध्ययन नही किया ?


मैं उनको जबाब देने लगी थी ..........वो चुप हो गए ........


मैंने उनसे कहा .......अब वो  ब्रह्म शून्य है.......उस शून्य में माथापच्ची कीजिये ......और जो भी आप करेंगे  या मानेंगे  वो मन का ही विषय  तो  होगा .......यानि कल्पना ही तो होगी ना  ? 


आप कल्पना कहते हैं......हम उसे भावना कहते हैं ...........मैंने कहा ।


कृष्ण का अर्थ ही होता है  जो  आपके चित्त को अपनी ओर खींचे ......


आप  अपनी तरफ से थोड़ा तो प्रयास कीजिये .........


कल  एक  मेरी सहेली की बच्ची ने  फोन किया ............उसको मैंने करीब दो महिनें पहले एक चित्र देकर कहा था  यही है कन्हैया .......कुछ नही  बेटा !   इसे  सुबह शाम दूध का भोग लगाना  ।


कल मेरे  पास  उस बच्ची का  फोन आया .......वो इंग्लैंड में रहती है ............उसने कहा .......... ...आपने जो पिक्चर दी है .........उसमें कन्हैया ने कपड़े नही पहने ......केवल पीताम्बरी है ............कल मैं उनको दूध भोग लगा रही थी .......तो मुझे लगा  इसे ठण्ड लग रही है .....शॉल ओढ़ा दूँ  ।


मैं हँसी .......मैं समझ गयी ........कृष्ण का मतलब ही है  जो अपनी ओर खींचता है .....खींच लिया था  उस  बच्ची को अपनी ओर कृष्ण ने ।


आप किसी भी बहाने से उसके चिन्तन को करना प्रारम्भ तो करो .........अब चिन्तन का कोई नियम नही ........जैसे भी करो ।


वैसे कुछ देर आप ध्यान करते हैं ....तो करिये .....पर कन्हैया को अपना मानकर ...........उसके बारे में सोचिये ...........कभी भी  ।


पागलपन ही सही ...................किसी को बताना तो है नही  ।


अब  देखिये एक सच्ची बात...........एक  प्यारी सी बच्ची को मैंने कहा ..........कन्हैया को किसमिस धोकर   उसे  खिलाने की भावना करो ।


एक महिने बाद  वो कहती है ..........आपका कन्हैया तो ऊँगली काट कर भाग जाता है ..........किसमिस तो खाता नही  ।


अब ये सच्ची घटना है.......इसलिये  !   याद  रहे .......चिन्तन का केंद्र बनाओ कन्हैया को......इससे बढ़िया साधना और कोई नही है ।


                                                             गौरांगी


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साधकों !    मैं और साधनाओं की बातें नही करता ..........आप को जो प्रिय हो  वही साधना  या जो आपको गुरु द्वारा मिला हुआ है  उसी मन्त्र का  जाप कीजिये .........करते रहिये   ।


गौरांगी का कहना मात्र ये है कि ..........चिन्तन कीजिये कन्हैया का  ।


चाहे कल्पना ही सही .........वैसे गौरांगी चिढ़ती है  जब कोई इन बातों को कल्पना कहता है ......वो कहती है भावना कहो  ।


अच्छा !  ऐसे चिन्तन से क्या लाभ ?  


 मेरा तो  यही कहना है - इस लोक में भी लाभ है और परलोक में भी ।


इस लोक में  लाभ ये है कि ........वो मोर मुकुट धारी साँवरा,   घुंघराली अलकें ........पीताम्बर धारी   मुस्कुराता हुआ  जब  आपके हृदय में आएगा  तब आपका हृदय  पवित्र और सुन्दर होगा कि नही ? 


अब परलोक भी इसी चिन्तन से सुधरा ..............


क्यों कि  पूर्वजन्म का सिद्धान्त  हमारा यही कहता है  कि जिसका चिन्तन होगा हम दूसरे जन्म में भी  वही बनेंगे..........तो कन्हैया का चिन्तन अगर इसी तरह से होता रहा .....तो  परलोक भी हमारा कितना दिव्य होगा  ।


"गौरांगी की डायरी"  स्वयं नित्य पढ़िये और  अपने सुहृदों  को  भी  


प्रेरित कीजिये ।


.......जय हो कन्हैया की .....और उनके प्यारे भक्तों की  ।



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