google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 गौरांगी की डायरी से... भाग- 6

गौरांगी की डायरी से... भाग- 6

 आज  के  विचार



साधकों !    आप आज जैसे हैं .........उसके निर्माण में आपके संग-साथ का ही ज्यादा हाथ है ,  इस बात को आप मानते हैं या नही ? 


"आप जैसे व्यक्ति का संग करेंगे  आप वैसे होंगे"   इसलिये हमारे प्राचीन शास्त्रों ने  सत्संग की बड़ी महिमा गाई है । ......"गौरांगी की डायरी" के पन्नों को जब मैं आगे पलटता हूँ ......तो मुझे "संग" पर लिखा हुआ ये लेख मिलता है.....बहुत अच्छा लिखा है .....मैं तो इसको पढ़कर इतना अभिभूत हुआ ,  कि  मैं आज आप सब से कहना चाहता हूँ ......इस "गौरांगी की डायरी" को,  पढ़ने के लिए प्रेरित कीजिये  अपने लोगों को....प्लीज़ ।


Harisharan


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( आपका संग कैसा है )


"जैसा करे संग वैसा चढ़े रंग"  ये कहावत भारत में बहुत  कही जाती है ।


हाँ ये सच है ..........हम मनुष्यों पर संग का बड़ा प्रभाव पढ़ता है ।


ये काम , क्रोध , लोभ,  मोह,   ईर्श्या  अहंकार .......ये सब...  छूकर, चखकर, सूँघ कर  हमारे हृदय में  प्रवेश नही करते .........ये हमारे हृदय में प्रवेश करते हैं ..........कानों से ............सुन सुनकर  ।


और जब हम संग करते हैं .....तब  उस संगी की बातें ही हमारे  कानों से होते हुए ,  हृदय में   अच्छा या बुरा प्रभाव डालती  हैं ..................


इसलिये   मेरे पागलबाबा एक बात कहते रहते हैं .............पुरुष साधक के लिये  स्त्री का संग और स्त्री साधिका के लिये पुरुष साधक का संग गलत नही है ...........पर   अगर स्त्री साधिका  किसी  "पुरुष लम्पट" .....यानि वासना में ही जिसका मन लगा हुआ है ......ऐसी स्त्री का  संग  ज्यादा खराब है ...........पुरुष साधक  के लिये भी    स्त्री का संग इतना  खराब नही है .....जितना  किसी भी  स्त्री को देखकर लार टपकाने वाले पुरुष का संग ज्यादा खतरनाक है  ।


आप समझे बात को ? 


मेरे ऊपर कन्हैया की कृपा कब होगी  ?    


होगी .........अजी ! हो ही रही है .............पर अनुभव नही हो रहा  ।


तो एक काम कीजिये ............आप अपने संग को सुधारिये ........क्यों कि जिसका संग होता है ........उसकी बातों में  रूचि बढ़ती जाती है ....उसके शब्द हमारे कानों से होते हुए हृदय में जाते हैं ........और फिर हृदय को   सुन्दर बनाते हैं  अगर संग अच्छा है तो ........अगर संग गलत है  तो   हृदय को इतना  खराब कर देंगे  कि  कन्हैया  की बातें भी   तुम्हें अच्छी नही लगेंगी ..........।


मुझे कल ही  मेरी सहेली पूछ रही थी .........ये तेरी "कन्हैया कन्हैया"  की बातें  मुझ में तो भाव का संचार नही करतीं ?  


मेरा एक ही उत्तर था उसको .............


अभी हृदय निर्मल नही हुआ ............और बिना हृदय के निर्मल हुए   कैसे कन्हैया अच्छा लगेगा  !


उसने फिर मुझ से पूछा  ........मैं क्या करूँ  कि मुझे भी तेरी तरह  प्रेममय जीवन प्राप्त हो .....और कन्हैया से प्रेम हो जाए  ।


मैंने उससे कहा ...........तू सत्संग कर  ।  तेरा संग खराब है ........संग के कारण ही  तेरा हृदय दूषित है  ।


मैं योगा करती हूँ ......मेडिटेशन भी करती हूँ ............उसने कहा ।


मैंने उसे जबाब दिया ............तुझे समाधि की स्थिति में जाना है  तो  फिर कन्हैया क्यों चाहिये  ?   


क्या मतलब  वो चौंकी .............मैंने कहा  हाँ ......ये  जो  कन्हैया वाला मार्ग है  ये समाधि का नही है ..........ये तो प्रेमपूर्ण मार्ग है ........इस मार्ग के लिये  तो  अलग से कुछ करना ही  नही है ......जो कर रहे हैं .....उसी को मोड़ देना है .............न कान दवाना है ....न नाक ...........न साँस को देखना है ..........बस  जो कर रहे हैं    वही करना है ....  पर   कन्हैया के लिये उन सब कार्यों को करना है  ।


मैं कुछ नही जानती .......मुझे तेरी  स्थिति पानी है .........वो कुछ जिद्दी है ........मैंने उससे कहा ..........तू सत्संग कर ..........और ये क्लबों में  जाने वाली महिलाओं का संग छोड़ दे ...........क्यों कि जैसा संग होगा  वैसा ही मन भी  बनता जायेगा   ।


पर  ऐसे कैसे  सब का साथ छोड़ दूँ ........नही छोड़ पाऊँगी ....क्यों कि  मेरा जॉब है ......और उसमें  काम भी तो करना है   ..........।


दिक्कत ये भी  आएगी ही ..........मात्र कुछ  तथाकथित  गुरुओं की तरह नॉनस्टॉप उपदेश देने मात्र से  तो होगा नही .........।


मैंने उस  सहेली को  अपना ही उदाहरण देकर समझाया -


मैं  अमेरिका से आयी थी चंडीगढ़ .........मेरे माता पिता  की इच्छा थी कि मेरी शादी भारत में ही हो .........इसके लिए वो आये दिन मुझ पर दवाब बनाते ...........कई दिन हो गए ...........मेरी शुरू से ही आदत थी .....काम करना ही है .......खाली नही बैठना .....।


मुझे "पंजाब केशरी" नामक प्रसिद्ध अखबार में    जॉब मिल गयी .........फील्ड वर्क की जॉब नही .....डेस्क वर्क की जॉब  ।


मैंने वहाँ देखा  एक   प्रौढ़ व्यक्ति को ....जो इस अख़बार के दफ्तर में करीब दस वर्ष से काम कर रहा था  .......सब लोग उसे "बाबा जी" कहते थे ........उसने न शादी की थी .........न घर बनाया  ।


वो था पंजाब का ही .........वो पंजाबी में ही बोलता था .....बढ़ी हुयी दाढ़ी ............बड़े हुए बाल ..........सफेद कुरता पाजामा पहनता था .....पर  उसमें ऊर्जा बहुत थी   ।


दूर गाँव में  एकान्त में उसने  एक कुटिया  बना रखी थी .........वो  रात्रि विश्राम करने वहीं जाता था ...............।


उसके पास एक मोटर बाइक थी .......उसी से आता जाता था  ।


वो किसी से  ज्यादा बातें नही करता .......बस उससे जितना  पूछा जाए    उतना ही उत्तर वो देता था .........पर अपने काम के प्रति उसकी पूरी निष्ठा थी .....काम  शतप्रतिशत  समय पर  और पूर्णता के साथ करता था ..........अख़बार का दफ़्तर है .....तो स्वाभाविक है .....कभी कभी काम ज्यादा भी करना पड़ता ............पर उसने कभी ना नुकुर नही किया ....न उसके ज्यादा पैसे ही लेता था  ।


और हाँ ...........जब कोई काम नही होता .....तो  किसी के साथ बैठकर  

वो गॉसिप नहीं करता था ..............


उससे मैं बहुत प्रभावित हुयी थी ............वो  खाली समय में भी मशीन को साफ करता था ..............यानि अपना काम पूर्णता से  .......पर  ।


मेरी सहेली ने  पूछा ......पर  ?    


पर वो किसी के संग में नही था.....असंग था.....वो सच्चा साधू था । 


मैंने उससे पूछा  एक दिन..........आपका कोई मित्र नही है ?   आपका कोई संगी साथी नही है  ?  


मेरी बात सुनकर  वो मुस्कुराया  और मुझे  अपनी मोटर बाइक में बैठाकर  अपनी कुटिया में ले गया ..............


मेरा  संग इनसे है .......मेरे साथी ये हैं ..............


उसके हाथों में  "गुरुग्रन्थ साहिब"  थे ......और  उसके नेत्रों  से टप् टप् आँसू बह रहे थे  ।


मुझे जब भी   कुछ पूछना होता है .....मैं  बाबे से पूछ लेता हूँ ...........वो गुरुनानक देव को  "बाबे" कहता था ............।


कैसे पूछते हो  ?    


उसका उत्तर था .........ये हैं ना गुरुग्रन्थ साहिब .....इसका पाठ करते ही  मुझे सभी उत्तर मिल जाते हैं  ।


देखो !     जीवन में   जॉब करना पड़ेगा ..........जीवन में हो सकता है घर में ही रहना पड़ेगा .........और हो सकता है कि आप जहाँ जॉब करती हैं  वहाँ का  संग अच्छा न भी हो .........पर  आप को उससे क्या लेना देना .....आप तो    अपना कर्तव्य कीजिये .....पूर्णता से कीजिये ......बिना किसी से  चिपके हुए .........।


तुम भी किसी को  अपना संगी बनाओ ना !


 जिसके साथ तुम बतिया सको..अपने "कन्हैया" की चर्चा कर सको । 


पर इस अमेरिका जैसे महानगर में  कौन मिलेगा  संगी,   आध्यात्मिक संगी ..?     सहेली का  दुःखी होना भी स्वाभाविक था ।


मैंने कहा .......फिर यार !     उस पत्रकार की तरह  किन्हीं महापुरुष की वाणी का संग क्यों नही करती  तुम !


रामचरितमानस, भागवत,  गीता , महावाणी.......या कोई भक्ति ग्रन्थ  उनका संग करो .....अगर कोई नही मिलता तो  !


पर दुस्संग  से बचो .............ये ज्यादा  खराब है ।


कन्हैया तभी आपका होगा  जब  आपके जीवन में सत्संग नित्य होगा...।


और कुसंग से बचे रहोगे ..........ये आवश्यक है  ।


बाकी संसार में रहना है,  कमल की तरह ही रहना पड़ेगा........है ना !


मेरी बात  मेरी सहेली ने समझ ली .........आप समझे ?  


                                                      गौरांगी 


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साधकों !   संग का महत्व बहुत है ......संग का ही महत्व है ......


इसलिये अपना संग अच्छा बनाइये .........आप स्वार्थी व्यक्ति का संग करेंगे  तो आपमें भी वह गुण आएंगे ही  ....इसलिये निःश्वार्थ मनुष्य का संग  कीजिये ...........।


गौरांगी की डायरी में एक बात है   जो बड़ी  मार्मिक है  ।


हमें कहाँ मिलेंगे  अच्छे  संगी ?   आज कल  कहाँ हैं  ?  


इसका समाधान कितना सुन्दर दिया है  गौरांगी ने .......


"  उसके हाथों में  गुरुग्रन्थ साहिब था .....और   उसके नेत्र बरस रहे थे .... "मुझे जो भी  जानना हो .......मैं "बाबे" से पूछ लेता हूँ "


कितना सुन्दर समाधान दिया....आज कल हम कहाँ खोजें ?   तो क्यों न हम भी गोस्वामी श्रीतुलसी दास जी का ही सत्संग करें ....रामचरितमानस के स्वाध्याय से .......श्रीशुकदेव जी का ही सत्संग करें   भागवत जी के स्वाध्याय से ......क्यों न हम  महावाणी जी का ..।


या  इंटरनेट के माध्यम से  किन्हीं अच्छे  सन्त की वाणी को सुनते हुये । 


धन्य है गौरांगी ..........जो हमें  समाधान दे रही है  ।


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