google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 गौरांगी की डायरी से.... भाग- 5

गौरांगी की डायरी से.... भाग- 5

 आज  के  विचार

साधकों !   "जैसा खाये अन्न , वैसा होय मन"  ये कहावत  बहुत पुरानी है .....हम क्या खाते हैं .....कैसा खाते हैं ....और कहाँ खाते हैं ......पर गौरांगी ने  "'हम कैसे खाते हैं"    इसपर  भी  बड़े रोचक  ढंग से  गूढ़ बातों को उजागर किया है .......आज की  इस "डायरी" में   भोजन पर प्रकाश डाला है  गौरांगी ने  ।     साधकों  !  आप तो जानते ही हो .......हम जैसा अन्न खाते हैं  हमारा मन भी वैसा ही हो जाता है .........चलिये ......आप स्वयं  गौरांगी की लेखनी का आनन्द लीजिये .....और  अपनी  "चर्या" भी ऐसी ही बनाइये   ।


Harisharan


*******************************************************


( आपका भोजन )


आपका भोजन कैसा है ?   आप कैसा भोजन करते हैं  ? 


पर भोजन मात्र वो तो नही  जो आपके पेट में जाता है ..........हर इंद्रियों  के अपने अपने भोजन हैं .......हैं ना  ?


जैसे - आँखों का भी भोजन है ....रूप  को देखना .......कानों का भोजन है सुनना .......और ये भी "सूक्ष्म शरीर" को पुष्ट करते हैं ......आपको तो पता ही होगा........हमारे  दो शरीर हैं .........एक "कारण शरीर" भी है  पर उसकी चर्चा अभी मैं नही करूंगी  ।


जैसे उदर में जाकर   ये अन्न का भोजन हमारे "स्थूल शरीर" को पुष्ट करता है .......ऐसे ही  आँखों से जो हम  ग्रहण करते हैं ........कानों से हम जो  ग्रहण करते हैं ......उससे  सूक्ष्म शरीर पुष्ट होता है .........जो देखते और सुनते हैं .......उसी से तो  कर्म करने की  प्रेरणा मिलती है .......फिर कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है  ।


लो ...मैं फिर   बोर करने बैठ गयी आप को......तो  छोड़िये इन सब बातों को.......हम आज बातें करते हैं  उस  स्थूल भोजन की ....जो आपके पेट में जाता है....आप जिसे चबाचबा कर   बड़े प्रेम से खाते हैं  ।


पर हम बात तो कन्हैया के निकटता के लिये कर रहे हैं ना ? 


तो क्या  आप   भोजन करते समय  कन्हैया को याद करते हैं ?    


देखो !   साधना  सच्ची होनी चाहिये......और ईमानदारी से होनी चाहिये ...ये किसी को दिखाने की ...या प्रदर्शन की वस्तु तो कतई नही   है  ।


आपने कन्हैया को अपना मान लिया है ना ?       तो  फिर फ़िक्र छोड़िये कि  वो आपको मान रहा है  या नही  !   


गीता में उसने स्पष्ट कहा तो है ......कि   "मुझे जो जिस तरह से मानता है  मैं भी उसे उसी तरह से मानता हूँ"...........अब  वो तो अन्तर्यामी है ना ......घट घट में है ......तुम्हारे अंदर ही है .............तुम्हारे मन में  जो चल रहा है ......वो उसे देख तो रहा है.......तो तुम्हारे मन की  वो जानता है ...........अब  ये भी सच्ची बात है कि  वो  कन्हैया  सर्वशक्तिमान है .......तो   तुम जैसे कहोगे ......वो वैसा  क्यों नही कर सकता !


अब सुनिये  मेरी बात -    आप  जब किसी अच्छे रेस्टोरेंट में  जाकर कोई बढ़िया वस्तु खाते हैं .......तब आपको  अपने प्रिय की याद आती है  या नही  ?      आती है ना  !     


अब प्रिय में कोई भी हो सकता है .......प्रेमी , पुत्र,  पति  कोई भी ।


पिज्जा बढ़िया था  काश !   वो भी साथ होते  ?

    ऐसी भावना आती है ना  ?     


तो क्या आप जब भी  कुछ खाएं  तब  आपको कन्हैया याद आता है ?  


मैं नही कहूँगी  कि आप होटल में मत खाओ .....मैं ये भी नही कहूँगी  कि आप  ठेले में  बिकने वाली पानीपूड़ी मत खाओ ......मैं तो  आपको  सब खाने को बोल रही हूँ .........पर इतना कह रही हूँ  कि .....खाने से पहले ......वस्तु देखकर  तुम्हें कन्हैया याद आना चाहिए .......अगर नही आरहा ......तो  प्रयास करो ..........देखो !


मेरी एक फ्रेण्ड थी ...........अमेरिका में  जब मैं रहती थी  तब की बात है .......वो मुझ से एक दिन बोली ..........मैं  रॉबिन से प्रेम करूंगी ......।


मैं हँसी .......मैंने कहा .......प्रेम भी कहीं ऐसे होता है क्या  ? 


वो बोली.....अब मैं प्रेम  पर दार्शनिक वक्तव्य तो तुमसे सुनूंगी नहीं ।


यार !  सबके बॉय फ्रेण्ड हैं .......मेरे ही नही हैं ........अब  वो रॉबिन है उसी को मैं अपना  ..............उसने ऐसा कहा ।


और  देखते ही देखते   रॉबिन और उन दोनों का  प्रेम खूब परवान चढ़ा और  विवाह भी हो गया ................।


मैं ये सब क्यों कह रही हूँ ....?       इसलिये कि   आप  को प्रेम भले ही नही है कन्हैया से ...........पर आप  इसी तरह नाटक तो कर ही सकते हैं ना ............कहते रहिये ...........किसी को नही .....तो अपने आपको ही कहिये कि  "सच्चा प्रेमी तो हमारा कन्हैया ही है"...............कहिये .....प्रेमी की तरह उसे रखिये ............रखने से यहाँ मतलब   उनकी मूर्ति या चित्र को लेकर चलना ही नही है ........अपनेऔ हृदय में रखिये ।


अच्छा !  मैं कह रही थी ...............आप जब भी खाते हैं   तो  क्या कन्हैया को याद करते हैं  ? 


अगर नही करते ......तो आज  से कीजिये .......यही साधना है  ।


अच्छा ! करना क्या है  ?  


तो करना ये है कि  आप जो खाते हैं .......खाने से पहले .......जब  खाने की  प्लेट आपके सामने आ जाये ..........तब आपको,  कन्हैया को याद करना है .....बस इतना काम कीजिए ।


आप  कन्हैया को मानसिक रूप से खिलाईये ........नही नही ...आपके बगल वाले को पता भी न चले ...........क्यों कि आप रेस्टोरेंट में खा रहे हैं  तो   ?     इसलिये  मन ही मन में  उस भोजन को देखकर कन्हैया को कहिये  लो आप पहले  खाओ .....आपको भूख लग रही होगी ना ! 


आप की सहूलियत हो .....तो आँखें बन्द कर लीजिये ......पर   पास के लोगों को क्या लगेगा ऐसा सोचती हैं आप  .........तो आँखें बन्द भी न कीजिये ........पर उसको याद करके .......एक दो ग्रास उसके मुँह में डाल ही दीजिये .......फिर जल पिलाकर  उस  भोजन को स्वयं ग्रहण कीजिये .........बस इतना ही आपको करना है .......और ये सब मानसिक रूप से करना है  ।


 उस भोजन को ग्रहण करते समय यही सोचना  है   कि आप अपने  कन्हैया के अधरों का  जूठन खा रहे हैं ...........आप  अपने प्यारे की प्रसादी  ले रहे हैं .............आहा ! 


इसका लाभ क्या होगा  ?   


अभी  लाभ हानि छोड़िये ..........लाभ तो इतना है कि  आपका अन्तःकरण   शुद्ध होता जाएगा   ऐसी भावना से  ।


अच्छा !  अच्छा !  एक बात तो   मैं कहना भूल ही गयी  ? 


आपका कन्हैया सुकुमार है .........बहुत कोमल है .........फूलों से भी कोमल है ........फिर आप इसे  मिर्च मसाला का भोज्य देंगी ?  


सोचिये कितना कष्ट होगा उसे .............बेचारे का मुँह लाल हो जाएगा ..........वैसे तो आप जो देंगी  वो खायेगा ही .....क्यों कि  भोला है  वो बहुत ...........इसको   जो दे    वो खा लेता है.............।


आप मिर्च की बात करती हैं ........ये तो  जहर तक पी गया .....पूतना ने जहर पिलाया नही था क्या  इसे  ? 


ये तो पी लेगा .....जो दो खा लेगा......पर हमें भी तो सोचना चाहिये ना   कि  इसको मिर्च लगेगी.........या    प्याज लहसुन की गन्ध !


  "तुम  ये च्युंगम क्यों चबाती हो  भोजन के बाद  ?"


मैंने अपनी सहेली से पूछा था  ।


तो उसने उत्तर दिया ........प्याज की बदबू आती है मुँह से.......।


अब देखो !   प्याज खाने वालों को भी सुगन्ध नही आती ,  प्याज से ।


फिर ये तो कन्हैया है.........सोचिये !   क्या इसे आप प्याज लहसुन  खिलाएंगे  ?       


मांसाहारियों की तो बात ही नही हो रही यहाँ........वो तो इन सब से कोसों दूर हैं .......क्यों कि उनकी संवेदनशीलता  ही खतम हो जाती है  .....और जो  संवेदित नही है ...........उससे कन्हैया भी    दूर ही रहता है .......बस  उदासीन सा रहता है  वो .........।


इसलिये   याद रखो !   जो भोजन करना है .........जो भी........उसे पहले   कन्हैया को खिलाना है .......और  वस्तु  वही खिलानी है     उसकी  सुकुमारता को देखते हुये   .....यानि ज्यादा मिर्च नही ...........ज्यादा  मसाला और ऑयली नही ....।


अब देखिये !     भोजन करना भी........ साधना हुयी  कि नही   ?


                                                                  गौरांगी  


****************************************************


साधकों !       इसे छोड़कर   अगर आप  घण्टे दो घण्टे  की पूजा पाठ या मेडिटेशन भी  कर लोगे   तो वह उतने समय के लिये ही होगा  ।


गौरांगी     मन के रहस्यों को समझती है ............इसलिये उसने  ये सरल  सरलतम साधना पद्धति हमारे लिए खोजी है  ।


वैसे तो  कन्हैया ने गीता में भी कहा है ..........."वो पाप खाते हैं  जो अपने लिये ही खाते हैं".........और इसी सिद्धान्त के चलते  भक्तों ने  भगवान को भोग लगाने की  पद्धति अपनाई ...........भोजन की थाली  अपने इष्ट के सामने रखकर पर्दा लगाना ...........फिर घण्टी बजा कर उस भोग को उतारना ..............वो भोजन   अब प्रसाद हो गया  ।


पर गौरांगी ने   जो  साधना बताई ...वो तो कहीं भी की जा सकती है ।


ऑफिस में  भी  खाते हैं .....बच्चे जिद्द करते हैं  तो हॉटेल में भी जाना पड़ता है ।...........उस समय  ? 


गौरांगी कहती है ..........आँखें बन्द भी न करो .......तो भी चलेगा .......कन्हैया तो मन में ही है ना .......फिर  बस उसे याद करते चलो ....जब जब खाओ .......जब जब पानी भी पीयो ........और किसी को भी  पता न चले .......।


इससे लाभ आपको इतना होगा  कि ....आपका शरीर और मन भोजन के अन्न से ही बनता है......आपके भोजन के  साथ अगर भगवत्स्मरण होगा .....तो   उसका प्रभाव पूरे जीवन पर पड़ेगा या नही ?


यह स्मरण आपके जीवन का  आधार बनेगा ............सम्पूर्ण क्रिया आपकी साधना बन जायेगी ........कन्हैया आपका हो जायेगा  ।


मैं फिर आपसे कहूँ ......इसे पढ़िये .....ये अद्भुत डायरी है........लोगों को प्रेरित कीजिये  कि  "आप भी पढ़िये"  ।


Post a Comment

0 Comments