शाश्वत की डायरी - भाग 48
आज के विचार
तदेव सत्यं तदुहैव मंगलं ...
( श्रीमद्भागवत )
डायरी क्रमशः से आगे =
हॉस्पिटल से तो छुट्टी मिल गयी मैत्रेयी को...पर ब्लेड टेस्ट में पता चला कि मलेरिया है ।
15 दिनों तक दवाई खानी ही पड़ेगी।
मैं चला जाता हूँ दिन में एक बार गौरांगी की कुटिया में...मैत्रेयी को देखने...।
क्या पागलपन है ये… तुम्हारे गुरु जी बुला रहे हैं हरिद्वार तो चली जाओ ना...वहाँ अच्छा इलाज भी हो जाएगा ।
मुझे कल झुंझलाहट हुयी...जब मैत्रेयी ने दो बार अपने गुरु का फोन काटा...।
यहाँ तो... जो मरने के लिए श्री धाम में पडे़ हैं.....उनके लिए इलाज है ।
मैं भी तो मरने के लिए ही पड़ी हूँ ! इस श्री धाम में मर जाऊँ तो...
गौरांगी ने मैत्रेयी के मुख पर ऊँगली रख दी थी ।
क्यों मरोगी तुम ? अभी तो वर्ष के पूरे उत्सव भी नही देखे तुमनें श्री धाम के ?
अभी तो तुम और हम बृज चौरासी कोस की परिक्रमा भी लगायेंगे...
ओह ! तुम्हें तो बुखार है...
पर मैं नहीं खाऊँगी दवाई...मुझे दवाई नही खाना।
गौरांगी दवाई लाई थी...पर मैत्रेयी ने उन्हें अपने पलंग के नीचे दुबका दिया।
ये क्या है ? ओह ! तुमने दवाई ली ही नही है ?
सारी दवाईयों को तुम यहीं दबाती रही?
गौरांगी को भी मैंने दिखाया...पंगल के नीचे दवाईयों को दुबका देती थी मैत्रेयी।
पर क्यों ? तुम दवा क्यों नही खा रहीं !
शाश्वत ! मैं ठीक हो जाऊँगी...और नही हुयी...तो इस श्री धाम के रज में मिल जाऊँगी...।
ये क्या पागलपन है मैत्रेयी !
सुनो ना ! शाश्वत ! ये प्लेटिनम का लॉकेट है...ढाई लाख मिल जायेंगे मार्केट में...सुनो ! मेरा शरीर अगर छूट गया ना...तो मेरे शरीर को जलाना मत...यमुना जी में प्रवाहित कर देना ।
कछुआ तो खा लेंगे ना ! उनको तो आहार मिल जाएगा...
और इन पैसों से...श्री राधा बल्लभ लाल को भोग लगवा देना ।
और हाँ ...कुछ पैसे श्री धाम वृन्दावन में भजन करने वाली बूढ़ी माताओं को दे देना...।
और हाँ...ये सोने में मढ़ा हुआ रुद्राक्ष भी है...ये लो !
मुझे दे दिया...।
पागलपन क्यों दिखा रही हो मैत्रेयी !
पता नहीं इसे आज क्या हो रहा था...
अच्छा ! सुनो !
उठने लगी थी मैत्रेयी...गौरांगी ने आकर उसे आधार दिया ।
क्या बात है...कहाँ जाना है ?
मुझे वहाँ ठाकुर जी के पास में बैठना है...
गौरांगी के नेत्रों से अश्रु बहने लगे थे।
गौरांगी ने मेरी ओर देखा...मैं भी किंकर्तव्य विमूढ़-सा हो गया था ।
सुनो ! शाश्वत ! मुझे भागवत सुनाओ ना ! मैं तुम्हारे मुख से सुनना चाहती हूँ...आज पता नही क्यों इसका मुखमण्डल लाल हो गया था...।
हाँ मैत्रेयी ! .....गौरांगी भागवत जी का ग्रन्थ लेकर आई।
मैं संस्कृत में भागवत के श्लोक गाने लगा था...
हिंदी में सुनाओ ना...ताकि मैं समझ सकूँ ।
मैं सुनाने लगा -
जब पूर्णिमा की चन्द्रीका से स्नात श्री धाम वृन्दावन दिखाई देता है ...और उस वन में जब अपने "प्रिय" दिखाई देते हैं ...और उनकी मुस्कुराहट दिखाई देती है ...तब तो ऐसा लगता है जैसे इससे सुन्दर तत्व तो स्वयं प्रियतम के पास भी नही होगी ।
जब प्रियतम के अधरोष्ठ पर नाचती हुयी वो मुस्कान दिखाई देती है ...तो लगता है इससे मीठी वस्तु तो स्वयं प्रियतम के मधु कोष में भी नही होगी ।
उनकी वो घुंघराली लटें ...ओह ! लगता है उसी में ऐसे उलझें की सुलझना भी पाप मालूम हो...।
उनकी वो हवा में फहर रही पीताम्बरी...
उनके फेंट में लगी हुयी बाँसुरी...
उनकी वो टेढ़े बनकर खड़े होने की कातिल अदा...
लगता है...अपना जीवन ही न्यौछावर कर दूँ ।
हे कृष्ण ! हे कृष्ण ! हे कृष्ण !...
जोर से चिल्लाई मैत्रेयी...और मन्द मुस्कुराते हुए...
मेरी ही गोद में गिर गयी...।
ये क्या हुआ ?
मैंने उसके मस्तक को छूआ...।
जीवन को चढ़ा गयी "बृजराज कुमार" के चरणों में ...मैत्रेयी ।
गौरांगी रो पड़ी थी ।
क्या भाग्य पाया था इसने...बड़े बड़े लोग ऐसी मृत्यु को पाने के लिए तरसते हैं ...।
बड़े बड़े महात्मा जीवन भर श्री धाम का वास करके...पर अंतिम समय चले जाते हैं...अपनी जन्मभूमि...अपने भाई भतीजों को खिलाते हुए मरते हैं...।
पर धन्य है ये मैत्रेयी !...
कन्हैया ने बड़ी जल्दी इसे पकड़ लिया...
बड़े बड़े आस लगाये बैठे रहते हैं ...पर ...
अब मेरे नेत्रों से अश्रु गिर रहे थे।
श्री धाम में मरना भी मंगल है...श्री धाम के अणु परमाणु में ही वो तत्व है...जो मृत्यु को भी मंगल बना देते हैं।
ऐसी मृत्यु !...ये तो तभी सम्भव है...जब कन्हैया स्वयं अपना ले।
कुछ देर हम दोनों ने वहीं बैठकर कीर्तन किया...
शाश्वत
मदन मोहन घेरा
वृन्दावन
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साधकों ! नाम, रूप, लीला धाम ये चारों स्वयं ब्रह्म रूप ही हैं ...
"अन्ते मति सा गति"...अंतिम समय आप जिसका चिन्तन करते हैं ...आप वहीं जाते हैं ।
शाश्वत अपनी डायरी में लिखता है...आश्चर्य ! मैत्रेयी की अध्यात्म साधना में कोई अच्छी स्थिति नही थी ।
पर जैसी गति और जिस प्रकार उसने अपने देह को त्यागा...ये अच्छी स्थिति वालों को भी प्राप्त नही होता ।
हाँ एक बात हो सकती है...धाम रूपी ब्रह्म ने अपना लिया...यही बात हो सकती है ।
अब श्री धाम जिसे अपना ले...श्री धाम के अणु परमाणु में जिसने शरीर छोड़ा हो...उसको तो निकुञ्ज की प्राप्ति हो ही गयी ।
यमराज लेने नही आते जिसकी मृत्यु श्री धाम वृन्दावन में होती है...उसे तो स्वयं अष्टसखियाँ पालकी लेकर आती हैं...और वह निकुञ्ज का अधिकारी बनता है ।...युगल वर उसका स्वयं स्वागत करते हैं।
गौरांगी ने कहा था।
ये बात सत्य है....धाम की अपनी महिमा है साहब !
साधकों! "शाश्वत की डायरी" यही विश्राम लेती है।
मैं आशा करता हूँ ... यदि हम प्रेमपूर्ण चिंतन व मनन करें.... तो "शाश्वत की डायरी" हमारे अध्यात्म मार्ग पर बहुत सहायक सिद्ध होगी।
जय जय श्री राधेश्याम !!
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