google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 शाश्वत की डायरी - भाग 47

शाश्वत की डायरी - भाग 47

 आज के विचार



मुरारे तृतीय पन्थाः 

( कस्यचिद् )


डायरी क्रमशः से आगे =


मैत्रेयी बहुत बीमार है ...पता नही उसे एकाएक क्या हुआ ?


वृन्दावन में बहुत अच्छी चिकित्सा व्यवस्था है ...राम कृष्ण मिशन ...स्वामी विवेकानंद जी द्वारा चलाई गई है ।


पर ये मैत्रेयी है कि दवाई लेती ही नही है।


मैं उसके पास ही बैठा रहा कल ...


वो बोलती रही...भगवतभक्ति के विषय में ही बोलती रही ।


मैंने उससे कहा भी...मत बोल !   चुप हो जाओ !    बुखार है तुम्हें।


कहती है...शरीर है इसको एक दिन जाना ही है।


शाश्वत !   ये  मार्ग बहुत अच्छा पकड़वाया तुमने मुझे।


उसके गुरु जी का फोन कई बार बजा हरिद्वार से...पर  इस पगली ने नही उठाया...मैंने कहा भी...उठा लो फोन !  पर नही मानी...अब श्रीधाम वास करने की इच्छा  है।


ठन्डे पानी की पट्टी,  मैं उसके माथे पर रख रहा था।


दवाई नही ले रही है...।


पानी गुनगुनाकर के मैं ही पिला रहा हूँ ।


वो मन ही मन  "राधा राधा" जप रही है।


एकाएक मेरा हाथ पकड़ कर बोली - शाश्वत !  एक बात बताओ…सब भावना का ही तो खेल है ना ? 


प्रारब्ध तो भोगना ही पड़ता है...।


प्रारब्ध तो केवल परिणाम ही प्रकट करता है ना !  उसको हम कैसे लें...अच्छे में या बुरे में...ये तो हमारे ऊपर निर्भर करता है ना ?


मैत्रेयी बहुत धीमी आवाज में बोल रही थी।


हाँ  मैत्रेयी !   जैसे बुखार आया हमें...अब इसको चाहे रो धोकर भोग लो या ऐसी भावना करलो कि हम तपस्या कर रहे हैं।


और तपस्या की भावना करोगी ना...तो इसका पुण्य भी तुम्हें मिलेगा ।


जैसे योगी लोग पंचाग्नि तापते हैं...हम जठराग्नि ताप रहे हैं ।


एक महात्मा मुझे ऐसे ही मिले थे मैत्रेयी !    उनको जब भी बुखार आता था...वो मन में भावना कर लेते थे…मैं अग्नि तापते हुए भजन कर रहा हूँ...बस आपने उस प्रारब्ध के दुःख को भी पुण्य बना दिया और उस तप की भावना का पुण्य तुम्हें मिलेगा ही ।


ये प्रयोग करने जैसा है....बहुत धीमी आवाज में बोली मैत्रेयी ।


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मैत्रेयी का शरीर जल रहा है...करीब होगा 105 बुखार।


अब मुझ से रहा नही गया...मैंने एक रिक्शे वाले को बुलाया और मैत्रेयी को जबरदस्ती  बिठाकर  राम कृष्ण मिशन ले गया ।


शाश्वत !  एक बात बताओ...हम प्रतिकूल परिस्थिति बदलने में सक्षम नही है...हाँ अनुकूल परिस्थिति का त्याग करना हमारे हाथ में है...जैसे आप गवर्नमेंट के द्वारा दिया गया पुरस्कार लौटा सकते हैं...पर सजा आपको दी गयी है...वो तो  भोगना ही पड़ेगा ।

हाँ मैत्रेयी !  तुम  अब  चुप हो जाओ...तुम्हारी तबियत ठीक नही है।


मैं ठीक हूँ शाश्वत !     


डॉक्टर ने थर्मामीटर लगाया...मैं सही था,  105 ही बुखार था उसे ।


दवाई दी डॉक्टर ने...और कुछ टेस्ट ले गया।


   


हाँ सुनाओ  शाश्वत !   मैत्रेयी ने कहा...


मैं अब निश्चिन्त था...मैत्रेयी के स्वास्थ्य को लेकर।


हाँ...अब सुनो !  लोग  जब व्रत  और उपवास करते हैं...भूखे रहते हैं...तब क्या उनको कोई दुःख  होता है ? 


लाखों रूपये दान करते हैं...यज्ञ करते हैं...भण्डारा करते हैं गरीबों का...तब क्या  उनको  दुःख  होता है  कि  अरे ! इतने लाखों का नुकसान हो गया !     


कांवड़ लेकर 100 किलोमीटर पैदल चलते हैं...खून निकल आता है पैरों से...छाले पड़ जाते हैं...पर  दुःख होता है ?


नही होता ना !  बल्कि गौरव प्रसन्नता का अनुभव करते हैं...कि देखो !  हमने दान किया...यज्ञ किया...कांवड़ लेकर गए...।


आपको पुण्य मिला कि नहीं ?     


मुस्कुराई मैत्रेयी...मिला !    


ऐसे ही जीवन में जो प्रतिकूलता आती है...


हाँ मैत्रेयी !    अगर लोग इतना कर लें...बस ऐसी भावना बनाने की आदत डाल लें… तो जीवन में न दुःख होगा...बल्कि पुण्य भी मिलेगा  ।


जैसे - आपको बुखार आ जाये तो भावना कर लो...तपस्या कर रहे हैं...आहा ! आग तापते हुए तप कर रहे हैं...इससे क्या हुआ कि आपके मन

में प्रसन्नता आ गयी...और इस भावना का पुण्य भी आपको मिल गया और बुखार तो ठीक होना ही है ।


अब अगर  किसी व्यापारी को घाटा हो जाए ...व्यापार में…तो भावना करलो कि हमने अपने भाग का समाज को दान दे दिया।


मैत्रेयी हँसी...ऐसे भी होता है क्या ? 


क्यों नही होता  मैत्रेयी !  सब भावना का ही तो खेल है।


और आप जैसी भावना करो...वैसा ही होगा।


व्यापार में  घाटा हो गया...तो भावना करो...सब कुछ मुझे ही क्यों मिलना चाहिए...समाज का भी तो हक़ है इसमें ।


बस आपका मन भी खराब नही होगा...आपको गौरव का भान भी होगा और पुण्य का पुण्य भी आपको मिल जाएगा।


आप रास्ते में चल रहे हैं...पैर फिसल गया...हड्डी टूट गयी...अब ये  दुर्घटना न घटे,   इसे आप रोक तो सकते नही हैं ।


पर आप ये अवश्य कर सकते हैं...पैर फिसला हड्डी टूटी...आप भावना कीजिये...इस पैर ने कितने पाप किये होंगें...गलत जगह गए होंगे...चलो  पापों का प्रायश्चित हो गया।


नर्स ने आकर कहा...इनसे ज्यादा मत बोलिये...इन्हें आराम की जरूरत है...।


मैंने मैत्रेयी को कहा...आँखें बन्द कर लो और नाम जप करो...तुम्हें अच्छा लगेगा।


मैत्रेयी मुस्कुराई।


शाश्वत 


रामकृष्ण मिशन 

वृन्दावन 

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साधकों !    ये जो मैत्रेयी और शाश्वत का सम्वाद है...इसमें जो चर्चा हुयी है...वो सच में जीवन में उतारने जैसा है।


कल पान की दुकान पर मिला था मुझे शाश्वत।


मैंने उससे पूछा...यार !   ये  बात तुम्हारे मन में कहाँ से आई ? 


कि बुखार को… परेशानी को… पुण्य में बदल देने का आइडिया ?


शाश्वत ने मुझे इसका रहस्य बताया...मुझे ऋषिकेश में एक महात्मा मिले थे...उनको जब बुखार आता था...तब वो कहते थे...लोग पंचाग्नि तापते हैं...मैं जठराग्नि तापते हुए तप करूंगा।


फिर मुझे दिल्ली में एक व्यापारी मिले...मारबाड़ी थे उनको घाटा होता व्यापार में तो कहते...कि चलो अच्छा हुआ समाज को भी तो मिलना चाहिए  मैंने समाज को दान कर दिया।


ये कहते हुए शाश्वत हँसा था...मैंने कहा...मैत्रेयी कहाँ है ? 


शाश्वत बोला… डायरी  अभी वहाँ तक पहुंची नही है क्या हरिशरण जी?


मैं कुछ नहीं बोला...उसके हाव भाव को ही गौर से देखता रहा।


डायरी क्रमशः ....

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