google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 शाश्वत की डायरी - भाग 46

शाश्वत की डायरी - भाग 46

 आज के विचार



तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नुमः...

( श्रीमद्भागवत )


डायरी क्रमशः से आगे =


शाश्वत !   ओशो के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है ? 


बरसाने से  वृन्दावन आते समय  मैत्रेयी ने मुझ से पूछा था ।


ओशो के बारे में !   मेरे पास समय कहाँ है कि मैं सोचूं ?   मैंने  कहा ।


उनको बुद्धपुरुष कहा जाता है…मैत्रेयी ने मेरी ओर देखा।


मैंने कहा- मैत्रेयी! रोल्स रॉयल कार के पीछे जो पागल हो और उसकी एक लम्बी कतार लगाने का ही जिसके जीवन का लक्ष्य हो...और अपने श्रीमन्त शिष्यों से जो धन एकत्रित करके दक्षिणा में रोल्स रॉयल कार लें...ऐसे  ओशो को अगर तुम बुद्धपुरुष मानती हो...तो  धन्य  हो तुम और तुम्हारी बुद्धि  ।


देखो !  मैत्रेयी !     अच्छा बोलना...तार्किक बोलना...एकाग्रता के साथ बोलना...ये प्रतिभा तो हो सकती है...पर इससे तुम किसी को भी  बुद्धपुरुष कह दो...ये  बुद्धिमानी नही है।


काम वासना की आँधी चलती है...उसके लिए ओशो ने कहा...भोग कर अनुभव कर लो उससे तुम मुक्त हो जाओगे उस काम वासना से…

तुम क्या कहते हो ?   मैत्रेयी ने पूछा ।


ये बेबकूफ बनाने वाली बात है और कुछ नही ।


वो वासना का अनुभव चित्त में छप जाएगा फिर उसे मिटाना बड़ा भारी पड़ेगा...पता है  ?

मैत्रेयी !    वासना की आँधी जब चलने लगे ना…तो सबसे बढ़िया है अपनी खिड़की बन्द कर लो।


वहाँ से चले जाओ...या उस स्थान को छोड़ दो...या थोड़ा मन को सख्त करके उस व्यक्ति का संग ही छोड़ दो...जिसके कारण काम वासना तुम्हारे मन में प्रवेश करे ।


भोजन छोड़ दो उस दिन का, जब काम वासना सताने लगे...


थोड़ा घूम लो...थोड़ी परिक्रमा लगा लो...।


क्रोध आये तो ?   मैत्रेयी ने मुझ से पूछा था।


जैसे ही क्रोध आये...ठन्डा पानी पी लो और थोड़ा "कृष्ण कृष्ण कृष्ण"  नाम का स्मरण कर लो...क्रोध शान्त हो जाएगा ।


वृन्दावन कब आ गये पता ही नही चला...40 KM. है वृन्दावन से बरसाना।


हम दोनों सीधे बाँके बिहारी जी के मन्दिर में गए...अभी पर्दा खुला नही था कुछ देरी थी  ।


सब दर्शनार्थी  प्रतीक्षा में थे...कोई भजन गा रहा था, तो कोई संकीर्तन की धुन लगा रहा था।


मैं और मैत्रेयी एक तरफ खड़े हो गए...भीड़ थी।


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पर्दा धीरे-धीरे खुल रहा था श्री बाँके बिहारी जी का...


सब लोग जय जयकार कर रहे थे...श्री बाँके बिहारी लाल की जय !


मैत्रेयी !  अपने प्रयास से व्यक्ति शायद ही सफल हो...


सच्ची सफलता तो  इन्हीं बाँके बिहारी जी के चरणों में ही है...।


मैंने कहा।

आँसू पोंछ रही थी  दर्शन करते हुए  मैत्रेयी।


क्या हुआ ?    मैंने ऐसे ही पूछ लिया।


आहा ! कितनी सुन्दर बात बताई  शाश्वत ! तुमने...


सफलता मात्र साधना के परिपक्व होने में ही नही है...वह किसी क्रिया में   या विशेष चित्त की अवस्था में भी नही है...वह सफलता तो श्री बाँके बिहारी के इन चरणों में रहती है...


सजल नयन थे मैत्रेयी के।


मेरे मन में भी विकार उठते हैं मैत्रेयी ! …पर मैं तो डाँट देता हूँ...विकारों को डाँटते हो शाश्वत… ?  मैत्रेयी ने पूछा ।


नही...अपने इन बाँके बिहारी को।


यह क्या ऊधम  है ?    


बस एक बार जो उसे झिड़क देता हूँ...दबे पाँव विकार भाग जाते हैं ।


अरे ! हिम्मत है क्या इन श्री बाँके बिहारी के सामने कोई विकार टिक भी जाए !


अरे !    मन्मन्थ (कामदेव)  को जीता है इस नन्द के कुमार ने...


मजाल है कि काम वासना इसके आगे टिक भी जाए ।


और काम देव का बाप है ये सुकुमार गोपाल...अब बाप के आगे भला बेटा  अपनी दादागिरी दिखायेगा ?


पर क्रोध ?    क्रोध ज्यादा दुष्ट है काम की अपेक्षा...।


पर इसके आगे तो वह क्रोध भी भाग जाता है ...क्यों कि  प्रलयंकर महारुद्र के जो आराध्य हैं...प्रलयंकर रूद्र को भी जिसने अपनी गोपी बनाकर नचाया हो...उस गोविन्द के आगे क्रोध बेचारा क्या है !

पर  शाश्वत !  तुम  बारम्बार इन्हें डाँटते रहते हो ? 

मैत्रेयी ने ये क्या कह दिया ।


काम वासना उठे तो  डाँटते हो...क्रोध उठे तो डाँटते हो !  


देखो तो !  कितना सुकुमार है..."बृजराज कुमार"।


ओह !   ये बात तो हृदय को छू गयी थी  मैत्रेयी की।


क्या  ऐसा नही हो सकता शाश्वत !    कि काम  का सम्बन्ध भी इसी से जुड़े ...और क्रोध भी इसी से जुड़े...लोभ भी इसी से हो...मोह भी इसी से हो जाए।


मैंने आगे बढ़ते हुए आज मैत्रेयी को अपने हृदय से लगा लिया था।


कितनी ऊँची बात कह दी तुमने यार !


बृजराज कुमार से चाहे काम का सम्बन्ध हो या क्रोध का... वह वासना  तो  है ही नही...उपासना हो जायेगी  ।


मैं चुप हो गया था...ये  प्रेम के सिद्धान्त मैत्रेयी कैसे धड़ाधड़ बोल रही थी आज...।


हाँ बात कितनी सही कही है...अरे ! दुश्मनी करके भी तो तर गए राक्षस...इस बाँके बिहारी से।


आहा !    फिर क्यों हम ध्यान, ज्ञान, मेडिटेशन, योगा इन सबके चक्कर में पड़े रहते हैं...सबसे बड़ी सफलता तो इन गोपाल के चरणों में ही है...इनके  चरणों को पकड़ने में ही है।


क्यों हम काम वासना को रोकने या  इसे दबाने के चक्कर में अपनी ऊर्जा को व्यय करते रहते हैं...


क्यों न हम  काम, क्रोध, लोभ, मोह,  अहंकार  इन सबको बाँके बिहारी के चरणों में लगा दें तो…? 


शाश्वत ! तुम्हीं ने तो कहा न...कि सफलता तो इन्हीं के चरणों में है।

मैंने  कहा...हाँ...यही सत्य है…और  यही सत्य हैं...

पर्दा बारम्बार आ रहा था...मानो मुझे ऐसा लग रहा था कि बाँके बिहारी आज मुझ से लुका छुपी का खेल खेल रहे हैं।


मैत्रेयी के ऊपर  कृपा कर दी थी बाँके बिहारी ने ।


शाश्वत 


मदन मोहन घेरा 

वृन्दावन 


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साधकों !   मैत्रेयी को भी अपनी ओर खींच लिया  बृजराज कुमार ने।


शाश्वत ने लिखा है...ये श्री बाँके बिहारी है...


कितना अच्छा बोली थी मैत्रेयी...काम वासना को हटाने के लिए इतना झंझट क्यों ?   सीधे काम को बाँके बिहारी के चरणों में लगा दो ना...काम यानि इच्छा !   इच्छा बस यही हो कि  -  तुम मिलो।


और ऐसी इच्छा रखो कि जिसके आगे सारी इच्छाएं बह जाएँ ।


शाश्वत ने लिखा है कि इस बात पर  मैंने  मैत्रेयी को गले से लगाया।


कितनी जल्दी  सीख गयी थी ये -  प्रेम के सिद्धान्त ।


इन सबसे लड़कर क्या मिलेगा ?  काम से लड़ो...क्रोध से लड़ो...लोभ से लड़ो...अपनी ऊर्जा ही तो खतम हो रही है ना !


मैत्रेयी कहती है...एक मात्र अपना मन श्याम सुन्दर में लगा दो न...


बस...बात खतम ।


रहस्यों से भरपूर है ये शाश्वत की डायरी...नित्य पढ़िए।


डायरी क्रमशः .....

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