google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 शाश्वत की डायरी - भाग 45

शाश्वत की डायरी - भाग 45

 आज के विचार


गुणाश्च चित्त प्रभवा मद्रुपम उभयं त्यजेत् ।

( श्रीमद्भागवत )


डायरी क्रमशः से आगे =


बरसाने में जब से आई है मैत्रेयी...तब से वो भागवत का यही श्लोक बार-बार बोले जा रही है...कहती है शाश्वत! हरिद्वार के आश्रम में तुम्हीं  छोड़ आये थे श्रीमद्भागवत की किताब...मैं पढ़ती थी।


"गुणेश्वा विशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रभो"


यही श्लोक बोल रही है ये मैत्रेयी ।


आने वाली तो गौरांगी भी थी बरसाने....पर उसके गुरुदेव का स्वास्थ्य  खराब हो गया था...उनकी दोनों किडनी फेल हैं।


मैत्रेयी आई है...स्वयं गाड़ी लेकर आ गयी।


मन की शुद्धि कैसे हो  ?   इसे मन की शुद्धि करनी है।


हम लोग बरसाने की परिक्रमा लगा रहे थे...कुञ्ज लताओं में बैठते उठते  भाव सिन्धु में डूबते और उतरते जा रहे थे ।


तब मैत्रेयी ने कहा...मेरी निष्ठा सगुण साकार में नही है ।


अब निर्गुण निराकार का ध्यान तो होता नही है...मैंने कहा...।


अष्टांग योग का अधिकारी भी वही होता है...जिसने अच्छे से ब्रह्मचर्य का पालन किया हो...।

प्रणायाम  करना...तुम्हें पता है मैत्रेयी !  अगर ज्यादा वीर्यस्खलन हुआ है, तो ज्यादा  प्रणायाम करने से स्नायु दुर्बल हो जाते हैं जिसके कारण हम रोगी हो

जाते हैं।  कुछ भी करो...लय योग करो या कुछ भी...सबमें  मन की एकाग्रता तो चाहिए ही...।


नहीं नहीं शाश्वत!  मुझे चमत्कार नहीं...एकाग्रता चाहिए...मन की एकाग्रता...मैत्रेयी ने कहा।


एकाग्रता के लिए  मुझे  हरिद्वार में त्राटक करने के लिए कहा था ।


पर मुझे ये त्राटक नही करना...मुझे कहा था कि ज्योति या किसी  दीपक का ध्यान करो ।


मैंने भी कहा...जब  सामने सूर्य और चन्द्रमा  इतने बड़े हैं, तब किसी ज्योति के ध्यान  करने का क्या अर्थ है  !


राम राम राम...ये नाम कैसा लगता है...? 


मैंने पूछा ।


हाँ, अच्छा तो लगता है...पर मुझे वो धनुष बाण लिए राम पसन्द नही हैं...वो  तुलसी दास जी के मुस्कुराते हुए राम पसन्द नही है ।  …तो ?   मैंने  बीच में ही पूछ लिया।


मुझे कबीर दास जी के राम पसन्द हैं...निराकार सगुण राम ।


फिर तुमने कबीर दास जी के राम का जप किया कि नही ? 


मैंने हँसते हुए पूछा था ।


किया ना...पर  !     


पर क्या ?   मैंने पूछा ।


कुछ दिन तक तो मन लगा...पर फिर मन  बोर होने लग गया ।


मन जप में लगता था...पर कुछ ही देर में  किसी और उधेड़बुन में लग जाता...।

फिर ?    आगे क्या किया तुमने ?  

मेरे सन्यासी गुरु जी ने मुझ से कहा..."सोहम् सोहम्" जपो !


बड़ी सहजता से अपनी बात बता रही थी मैत्रेयी ।


प्रणव मन्त्र का अधिक माहात्म्य है...सोहम् मन्त्र बड़ा हो गया है...तो प्रणव मन्त्र ॐ ॐ...इसे जपो।


फिर क्या हुआ ?   


मैंने आगे की बात जाननी चाही ।


शाश्वत !     ॐ मन्त्र या सोहम्...इनको भी मैंने 1 महिनें तक जपा...पर  वही स्थिति बल्कि मन्त्र जपने से पहले ही मन ठीक था...ऐसा लगा मुझे तो...मन्त्र जब भी जपती थी...मन और भागता था...उछलता था।


शाश्वत !     बताओ ना !   इसका कारण क्या है ?  


मन्त्र जपने के बाद भी मन इतना चंचल क्यों ?  


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भगवन्नाम  कोई छोटा बड़ा नही होता  मैत्रेयी !


किसी भी नाम को जपो...किसी भी मन्त्र को जपो...पर एक के ही प्रति निष्ठा होनी चाहिये ।


 निष्ठा थी मेरी...पर क्यों मेरा मन पहले की अपेक्षा और चंचल हो जाता था?   


मैत्रेयी !  कमरे में कई दिनों से झाड़ू नही लगा...तुम एकाएक झाड़ू लेकर सफाई करने पहुँच गयीं...अब धूल तो उड़ेगी ही ना ?


ऐसे ही ये मन है...इसकी सफाई आज तक तो हुयी नही...तो  आज तुम नाम मन्त्र के द्वारा सफाई करने चली थीं, अब धूल तो उड़नी ही थी...पर तुम डर गयी...डरो मत...ये जन्मों जन्मों की परत जमी है  मन पर  गन्दे धूल की...अब देखो...झाड़ू न लगाओ तो तुम्हें पता ही नही चलेगा कि...धूल है भी।

पर  झाड़ू लगाते ही...धूल उड़ेगी  ।

मेरी बात सुनकर मैत्रेयी के चेहरे पर चमक आ गयी थी...वो बात को समझ गयी...बोली -  शाश्वत !  एक बार सफाई हो गयी...तो  फिर बार-बार सफाई करने की जरूरत है क्या ? 


नाम जप के द्वारा मन शुद्ध हो गया...बस फिर तो नाम जप को छोड़ देना चाहिए ना ? 


क्या कमरा को एक बार साफ़ करके...फिर गन्दा नही होगा ये गारन्टी ले सकती हो  मैत्रेयी ?     


मैत्रेयी ने चौंक कर मेरी ओर देखा...मैंने उसे समझाया -  देखो !    प्रकृति के क्षेत्र में जो भी है...उसे गन्दा होना ही पड़ेगा, वो होता ही है...क्या शरीर गन्दा नही होता ?   इसको दिन में कितनी बार तो धोते रहना पड़ता है...है ना ?


पर  मैं शरीर की बात नही कर रही...मैं तो मन की बात कर रही हूँ ।


मैत्रेयी !    मन  भी तो शरीर ही है...विचार करो ।


क्या  स्थूल शरीर को ही तुम शरीर कहती हो ? 


क्या सूक्ष्म शरीर,   शरीर नही है ? 


मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ...ये सब सूक्ष्म शरीर हैं।


और ये  गन्दे होते रहते हैं...अगर नित्य इन्हें साफ़ न करो तो...काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर,...इनकी गन्दगी जमने लगती  है...।


सफाई नित्य करनी पड़ेगी।


"मद्रुपम् उभयं त्यजेत्"


मैत्रेयी ने उसी समय भागवत जी का ये श्लोक गुनगुना दिया ।


एकादश स्कन्ध का ये श्लोक है...हँस भगवान से जब पूछा था सनकादि ऋषि ने...कि  चित्त  संसार में लगता है...संसार चित्त में प्रवेश कर चुका है...अब कैसे संसार और चित्त को अलग अलग करें ?

तब बड़े प्रेम से उत्तर दिया था...हँस भगवान ने…

चित्त भी मिथ्या है और संसार भी मिथ्या है...दोनों ही मिथ्या हैं इसलिये दोनों को ही छोड़ो  और मुझ में  अपने आपको लगाओ ।


मैत्रेयी  समझ रही थी...तभी तो भागवत  का ये श्लोक गुनगुना दिया।


अच्छा ! अच्छा !  शाश्वत!  एक बात तो बताओ...नाम जप करके हम मन को शुद्ध करें...मन शुद्ध हो गया...भगवत् दर्शन हो गए...फिर नाम जप क्यों करें  ? 


मैं हँसा...खूब हँसा...


तुम   "राधा राधा राधा राधा"  इस नाम को जप सकती हो ? 


कितनी देर ?   मैत्रेयी ने पूछा।


जब तक परिक्रमा पूरी न हो जाए ।


ठीक है...मैत्रेयी ने जपना शुरू किया।


बड़े प्रेम से 4 घण्टे तक वह मौन होकर राधा राधा राधा नाम जपती रही।


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मैंने उसे देखा था...बरसाने के मंदिर में उसे रोमांच हो गया था ।


वहाँ राधा नाम की धुन चल रही थी...मैत्रयी बहुत नाची ।


उसके नेत्रों  से अश्रु बहने लगे थे अब..."राधा राधा राधा" जपते हुए ।


मैंने तो ऐसे ही बोल दिया था...पर मुझे क्या पता था कि...इसको इस नाम का इतना असर हो जाएगा।


"राधे राधे राधे राधे"...वो मन्दिर में नाचती रही...


अब क्या आज्ञा है शाश्वत ! 

दो घण्टे बाद जब हम बरसाने की सीढ़ी से नीचे उतर रहे थे...तब मुझ से पूछा था मैत्रेयी ने ।

एक काम करो...अब तुम्हारा मन पवित्र हो गया...झाड़ू लग गयी...तुमने अश्रु भी बहा दिए...इसलिए अब तुम ये राधा नाम जपना बन्द कर दो...आज से ही...अभी से ही। मैंने कहा ।


क्या ?     नहीं...शाश्वत !  ये मुझ से अब नही होगा।


इस नाम से मुझे प्रेम हो गया है...इस भगवन्नाम से मुझे लगाव हो गया है...सच कह रही हूँ  शाश्वत  ।


मैं हँसा...खुल के हँसा।


क्या बात है  तुम हँस क्यों रहे हो ?   मैत्रेयी ने मुझ से पूछा ।


पहले करना पड़ता है...क्रिया करनी पड़ती है...फिर तो जो होता है स्वाभाविक ही होता है...।


नाम जप करना पड़ता है...भाव से, प्रेम से, प्रगाढ़ रति से,...फिर तो  आदत बन जाती है...फिर छोड़ा नही जाता।


ये बड़े-बड़े सन्त लोग...ये बड़े बड़े सिद्धात्मा सन्त लोग...क्यों नाम जपते फिरते हैं !    क्यों कि मैत्रेयी !    इनको भी बृजराज कुमार से प्यार हो जाता है और जब प्यार हो जाता है...फिर तो कुछ कहने के लिए बचा ही नहीं।


मैत्रेयी !  अब पूछने के लिए कुछ बचा क्या ? 


मन की शुद्धि कैसे हो ?  


नाम जप से...


मन की शुद्धि के बाद नाम जप छोड़ दें ? 


छोड़ ही नही पाओगे...क्यों कि वह  तुम्हें पकड़ लेगा ।


वह तुम से तुम्हें चुरा लेगा...अब करो क्या कर सकते हो !

देखो ! बृजराज कुमार  ही हैं समस्त धर्मों के स्वामी...इनके नाम को पकड़ लो...धर्म का सार तुमने पकड़ लिया...फिर कुछ और करने की जरूरत ही नही है।

मेरे नेत्रों से  अश्रु बहने लगे थे...मैत्रेयी !   श्री मद्भागवत में शौनक जी ने पूछा भी है...ये बड़े बड़े आत्माराम, पूर्णकाम होने के बाद भी कृष्ण के चक्कर में क्यों पड़े रहते हैं ?


तब एक ही उत्तर दिया था सूत जी ने...


" इत्थंभूत गुणों हरिः "


ये हरि है ही ऐसे प्यारे !   क्या करोगे !


जिसे अपना बना लेते हैं ये...उसका सब कुछ चुरा लेते हैं...सब कुछ...उसके पास कुछ नही रहता...अपना  "मैं" भी नही रहता ।


मुझे देखो ना ! मैत्रेयी !   कितना बड़ा ज्ञानी था...कितना बड़ा योगी था...पाँच-पाँच दिनों तक मैं देह भान  भूला रहता था...।


पर अब ?    सब कुछ चुरा लिया मेरा...


वो चोर है...सब कुछ चुराता है ।


वेद भी कहते हैं मैत्रेयी !    वो तस्करों का सरदार है...


तस्कराणां पतये नमः 


मेरे नेत्रों से झरझर आँसुओं की झरी लग गयी थी।


शाश्वत 

लाडिली मन्दिर 

बरसाना 


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साधकों !  "शाश्वत की डायरी" में  गूढ़ बातों को सरलता से समझाया गया है।

नाम जप शुरुआत में क्यों ?   इसका उत्तर दिया है  शाश्वत ने - क्यों कि  चित्त में, मन में अनेक जन्मों के संस्कारों की धूल जमीं है...गन्दा हो गया है मन...तो नाम जप सफाई करने का काम करती है।

पर  शुरुआत  में नाम जपने पर,  मन में अनेक-अनेक विचार आते हैं...तब लगता है...अरे !  इससे बढ़िया तो ये था कि नाम ही न जपते...नाम के जपते ही विचारों का झंझावात खड़ा हो गया है।


इसका उत्तर देते हुये शाश्वत ने लिखा है - धूल तो उड़ेगी...जब कमरा साफ करोगे  ।


पर कब तक साफ करें ? 


नाम जप कब तक करें ?  


मन शुद्ध हो गया...अब तो छोड़ दें नाम जप ? 


इसका उत्तर दिया शाश्वत ने...तुम छोड़ ही नही सकते।


मैत्रेयी को  "राधा" नाम की दीक्षा दी बरसानें में  शाश्वत ने...और कहा...इसे जपो ।   


शाश्वत जानता था कि राधा नाम...वो भी बरसाने की भूमि में कुछ अलग ही प्रभाव देगी...।


दिखाया नाम ने अपना प्रभाव...रोने लग गयी  मैत्रेयी...नाचने लग गयी  मैत्रेयी...।


तब शाश्वत ने गम्भीर होकर कहा...अब कभी राधा नाम को मत जपना...।


तब मैत्रेयी कहती है...ना !   अब नहीं छोड़ सकती ये राधा नाम।


बस मैत्रेयी !   ऐसे ही पहले नाम जप को क्रिया बनानी पड़ती है...पर बाद में  ये नाम जप आदत में शुमार हो जाती है।


तुम्हें प्यार हो जाता है उस नाम से...।


शाश्वत लिखता है...तुम्हें ही क्यों…बड़े-बड़े ऋषियों को  प्यार हो जाता है...क्या करोगी  वो हैं ही इतने प्यारे ! 


 गहन बातों  को  कितनी सरलता से समझा देता है ना...ये शाश्वत।

आप  पढ़ते रहिये   शाश्वत की डायरी...


डायरी क्रमशः ........

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