शाश्वत की डायरी - भाग 44
आज के विचार
आग लगी आकाश में गिरने लगे अंगार,
सन्त न होते जगत में तो जल जाता संसार।
( कबीर दास )
डायरी क्रमशः से आगे =
गोवर्धन में दो दिन रुक कर मैं आगे निकल गया था...।
मुझे किसी ने बताया कि यहाँ से पास में ही बद्रीनाथ केदारनाथ हैं।
मैं आनन्दित हो उठा...मुझे बद्रीनाथ में रहे उन दिनों की याद आगयी थी।
पर यहाँ बद्री नाथ कैसे ?
चलते-चलते ये प्रश्न मुझे परेशान कर रहा था।
श्री बाल कृष्ण ने अपनी मैया और बाबा के लिए बद्रीनाथ, केदारनाथ, रामेश्वरम् सब तीर्थों को यहीं बुला लिया था।
क्यों कि उनकी मैया यशोदा और बाबा ने ये संकल्प लिया था कि "हमारे पुत्र होगा तो हम लोग चार धाम की यात्रा में जायेंगे...।
बृज से बाहर भेजने की कृष्ण की कोई इच्छा नही थी...इसलिए यहीं बुलवा लिया।
मैं उस तरफ चल दिया था...राजस्थान की सीमा में है यह गाँव।
ब्रज चौरासी कोस के अंदर ही आता है।
वहाँ भी मुझे एक सिद्ध महात्मा मिले ...30 वर्षों से उन्होंने अन्न नही खाया था...घनघोर जंगल में अकेले बैठे रहते हैं...।
" मैं शाश्वत ! बद्रीनाथ में रहा हूँ "
...मैंने कहा...कुछ कहकर बात की शुरुआत तो करनी ही थी।
पर मूलतत्व बद्रीनाथ का यहीं पर है...ये बात उन महात्मा जी ने कही।
कैसे ? तब उन्होंने उत्तर दिया...कृष्ण भगवान ने बद्रीनाथ के मूल तत्व को ही बुला लिया था ना यहां।
पर जो भी हो...यहाँ ऊर्जा बहुत है।
आप कब से यहाँ हैं ? मेरे इस प्रश्न का उन्होंने कोई उत्तर नही दिया।
ठीक ही किया...इस प्रश्न में कोई सार भी नही था।
यहाँ आपको कोई ऐसी अनुभूति हुयी है ?
हाँ...हुयी है। इस प्रश्न का उत्तर बड़े मनोयोग से उन्होंने दिया था।
हमारे यहाँ भण्डारा था...शाम के समय...एक 7 फुट के बड़े महात्मा भिक्षा लेने के लिए आये।
गौर वर्ण था...लम्बे थे...शरीर कोमल था ।
शरीर के सारे बाल सफेद थे...दिव्य मूर्ति थे वो।
मैं इसी कुटिया में बैठा था...
उन्होंने भिक्षा मांगी...देने वाले ने खीर दे दिया।
उन्होंने खीर पी...पर ये क्या...वो खीर पी रहे थे...और वही खीर उनके शौच से निकल रहा था।
मैं समझ गया...ये कलियुग के महात्मा नही हैं...यहाँ सत्ययुग के महात्मा भी रहते हैं और ये सत्ययुग के ही महात्मा हैं...तभी खीर इन्हें पची नही...ये कन्द-मूल फल खाते होंगे।
मैं उनके पीछे भागा...तब तक तो वो कहीं खो गए थे।
क्या यहाँ सतयुग के भी सन्त हैं ?
हाँ हैं...यहाँ की सुगन्ध से तुम्हें नही लग रहा?
उन महात्मा जी ने मुझे कहा।
पपीता के कई पेड़ थे वहाँ...मोर आते थे और दानें महात्मा जी के हाथों से खाते थे।
वहाँ मैंने 12 रँग के तोते देखे थे।
पक्षी बहुत प्रेम करते थे इन महात्मा जी से...महात्मा जी तो बस इन बेजुबान पक्षियों को अपनी जान से ज्यादा मानते ।
इनके मित्र ही थे ये पक्षी, वृक्ष, गाय...कुछ अजीब से थे महात्मा।
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सन्त न होते जगत में, तो जल जाता संसार !
ये पँक्ति महात्मा जी बारम्बार बोल रहे थे...
क्या सच्चे सन्त आज भी हैं ?
ये प्रश्न मैंने किया था।
क्यों नही है...हर जगह हैं...हर स्थान पर हैं...हर देश में हैं...
महात्मा जी ने मुझे कहा।
अगर सन्त नही हो तो तुम्हें लगता है ये संसार ऐसे चल पाता ?
तो क्या होता ?
जल जाता ये संसार ! आग लग जाती !...सन्त ही तो अपनी उपस्थिति की शीतलता प्रदान करके इस जगत को बचाते हैं ।
मैं मुस्कुराया...बड़ी सहज बातें बता रहे थे।
नकारात्मक ऊर्जा वाले लोगों से ये जगत भर गया है...अगर सकारात्मक ऊर्जा वाले लोग न हों, तो तुम्हें नही लगता...टेंशन से ये जगत ही खत्म हो जाता।
सन्त सकारात्मक ऊर्जा को धारण करके चलते हैं...सन्त लोग अध्यात्म की ऊर्जा को फैलाते हैं...जिसके कारण कुछ शान्ति...कुछ शीतल हवा का झोंका संसारियों को मिलता रहता है...।
इतना बोलकर वो महात्मा जी चुप हो गए।
फिर बोले...पपीता खाओगे ? वृक्ष का पपीता है...बहुत मीठा है...इतना कहकर उन्होंने स्वयं ही पेड़ से पपीता को तोड़ा...फिर आधा मुझे दिया और आधा स्वयं ने पाया ।
हाँ, सन्त न होते जगत में तो ? मैंने उसी विषय को फिर छेड़ दिया।
हाँ...पपीता पाकर हाथ धो लिया था हम दोनों ने।
देखो ! एक रहस्य की बात बताता हूँ।
कलियुग जैसे-जैसे बढ़ेगा ना...वैसे ही सन्त...सिद्ध-सिद्ध सन्त जगह-जगह प्रकट होंगे...।
ताकि जो सच्चा खोजी है...सच्चा आध्यात्मिक पिपासु है, उसके लिए व्यवस्था तो देनी पड़ेगी ना।
जैसे पिछले जन्मों का साधक साधना अधूरा छोड़कर मर गया...पर अब जब उसका जन्म हुआ...तब आगे की साधना कौन बताएगा...उसकी भी तो व्यवस्था...अस्तित्व को करके देनी पड़ेगी ना ।
इसलिये सन्त हर युग में, हर काल में प्रकट होते रहते हैं।
और ऐसा मत सोचना कि कलियुग में सन्त नही होते...नही सन्त हर युग में होते हैं...कलियुग में भी हैं।
हर प्रान्त में होते हैं...हर गाँव में होते हैं...हर देश में होते हैं।
और ये सन्त, जिनकी जिम्मेवारी होती है कि इन क्षेत्रों को...शान्त रखना है और इन क्षेत्रों में जो जिन जिन साधू आत्माओं ने जन्म लिया है...उनकी आध्यात्मिक प्रगति पर काम करना है।
उदाहरण हैं आपके पास इस बात के...कि ऐसे ही ?
ये प्रश्न मैंने नही किया था...एक गाँव का लड़का बैठा था उसने ये प्रश्न किया...मुझे अच्छा लगा।
उदाहरण बहुत हैं।
रैदास जी का जब जन्म हुआ… निम्न वर्ण के घर में पैदा हुए थे रैदास जी...पर स्वामी रामानन्दाचार्य जी उनके घर गए उस बालक के जन्म होते ही ।
उन्हें कैसे पता चला कि कोई महात्मा ने जन्म लिया है !
ये सब अस्तित्व की व्यवस्था है...सन्त हर जगह हैं ।
पर हम उन्हें नही पहचान पाते...क्यों कि वो पागल भेष में भी हो सकते हैं...सामान्य से सामान्य भेष में भी हो सकते हैं और संसारी रूप में भी हो सकते हैं...।
पर वो ही सम्भाले हुए हैं इस जगत को।
मैं शाश्वत विचार करने लगा...कि ये तो बड़ी रहस्यमयी बातें बताईं इन महात्मा जी ने।
इसलिये हमारे शास्त्रों में सन्त सेवा का...साधुओं के भण्डारा करने का इतना महत्व है...।
देखो ! आज कल लोग कहते हैं...साधुओं को कोई काम धाम तो है नही...ऐसे निकम्मो को भोजन नही देना चाहिए...।
पर ऐसा कहने वाले लोग...बहुत स्थूल बुद्धि के होते हैं…
जो मात्र काम करना, धन कमाना और अपना परिवार पालना...इतने को ही जीवन समझ लेते हैं...
पर जीवन में...इस जगत में कितने रहस्य हैं...उनसे इनको कोई लेना देना नही है।
ऐसे लोगों की यहाँ बात नही हो रही...
यहाँ बात हो रही है...इस जगत में सन्तों का अगर अकाल पड़ जाएगा तो देखना ये जगत जल जाएगा।
नकारात्मक विचार चारों ओर फैले हुए होंगे...उन विचारों से कैसे लड़ोगे ? सत्संग के बिना कोई आधार होगा उस समय ?
सन्त ही तो सत्संग देते हैं ना...?
उन स्थूल बुद्धि वालों की बातें मत सुनो...प्लीज़ ! तुम तो सन्तों को देखो तो जितना बन सके उनकी सेवा करो...हाँ, हो सकता है...कोई-कोई गलत सन्त भी मिल जाए...पर तुम्हें क्या...तुम्हें तो सेवा करने का फल मिल ही जाएगा ना ! बाकी सही है या गलत है...ये वो भोगेगा… उसे ठाकुरजी देखेंगे।
पर सच्चे सन्त होते ही नही है कलियुग में...ऐसा सोचना गलत है।
बहुत हैं...आँखें चाहिये...अरे !
"सन्त न होते जगत में, तो जल जाता संसार"
फिर यही बात कही उन महात्मा जी ने और मौन हो गए ।
मैं भी वहाँ रुका...एक रात...फिर बरसाने की ओर चल दिया था।
क्यों कि गौरांगी और मैत्रेयी बरसाने आ रहे थे और बरसाने वो लोग मेरे साथ रहना चाहते थे… मेरे साथ घूमना चाहते थे।
शाश्वत
आदि बद्रीनाथ
जिला डींग ( राजस्थान )
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साधकों ! सत्संग जीवन में बहुत आवश्यक है ।
सन्त का संग...जितना हो सके उतना करो सत्संग ।
शाश्वत अपनी डायरी में लिखता है - साधक के जीवन में एक अवस्था ऐसी आती है...जब साधक को एकान्त प्रिय लगने लगता है...उसे लगता है क्या सत्संग में जाना...क्या कथा में जाना...क्या कीर्तन में जाना...।
पर इस अवस्था से बचना चाहिए साधक को ।
बड़ी गहरी बात बताता है शाश्वत ।
हां...ऐसा समय आता है...साधना करते-करते…लगने लगेगा...कि ठीक तो है...कहीं आना जाना क्यों ? अब सत्संग से हमें क्या मिलेगा...जो मिलना था मिल तो गया है।
पर नही...आप क्या हनुमान जी से बड़े हो ? आप क्या शुकदेव, नारदादि इन सबसे बड़े हो...
इनको देखो...सत्संग करते रहते हैं हनुमान जी...
जहां जहाँ राम कथा होती है...वहाँ सब कुछ छोड़कर हनुमान जी चले जाते हैं...नारद जी भी सत्संग के बड़े प्रेमी हैं।
शाश्वत लिखता है...तालाब गन्दा हो जाता है क्यों कि बंधा हुआ है...नदी स्वच्छ है...क्यों कि बह रही है ।
सत्संग प्रवाह है...रुको मत...सत्संग से अपने विवेक को जगाते रहो...फिर अध्यात्म की सूक्ष्मता स्वयमेव प्रकट होगी ।
सावधान करती है सत्संग...और साधक यानि सावधान ।
सत्संग को मत छोड़ना...सन्त मिले तो दौड़कर उनका संग करो।
पर सच्चे सन्त का...संग करना चाहिए।
बड़ी गम्भीर-गम्भीर बातें लिखी है शाश्वत ने अपनी डायरी में ।
डायरी क्रमशः .......
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