शाश्वत की डायरी - 43
आज के विचार
जपात् सिद्धि जपात् सिद्धि जपात् सिद्धि न संशय ..
( भक्ति रसार्णव सिन्धु )
डायरी क्रमशः से आगे =
वैसे तो समस्त बृज चौरासी कोस की भूमि में ही अद्भुत ऊर्जा है...
पर मुझे जो अनुभव हुआ...वो ये था कि श्री धाम वृन्दावन, बरसाना, गोवर्धन और गोकुल रमणरेती...हाँ अगर आप जा सकें तो काँमा अवश्य जाएँ...वहीं पास में ही आदि बद्रीनाथ हैं...केदार नाथ हैं...गंगा यमुना सरस्वती का संगम है।
इन तीर्थों को स्वयं श्री कृष्ण ने ही बुलवाया था अपने बृज में।
मैं कल रात भर गोवर्धन की परिक्रमा लगाता रहा..21 KM. की परिक्रमा है...पर सच में बहुत ऊर्जा है यहाँ ।
एक महात्मा जी मिले...वो परिक्रमा लगा रहे थे ।
मुझे पता चला कि...वो महात्मा जी नाम जप करते हुए गोवर्धन की परिक्रमा ही लगाते रहते हैं।
न कोई आश्रम बनाया है उन्होंने...न कोई झोपड़ी।
फिर आप रहते कहाँ हैं ?
मेरे इस प्रश्न के उत्तर में...वो हिंदी फ़िल्म का एक मुखड़ा सुना बैठे...नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले...।
ये कहीं भी सो जाते हैं...।
"सबै भूमि गोपाल की"...फिर इतना सा ही जबाब।
बहुत कम बोलते हैं...या कहूँ बोलते ही नही है।
अपने में रहते हैं...अपने आप में ही मस्त रहते हैं।
"मन मस्त हुआ तब को बोले"...ये मैने कहा ।
गुमसुम बाबा...मैंने मन ही मन में इनका नामकरण भी कर दिया।
क्या करें ? मैंने उनसे प्रश्न किया।
जपात् सिद्धि जपात् सिद्धि...जप से ही सबकुछ होगा...।
मैंने सोचा था कि इससे ज्यादा कुछ बोलेंगे...पर इतना ही बोले।
लो ! इतना भी बोल दिए...ये क्या कम था।
हमारे ऊपर कृपा ही तो कर दी थी इन्होंने।
किसका जप करें ?
मुझे सन्तों के आगे अपनी जिज्ञासा रखने में आनंद आता है...।
लो ! अब बोलने में भी इतना आलस ?
अपनी तर्जनी ऊँगली को आकाश की ओर दिखा दिया।
इशारे में ही बोले - ऊपर वाले के नाम का जप करो।
पर नाम जप में मन नही लगता...क्या करूँ?
ये मेरा प्रश्न था।
उनका उत्तर सुनिए -
किसने कहा आपसे मन लगाने के लिए !
अरे ! जो लगता है उसे लगाओ...जीभ तो लगा सकते हो ना?
हाँ...वो तो लगाता हूँ...।
बस...याद रखो ! जीवन में अगर चैन पाना है, तो इस जीभ को बेचैन रखो।
अरे ! वाह ! कितना बढ़िया सूत्र दे दिया।
पर फिर भी मैं अनजान बनकर पूछता ही रहा।
जीभ को मात्र लगाने से क्या होगा ? मन तो लग नही रहा ?
मेरे इस प्रश्न के उत्तर में उन गुमसुम बाबा ने कहा...जीभ हमारे वश में है...मन हमारे वश में नही है इसलिये जो वश में हो पहले उसे तो लगाओ...सीधे ऊँची मंजिल में पहुँचना चाहोगे तो गिरोगे...इसलिये पहले सीढ़ीदर सीढ़ी चढ़ो...जो तुम लगा सकते हो...उसे लगाकर साधना की शुरुआत करो।
बाद में "नाम भगवान" अपने आप मन को भी लगा ही देंगें ।
वाह! इस बार तो मेरे ऊपर ज्यादा ही कृपा कर दी...कितना लम्बा बोल दिए।
अच्छा ! बाबा...एक प्रश्न और...आप ये बताओ कि नाम जप की विधि क्या है ?
भाँग कभी खाये हो ? उन गुमसुम बाबा ने पूछा।
ये बाबा लोग भी विचित्र होते हैं...पूछो उत्तर दिशा किधर है, तो कहेंगे...पश्चिम दिशा उस तरफ है।
मैंने कहा...नहीं प्रभु ! हाँ…शिवरात्रि के समय एक बार गलती से खा ली थी।
भाँग घोटनें वाले होते हैं ना...वो कहते हैं...भाँग को जितना घोटों वो उतना ही नशा देता है।
ये कहकर वो महात्मा जी खुल के हँसे…
फिर कुछ देर में बोले...ऐसे ही नाम को भी जीभ से जितना घोटोगे ना...ये नाम जप भी उतनी ही सिद्धि देगा।
पर ये कैसे सम्भव है ? भोजन करना होगा, पानी पीना होगा, सोना होगा, लोगों से बात करना होगा...मैंने पूछा।
भोजन, पानी, सोना सब करो... लोगों से कम बोलो ।
मैंने कब भोजन, पानी, सोने के लिए मना किया ?
हाँ...ये सब करने के बाद...जीभ को हिलाते रहो...नाम जप के लिए।
फिर कुछ देर के बाद बोले - लोगों से कम बोलो...जीभ को ही बेचैन कर दो...नाम हर समय चलता रहे जीभ से।
नाम जप से क्या सिद्धि मिल जायेगी ?
मेरे प्रश्न के उत्तर में उन्होंने केवल इतना ही कहा...मत चाहो !
सिद्धि मत चाहो...।
सिद्धि चाहने से तुम्हें नाम जप का आनन्द नही आएगा...रस नही आएगा।
सिद्धि तो आगे पीछे घूमेगी...तुम उसे स्वीकार करो...पर सिद्धि के चक्कर में मत पड़ना...अन्यथा नाम जप के लाभ से वंचित रह जाओगे।
नाम जप का लाभ क्या है ?
उन्होंने उत्तर दिया...स्वयं गिरिवरधारी तुम्हारे पास रहेगा...प्रत्यक्ष रहेगा...तुम उसे भगाना भी चाहो, तो भी वो नही जाएगा।
अब परिक्रमा खत्म होने वाली थी...रात्रि के 2 बज रहे थे।
करीब एक घण्टे मौन रहने के बाद...उन गुमसुम बाबा ने अपनी बात बताई...मेरे पास एक लड्डू गोपाल जी हैं...अब मैं तो भिक्षा करके लाता हूँ और जो भी मिलता है उसे बड़े प्रेम से भोग लगाता हूँ और पाता हूँ।
छाँछ बृजवासी लाकर दे ही देते हैं...मैं भिक्षा में रोटी ले आता हूँ।
छाँछ और रोटी...दोनों को भोग लगाता हूँ और पाता हूँ ।
एक दिन…लड्डू गोपाल जी के विग्रह से आवाज आई...
बाबा ! थोडा़ नमक भी डाल दिया करो...छाँछ और रोटी में।
बस इतना ही कहा था लड्डू गोपाल ने…
मैंने तुरन्त उन्हें जबाब दिया...ऐसा है ...भोग पाना है, तो ऐसे ही पाओ...बिना नमक के...नही तो...कल से मैं तुम्हें किसी और मन्दिर में रख आऊंगा...वहाँ छप्पन भोग खाते रहना ।
अरे ! आज मांग रहे हो...नमक दे दो...कल कहोगे...रबड़ी दे दो...परसों कहोगे…पेड़ा खाना है...अरे ! जब मैं इन्हीं में लग जाऊँगा तो तुम्हारा नाम जप कब करूँगा...? मुझे तुम्हारे दर्शन नही चाहियें...न तुम्हारा साक्षात्कार...मुझे तो बस तुम्हारे नाम जप से प्रीत है...और ये प्रीत और बढ़ती रहे।
इतना सुनते ही वो लड्डू गोपाल चुप हो गए...और धीरे से इतना ही बोले...ठीक है...जो इच्छा है वही खिलाओ...पर मुझे किसी मन्दिर में छोड़कर मत आना।
ये सुनाते हुए वो बाबा खूब हँसे...फिर उनकी आँखें गीली हो गयीं थीं।
नाम जप करो...जीभ से ही करो...मन लगे न लगे…उसे छोडो़...जो लगता है...उसे लगाओ...मन को छोड़ दो...वो मन अपने आप ही लग जाएगा।
परिक्रमा पूरी हो गयी...मैंने गिरिराज जी को साष्टांग प्रणाम किया...तब तक में वो गुमगुस बाबा कहाँ चले गए...पता ही नही चला।
मैंने उन्हें खोजा...पर वो फक्कड़ बाबा मेरे खोजने से नही मिलने वाले थे।
शाश्वत
सन्त गयाप्रसाद जी की समाधि
गोवर्धन
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साधकों ! शाश्वत दो दिन के लिए गोवर्धन आगया है।
यहाँ उसे सिद्ध-सिद्ध महात्मा मिलते हैं...भगवान के जिन्होंने प्रत्यक्ष दर्शन किये हैं...ऐसे महात्मा जी शाश्वत को दिखाई देते हैं...और उनका सत्संग भी शाश्वत प्राप्त करता है ।
एक साधू ऐसे मिले शाश्वत को...जिनका पांव हाथी के जैसा था...बस एक पांव...पर वो साधू मस्त थे...शाश्वत लिखता है -
मैंने उनसे पूछा...आप तो नित्य 3 परिक्रमा गोवर्धन की लगाते हैं...और लगाते ही रहते हैं...फिर आपका ये पाँव ऐसे रोग ग्रस्त कैसे हो गया ?
भक्त लोग आते हैं...अपने रोग दे जाते हैं...बड़ी सरलता से उत्तर दिया था।
आप लेते क्यों हैं ?
दया आ जाती है...बेचारे दुःखी हैं...
और मेरा क्या ? मैं तो साधू हूँ...शरीर रहे या न रहे इसका क्या ?
पर किसी का दुःख देखा नही जाता।
इन साधू को शाश्वत हाथी बाबा कहता है।
पर गुमसुम बाबा...जिनकी निष्ठा नाम जप में थी...उनसे शाश्वत ने नाम जप की शिक्षा ली।
नाम जप सचमुच में अद्भुत है...चाहे जैसे भी लो...नाम जप करो...खूब करो यार !
आप गम्भीरता से पढ़िए इस डायरी को...पता नहीं आपके जीवन की कौन-सी ग्रन्थि ये डायरी खोल दे।
डायरी क्रमशः .....
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