google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 शाश्वत की डायरी - भाग 42

शाश्वत की डायरी - भाग 42

 आज  के  विचार


हरि भज रे मना …

( नानक देव )


डायरी क्रमशः से आगे =


मैं गोवर्धन के लिए निकल गया था ।


मुझे एकान्त में रहना था कुछ दिन ।


मैत्रेयी को "गौरांगी"  अच्छे से वृन्दावन घुमा ही देगी ।


ये बात मैंने गौरांगी को ही हँसते हुए कहा था ।


पर ये तुम्हारे लिए आई है...मेरे लिए नही...गौरांगी ने कुछ नॉटी अंदाज में कहा।


गौरांगी से मैंने कहा...दो दिन में आ जाऊंगा...तुम सम्भाल लेना।


भजन किसे कहते हैं...भजन का शाब्दिक अर्थ क्या है ?


मैत्रेयी भीतर कक्ष से आई और  मुझ से पूछने लगी।


मैं कुछ बता नही पाया...सोचने लगा कि भजन का अर्थ क्या ?


"सेवा" …


भजन का अर्थ है...सेवा।


गौरांगी ने बड़ी सहजता से कह दिया था।


मैं गोवर्धन जा रहा हूँ...दो दिन में आऊंगा...मैंने मैत्रेयी को देखते हुये कहा।


कोई बात नही..."गौरांगी दी"  मुझे घुमा देंगी।


मैत्रेयी गौरांगी से प्रभावित होती जा रही थी।


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बड़े विचित्र महात्मा हैं ये गोवर्धन के...


नही नहीं...शरीर तो इनका गोवर्धन का नही है...पंजाबी शरीर है, भाषा की टोन बता रही थी कि ये पंजाबी हैं ।


पर हैं अद्भुत महात्मा।


इनका एक ही काम है...गोवर्धन के परिक्रमा मार्ग में एक झोपड़ी डालकर बैठे हैं और सुबह होते ही चूल्हा जला लेते हैं...सब्जी और रोटी दाल...बनाते हैं... सन्त, भक्त, भिखारी इन सबको बड़े प्रेम से बिठाकर भोजन कराते हैं...

शाम को भी...यानि दोनों समय।


आप के पास पैसा कहाँ से आता है इन सबके लिए ?


मैंने ये प्रश्न कर दिया।


वो बोले- जब "ब्रजराज कुमार" मुझ से ये सब करवाना चाह रहा है...तब तक होता रहेगा...जब उसकी मर्जी नही होगी - नही होगा ।


ये क्या बात हुयी ?  पैसा कहाँ से आता है ? 


मेरे प्रश्न का वो उत्तर देते उससे पहले ही...एक गाडी आकर रुकी...चार बोरी आटा...दो बोरी दाल और साथ में दक्षिणा...यहीं उतारो...सेठ जी ने अपने ड्राइवर को कहा।


नहीं...यहाँ आज के लिए पूर्ण है...कहीं ओर देख लो।


महात्मा जी स्पष्ट कहते थे...कह दिया - नही चाहिए आज।


बाबा !  कल के लिए हो जाएगा...रख लो...भण्डारा तो कल भी करना ही है  आपको।

कल की चिन्ता मैं क्यों करूँ ?  मुझे कोई  संसार से  "वाह वाही" तो चाहिए नही...न कोई प्रचार चाहिए।


कल वो बृजराज कुमार राशन भेजेगा तो कल भी करूँगा...नही तो उसकी मर्जी सोच लूंगा..पर कल के लिए आज मैं संग्रह नही कर सकता।


मैं इन विचित्र महात्मा को देखकर स्तब्ध था।


बहुत जिद्द की...सेठ जी ने...पर महात्मा जी ने "ना" तो "ना"।


सेठ जी चले गए...गाड़ी लेकर।


इधर महात्मा जी दाल बना रहे हैं...भोजन बनाते समय कम ही बोलते हैं और बोलते भी हैं  ये तो  मुँह पर गमछा रख लेते हैं फिर बोलते हैं।


ऐसा क्यों ?  मैंने सोचा।


तो मुझे यही लगा...कि हमारा झूठा उस बर्तन में गिर जाएगा, तो अपराध हो जाएगा...वाह !  क्या भाव थे।


आप भजन नहीं  करते ?   


महात्माओं से ऐसा प्रश्न करना ही नही चाहिए...पर मैं थोड़ा ढीठ हो गया था।


वो हँसे...तुम भजन किसे कहते हो  ? 


उन्होंने तो मुझ से ही प्रतिप्रश्न कर दिया था।


दाल बन गयी थी...महात्मा जी हट गए वहाँ से...दो ब्राह्मण बालक आगये, रोटी धड़ाधड़ बेलनें लगे...सब्जी भी बन गयी थी।


पंगत लगा  दें ?...एक बृजवासी  ने आकर पूछा ।


हाँ ...लगा दो और गर्मागर्म फुलके परोसो।


पंगत की पट्टी बिछाई गयी...परिक्रमा मार्ग में ही। अब लोग बैठे...साधू, परिक्रमा लगाने वाले भक्त और परिक्रमा में बैठे भिखारी...सब के साथ एक ही व्यवहार ।


हाँ...तुमने उत्तर नही दिया...मेरे प्रश्न का…।


मेरी ओर देखकर वो महात्मा जी बोले ।


बड़े अजीब हैं ये,  प्रश्न मैंने किया था...पर अपने प्रश्न का उत्तर मुझ से चाह रहे थे ये।


हाँ बताओ...भजन किसे कहते हो ?  


मैं कुछ नही बोला।


वो स्वयं बोले...संस्कृत में  भज सेवायम्...यानि सेवा ही भजन है।


और सम्पूर्ण रूप से...अपने को खपा देना उस जगदीश्वर की सेवा में...यही तो है भजन...बताओ  ?


बात तो सही कही थी...


फिर ये  माला जपना...ये भजन नही है ? 


मैंने पूछा ।


है...ये भी भजन का एक अंग है...पर सम्पूर्ण भजन तो तभी होगा, जब  सेवा में अपनी हर इन्द्रियों को और मन को लगा दोगे।


इन सन्तों की सेवा और भक्तो की सेवा में ? 


मैंने स्पष्ट समझना चाहा।


नहीं... "बृजराज कुमार" की सेवा में।


ये सन्त नही है...ये स्वयं बृजराज कुमार हैं…ये भक्त या भिखारी नही हैं...ये स्वयं नन्दनन्दन हैं...हमें धन्य करने के लिए आये हैं...।

इस सम्पूर्ण सृष्टि में वही हैं इसलिए इनकी सेवा करना...सम्पूर्णरूप से...यही भजन है।


मैं कुछ और पूछने जा रहा था… कि "राधे श्याम" का जयघोष हो गया...इसका मतलब पंगत चालू हो रही है।


पत्तल दिए गए...फिर जल ...फिर गर्म-गर्म फुलके...बढ़िया  सब्जी…और गाढ़ी पंजाबी दाल...।


तुम भी बैठो...राधे श्याम !   उन महात्मा जी ने मुझ से कहा।


मैंने कहा...नही भगवन् !  मैं आपके साथ बैठूंगा।


पर मैं तो इन सबको पवाकर ही पाता हूँ...


कोई बात नहीं ...मैं तब तक भूख को सह लूंगा।


मेरा भूखा रहना उन्हें अच्छा नही लगा।


नहीं...भूखे रहोगे ये अच्छा नही होगा...


चलो !  मैं भी बैठ जाता हूँ...।


दो पत्तल लगा लिए एक अपने लिए...और एक मेरे लिए ।


आचमन किया...मैं तभी समझ गया था कि ये बोलेंगे नही...ये भोजन के समय बोलते नही हैं  ।


पत्तल में सारी सामग्रियाँ आगयीं थीं...हम सब ने भोजन प्रसाद पाना शुरू कर दिया ।


ओह !   ये क्या ? 


एक कुत्ते का पिल्ला  उछल कर...बीच पंगत में आगया था।


मुझे तो ये पालतू लगा...क्यों कि निडरता के साथ बीच में खड़ा हो गया था।


सन्त लोग  उसे डराने की कोशिश कर रहे थे...हट्ट हट्ट...।


और डर ये था कि...  कहीं मार मूर के भगाया जाए पिल्ले को...तो सन्तों की पत्तल को छूते हुए...या उसी में गिरते हुए चल देगा।


फिर तो भण्डारा ही खराब हो जाएगा।


हट्ट हट्ट...सब लोग कर रहे थे।


पर वो खाने के लिए ही आया था...और बिना खाये जाए कैसे?


मेरे बगल में महात्मा जी बैठे थे, वो इशारे में कुछ कह रहे थे...पर वहाँ कोई समझ नही रहा था...। 


भोजन के समय ये बोलते नही है।


जब सब लोग कुत्ते के पिल्ले को लेकर असहज हो गए...तब उन महात्मा जी को आचमन करना ही पड़ा और आचमन करके  बोले...एक पत्तल और लगा दो...इसके लिए भी ।


उस कुत्ते के पिल्ले के लिए एक पत्तल और लगाई गयी ।


महात्मा जी अब कुछ पा नही रहे थे ।


मैंने भी कहा और अन्य सन्तों ने भी कहा...आप  पाइये !


पर महात्मा जी ने नही पाया...उनका नियम था बोलने के बाद वो पाते नही थे ।


अरे ! भगवान का प्रसाद ऐसे नही छोड़ना चाहिए।


एक भक्त ने ऐसा भी बोल दिया।


तो उन महात्मा जी ने जबाब दिया...अन्य जीव भी तो हैं इस सृष्टि में...चींटी से लेकर बन्दर और बिल्ली...क्या इनको कुछ नही मिलना चाहिए...प्रसाद के हकदार ये भी तो हैं। उन्होंने खाया नही...पर उठे भी नही पंगत से...जब तक वो पंगत नही उठी।

जब सबने प्रसाद ले लिया...तब जाकर वो उठे और अपना पत्तल उठाकर लेगये दूर...वहाँ कई कुत्ते और बन्दर थे...जो इन्तजार में ही थे...उनको बड़े प्रेम से  खिलाया...उन्होंने ।


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मुझे माफ़ कर दीजियेगा ...मेरे कारण आपको भूखा उठना पड़ा।


मैंने हाथ जोड़कर उनसे माफ़ी मांगी।


नहीं...ऐसा नही है...बल्कि आज मेरा पूरा "भजन"  हुआ ।


मेरे "बृजराज कुमार" ने मुझसे आज खूब भजन करवाया।


उनकी आँखें  नम थीं...अकेले में आँसू गिराते होंगे...मेरे सामने तो उन्होंने गिरते हुए अश्रु मोती को वहीं रोक दिया था ।


देखो !   आज कितना भजन हुआ...


सन्तों ने प्रसाद पाया...भक्तों ने प्रसाद पाया...फिर जो भिक्षुक हैं और तो और...स्वयं "नन्दनन्दन"  पिल्ला बनकर आगये और जबरदस्ती मुझ से अपनी सेवा ले ली ।


क्या ये भजन नही है ?     


उनकी आँखें  गीली हो रही थीं...वो बार-बार अपनी सूती चादर से आँसू पोंछ रहे थे।


मुझे लगा...इनको भाव में  अकेले छोड़ना ही अब उचित होगा ।


ये अपने बृजराज कुमार को याद करके थोड़ा रोयेंगे...मुझे अब इन्हें ज्यादा डिस्टर्ब करना ठीक नही लगा।


मैंने उनके चरणों में प्रणाम किया...साष्टांग   ।


बात कितनी सही कही...सेवा ही भजन है।


गौरांगी ने भी तो यही कहा था...जब मैत्रेयी ने पूछा था तब ।


शाश्वत 


पण्डित गया प्रसाद समाधि 


गोवर्धन 


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साधकों !     शाश्वत की डायरी में लिखा है...


भजन का अर्थ  माला झोली को घुमाना मात्र नही है।


भजन का अर्थ है...सेवा।


वृन्दावन से जब चलने लगा था  शाश्वत  गोवर्धन के लिए...तब गौरांगी के मुख से उसने सुना...कि भजन का अर्थ है - सेवा ।


हाँ...एक बात बड़ी अद्भुत लिखता है शाश्वत...


साधक  बनने से पहले..."सेवक" बनो।


साधक में सेवाभाव की कमी दिखाई देती है...पर  सेवक बनना !


फिर हनुमान जी को याद करता है  शाश्वत..."मैं सेवक सचराचर"


मैं सेवक हूँ…और किसका सेवक हूँ ? 


"सचराचर रूप स्वामी भगवन्त"  सम्पूर्ण चराचर में जो भगवान हैं...उनका मैं सेवक हूँ ।


उनकी सेवा करनी है मुझे...उनमें ही मेरा नटवर नाच रहा है।


मेरा नटवर ही है सर्वत्र...सर्वदा।


उन महात्मा जी से बड़ा प्रभावित हो जाता है शाश्वत...दो दिन वहीं रुकता है...शाश्वत ने लिखा है–


कहना अलग बात है...पर उसे जीना अलग बात है...हम लोग मात्र कहते हैं  कि सभी जगह भगवान है...पर अनुभव नही है ।


शाश्वत डायरी में लिखता है...उन महात्मा जी के बारे में...वो बड़े विचित्र महात्मा थे...सब में वो नन्दनन्दन को ही देखते थे।


चींटी से लेकर...कुत्ता...गाय...बन्दर...मोर...पक्षी...किसकी सेवा वो नही करते थे !       


सुबह उठते ही बस...सेवा...और उनकी दृष्टि में भजन का अर्थ था...सेवा।


कितनी अच्छी बात लिखी है  शाश्वत ने...है ना ? 


चलिये ऐसे ही पढ़िए  शाश्वत की डायरी...


डायरी क्रमशः ......

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