google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 शाश्वत की डायरी - भाग 41

शाश्वत की डायरी - भाग 41

 आज  के  विचार


सखियन के उर ऐसी आई, व्याह उछंग रच्यो सुखदाई ।

( हित वाणी )


डायरी क्रमशः से आगे =


ज्यादा ही आग्रह किया था गौरांगी ने उसकी कुटिया में आने के लिए ।


राम की दुकान में भी "हरि जी" से कहलवाया था मुझे...कि कल विवाह उत्सव रखा है...और मुझे आना है।


मैं गया...बहुत सन्त आये थे, महात्मा जी भी आये...पर बस 5 मिनट के लिए ही आये थे।


बाकी श्रीराधा बल्लभ जी का व्याहुला बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा था...।


आपसे मिलने के लिए कोई आई हैं...आपका ही नाम है ना शाश्वत ?


व्याहुला चल रहा था...बड़े सुन्दर सुन्दर पद गाये जा रहे थे।


मुझ से मिलने कौन आई होगी? 


मैं उठा...और जैसे ही बाहर जाने लगा...गौरांगी ने मुझे रोका...अभी कहाँ जा रहे हो?  प्रसाद पाकर जाना है।


मैंने कहा...मैं जा नही रहा...कोई मिलने आया है...बस उससे मिल लूँ फिर।


नही शाश्वत ! तुम बैठो...जाओगे तो आओगे नही।


मैं देखती हूँ...मुझे वहीं बैठाकर गौरांगी बाहर गयी।


कुछ ही समय में वापस आगयी और उसके साथ थी।


मैत्रेयी !...सन्यासी भेष...काला चश्मा लगाई हुयी।


ओह !  मैत्रेयी !   तुम ?        


मैं उसे देखते ही चौंक गया था।


आनन्द ले रहे हो शाश्वत !   वाह !   हरिद्वार में तो बड़ी बड़ी बातें करते थे...और यहाँ रागरंग में डूबे हुए हो।


गौरांगी सब सुन रही थी...जब मैत्रेयी मुझ से बातें कर रही थी।


मैं हँसा 


...बैठो !   पर यहाँ कैसे आयी ? 

मैंने पूछा  ।


शाश्वत !  ये कौन है ?    


  मैत्रेयी ने गौरांगी की ओर इशारा करते हुए पूछा। 


मैं इसकी बहन हूँ...बड़ी बहन...इसने तुम्हें बताया नही ? 


गौरांगी ने मैत्रेयी को कहा।


...और मुझ से भी बोली - शाश्वत ! तुमने नही बताया इसको...कि मेरी एक बड़ी बहन वृन्दावन में रहती है!


मैं गौरांगी के इस प्रेम भाव पर मुग्ध हो गया था आज !   कितनी आत्मीयता से इसने मुझे भाई कहा था...और उम्र में मुझ से छोटी होने के बाद भी...अपने आपको मुझ से बड़ा बताया...मेरे प्रति स्नेह करने के लिए...।


हाँ…ये मेरी बड़ी बहन है।   मैंने कहा ।


अब सम्बन्ध भी जोड़ने लगे ?  पहले तो तुम इन सबके खिलाफ थे...बड़ी बड़ी बातें करते थे कि संसार के सम्बन्ध को क्या मानना...ये सब तो झूठा रिश्ता है...मैत्रेयी बोली।


संसार का सम्बन्ध तो मिथ्या ही है...झूठा ही है।


पर ये हमारा सम्बन्ध आध्यात्मिक है।


गौरांगी ने इस बात को ज्यादा बढ़ाना उचित नही समझा...क्यों कि मैत्रेयी के आँखों में ईर्ष्या साफ़ दीख रही थी।


तुम बैठो ना !    गौरांगी ने कहा।


...और हाथ पकड़ कर नीचे ही बिठाने लगी थी गौरांगी।


मैं सन्यासन हूँ...मैत्रेयी ने कहा,  अहंकार फन फैला रहा था।


गौरांगी भी बोल पड़ी...मैं भी सन्यासन हूँ।


हाँ… वैष्णव सन्यासिन हूँ...तुम शैव सन्यासन हो...बस इतना ही अंतर है।


तुम काहे की सन्यासन हो...गैरिक वस्त्र कहाँ है तुम्हारे ?   


पीले वस्त्र तो संसारी  पहनते हैं...।  मैत्रेयी बोले जा रही थी।


गौरांगी ने उत्तर दिया...वाह !  पजेरो में  घूम रही हो...सिल्क की साड़ी पहनी हुयी हो...हजारों का मोबाइल हाथ में लेकर चल रही हो...सोने में रुद्राक्ष  लगा रखा है...लाखों रूपये की प्लेटिनम का ओंकार गले में लटका रखा है और मुझे कह रही हो कि तुम सन्यासी हो।


गौरांगी हँसी...किसे पागल बना रही हो बहन ! 


जब इतना ही सब शौक था...तो शादी करने में क्या बुराई थी ।


क्यों बिना वैराग्य के सन्यासन बन गयीं तुम ?


गौरांगी धाराप्रवाह बोले जा रही थी।


मात्र गैरिक वस्त्र से क्या होता है बहन? 


अंदर जब तक वैराग्य की आग न धधके...तब तक तुम कुछ भी कर लो...तुम सन्यासन तो ही नही सकती।


देखो !  बाहर के लोग भले ही तुम्हें मानते हों...बाहर के ये चकाचौंध पसन्द वाले लोग भले ही तुम्हें माने...पर सच्चा सन्यासी...सच्चा साधू तुम्हें देखते ही पहचान जाएगा कि...तुमने जो सन्यास लिया है...वो मात्र एक दिखावा है  ।


क्या सन्यासी मोबाइल नही रख सकता ? 


क्या सन्यासी सिल्क के वस्त्र नही पहन सकता ?


क्या सन्यासी सुवर्ण और प्लेटिनम नही लगा सकता ? 


ये प्रश्न मैत्रेयी के थे...बेचारी !  कितने कमजोर प्रश्न थे इसके...


 सुनिए अब गौरांगी का उत्तर -


आप स्वयं बताइये...क्या मोबाइल रखना सन्यासी को उचित है ?


मैं मात्र मोबाइल की बात नहीं कर रही...एक  70 हजार का मोबाइल सन्यासी रखेगा...।


सन्यासी को, जहाँ शास्त्र कहते हैं...कि धन को छूना भी सन्यासी को निषेध है।


अरे !  आप किस जमाने की बात कर रही हैं !


मैत्रेयी ने गौरांगी की बात को बीच में ही काट दिया।


नहीं...मैं जमाने की बात नही कर रही...मैं तो सन्यास धर्म के नियम की बात कर रही हूँ।


आज कल कोई नियम नही है...हरिद्वार में आओ...देखो !   सब कुछ चल रहा है...आप किस दुनिया में हो।


मैत्रेयी की बात सुनकर गौरांगी बोली...मुझे पता नही था...मैं तो यही सोचकर चलती हूँ कि...हमें ईमानदार बनना है...जब अध्यात्म के नाम पर जगत को हमने त्यागा...पिता, माता, भाई, सखा और सबसे बड़ी बात  शादी तक नहीं की...स्त्री के लिए माँ बनना सबसे बड़ा सौभाग्य होता है...उसको भी ठुकराया।


इतना त्याग करके इस मार्ग में आये हैं...और हम दोनों ही शिक्षित हैं...आधुनिक शिक्षा में हम लोग पारंगत हैं...फिर क्यों हम ईमानदार न बनें?    


हम इस तरह किसे धोखा दे रहे हैं ?  क्या अपने आपको? 


हाँ...अपने आपको हम धोखा दे रहे हैं।


जब बन गए सन्यासी...तो फिर त्याग क्यों नही ? 


त्याग से ही भगवान मिलता है क्या ?   


मैत्रयी ने फिर ये बेतुका सवाल कर डाला।


गौरांगी मेरी ओर देखकर हँसी...मानो कह रही हो ...शाश्वत  !  कैसे  कैसे मित्र बनाते हो यार !


भगवान तो गृहस्थों को भी बड़ी आसानी से मिल जाता है...मिला है...कोई कॉपी राइट नही है...सन्यासियों का भगवान के ऊपर ।


मैत्रेयी !   फिर क्यों बनी तुम सन्यासी ? 


त्यागमय जीवन सन्यासियों का आदर्श है।


त्याग सन्यास में आवश्यक है...नहीं तो सन्यास का कोई अर्थ नही रह जाता।


तप का जीवन...व्रत का जीवन...अपने आपको आहूत करने का जीवन...ये है सन्यास धर्म।


मैत्रेयी !   नहीं मिलता सन्यासियों को भगवान...भगवान तो गृहस्थों को भी मिल जाता है...नहीं मिलता  धर्म में चलने वालो को भगवान... पाप कर्म में फंसे हुए जीवों का भी कल्याण हो जाता है...


याद रखो !  मैत्रेयी !   भगवान प्रेम से मिलते हैं...इन कपड़े को रंगानें से नही मिलते...याद रखो।


पर अन्तःकरण को शुद्ध करने के लिए...। तप व्रत तो करने ही पड़ेंगे न !


और जब हमने इस भेष को स्वीकार कर ही लिया...तब तो हमें इसकी मर्यादा का पालन करना ही चाहिए ना !   


और नहीं कर सकते...तो फिर इस भेष को ही छोड़ देना चाहिए।


बहुत समझदार है गौरांगी...तुरन्त वह समझ गयी कि मेरा ज्यादा बोलना इसे अच्छा नही लग रहा...और घर आये हुए अतिथि के साथ इतना ज्यादा बहस भी ठीक नही है।


आप लोग बैठो,  मैं अभी आई...इतना कहकर  गौरांगी चली गयी।


व्याहुला हुआ...यानि विवाह महोत्सव...यानि श्री राधा कृष्ण का  मंगल विवाह हुआ।


और अंतिम में...सबके हाथों में फूल दिए गए थे...


उन फूलों को आशीष के तौर पर युगल वर के ऊपर छोड़ना है।


गौरांगी ने मैत्रेयी को आगे किया...और उसके हाथों में भी फूल दिए।


पद का गायन चल  रहा था...


"राधे जू थारो अविचल रहो जी सुहाग"


मैं आनन्दित था...क्या दिव्य महिमावन्त उपासना पद्धति है।


आशीष दे रही हैं सब सखियाँ मिलकर...


जयजयकार हुआ...सबने हाथों को ऊपर उठाकर...


जय जय श्री राधे...श्याम...कहा।


***************************************


मैं कुछ दिन वृन्दावन में ही रहूँगी...


मैत्रेयी ने मुझ से कहा था।


कहाँ रहोगी ?   मैं तो अकेले रहता हूँ...वहाँ कोई रह नही सकता।


यहाँ रहेगी मैत्रेयी !


 ...गौरांगी ने हमारी बातें सुन ली थी।


शाश्वत ! यहीं रहेगी...जब तक ये रहना चाहे।


पर गौरांगी !    ये यहाँ कैसे रह सकती है।


क्यों ?   क्यों नहीं  रह सकती मैं यहाँ...मैत्रेयी ने मुझ से कहा।


यहाँ लाइट नहीं है...A C नही है...।


क्या ?    यहाँ AC नही चल रहा ?     चौंक गयी थी मैत्रेयी ।


नहीं...यहां लाइट तो है नही...A C कहाँ से होगा ? 


पर यहाँ ठंडक है...


 मिट्टी की चिनाई है...नौ-नौ इंच की दीवार में...बीच में गेप छोड़कर बनाया है और बाहर से गोबर से लीप दिया है।


  नीचे बेसमेंट है...उसमें तो और ठंडक है।


खस की चटाई लगा रखी है खिड़कियों में...इससे भी ठंडक बनी रहती है...मैं मैत्रेयी को ये सब बता रहा था।


ये RO का पानी नही पीती...इसका कहना है...RO के पानी में से सारे मिनरल्स खतम हो जाते हैं, वो पानी बेकार है...उसमें कुछ नही है।


ये बोरिंग का पानी पीती है...जमुना के किनारे में बोरिंग है...वहीं से इसके लिए पानी आ जाता है।


पर धरती का पानी गन्दा हो गया है ना ?  


मैं हँसा था इस आधुनिक सन्यासन की बातें  सुनकर...।


किसने कहा तुमसे ?  कि धरती का पानी गन्दा हो गया ? 


ये  बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हैं...अपना प्रोडक्ट बेचने के लिए ये सब हल्ला करते हैं...कुछ  बुद्धि तुम भी लगाओ...100 फुट नीचे का पानी गन्दा कैसे हो जाएगा ?    


गौरांगी  फिर आई...वो सब सन्तों को प्रसाद पवा रही है...


बोली...कहीं जाने की जरूरत नही है...यहीं रहो ! 


...और फिर चली गयी  उधर भोजन पवाने के लिए।


कुछ केमिकल्स प्रयोग में नहीं लाती है  ये ...गौरांगी !


न साबुन, न शैम्पू...मैं बता रहा था मैत्रेयी को ।


फिर ये नहाती कैसे है ?  


दही और  बेसन...और शरीर में भी दही और बेसन ही लगाती है...चेहरे में शहद और दही लगाती है।


मैत्रेयी गौरांगी को ही देखे जा रही थी।


उसने बड़े प्रेम से सन्तों को भोजन कराया...पर उस समय नाक-भौं सिकोड़ा मैत्रेयी ने...जब  गौरांगी नें उन सब सन्तों के पत्तलों में से...झूठन निकाल कर खुद ने खाया और मुझे भी दिया...मैत्रेयी को नही दिया।


ये क्या है ? 


मैत्रेयी बोली थी।


  सन्तों को ये गौरांगी भगवान का रूप मानती है...और उसी भाव से इन्हें भोजन कराती है...फिर  श्रद्धा इतनी है कि...इनका जूठन भी खा लेती है।


वो देखो !    उस महात्मा को तो कुष्ट हो गया है...उसका भी जूठा !


 नाक-भौं सिकोड़ कर  मैत्रेयी बोली।


जब श्रद्धा है तो सबके ऊपर है...सन्त तो सब हैं...


कुष्ट हो गया तो क्या वो सन्त नही है ? 


श्रद्धा बहुत बड़ी वस्तु है मैत्रेयी  !     


सबको दक्षिणा दिया बड़े प्रेम से गौरांगी ने ।


सबको विदा किया।


अब हम तीनों बैठकर गौरांगी की कुटिया में प्रसाद पा रहे थे।


बहुत अच्छा खाना बना है?     मैत्रेयी ने कहा।


खाना नही प्रसाद !     ये मेरे दूल्हा दुल्हन का प्रसाद है।


गौरांगी ने बताया मैत्रयी को।


कहाँ हैं दूल्हा दुल्हन ?   मैत्रयी ने इधर-उधर देखते हुए पूछा।


वो रहे...सो गए हैं अब !  गौरांगी ने अपने ठाकुर जी की ओर दिखाया।


ओह ! भगवान ?   


नहीं… भगवान नहीं...दूल्हा दुल्हन !   मेरे प्राणाधार !


ये कहते हुए एक  "फ़्लाइंग किस"  दिया था गौरांगी ने...अपने ठाकुर जी को।


मैत्रेयी को कुछ अजीब लग रहा था...


मैंने उससे पूछा भी...यही रहोगी या होटल में ? 


बोली गौरांगी के साथ ही रहूँगी...।


चलो ! अच्छा ही हुआ...गौरांगी के संग से शायद ये कुछ समझ जाए...सुलझ जाए।


शाश्वत 


मदन मोहन घेरा 


वृन्दावन 


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साधकों !   "शाश्वत की डायरी" में लिखा है..."लो  !  अब मैत्रेयी भी आ गयी...पर ये कुछ दिनों में ही चली जायेगी।


श्री धाम में रहने के लिए...उस बाँके बिहारी की कृपा भी तो चाहिए ना !


गौरांगी की कुटिया का वर्णन बहुत सुन्दर किया है शाश्वत ने।


आज गर्मी बढ़ रही है...और इसका कारण आज कल AC का प्रयोग जितना बढ़ रहा है...वो भी है।


कितना अच्छा हो...कि गौरांगी की तरह हम भी कुटिया बनाएं तो ये स्वास्थ के लिए भी ये अच्छा रहेगा...।


सन्यास धर्म की आज जो दुर्गति हो रही है...वो किसी से छुपी नही है।


इस पर भी प्रहार करती है गौरांगी...और उस बात को लिखता है शाश्वत -


मोबाइल का प्रचलन बढ़ा है...और सन्यासी लोग भी इससे अछूते नही है...आधुनिकता बढ़ रही है...सन्यास धर्म भी इससे अछूता नही रह पाया...।


सुवर्ण से दूर रहना...ये सन्यास धर्म में कहा है।


पर आज कल गले में देखो तो संसारी की अपेक्षा सन्यासीओं के गले में और हाथों में ही सुवर्ण हीरे ज्यादा  मिलते हैं।


खैर !  शाश्वत बाद में मैत्रेयी को ये कहते हुए समझाता है कि..."आज कल ऐसा हो रहा है"..."आज कल ऐसा कर रहे हैं"...


ये सब कहना छोड़ दो...जिस मार्ग में हम हैं...ईमानदारी से उस मार्ग में चलो...बेईमानी नही...ईश्वर तो देख रहा है ना मैत्रेयी !  


चलिये !   शाश्वत की डायरी इसी मनोयोग से पढ़ते रहिये।


डायरी क्रमशः .....

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