google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 शाश्वत की डायरी - भाग 40

शाश्वत की डायरी - भाग 40

 आज  के  विचार



दोउ मिली करत भांवती  बतियाँ ..

( युगलशतक )


डायरी क्रमशः से आगे  =


प्रियाप्रियतम, दोनों प्रेम स्वरूप हैं...


प्रेम का साधक युगल उपासना ही करता है...


क्यों कि "युगल" के बिना प्रेम सम्भव नही है...


क्यों कि "युगल" के बिना रास सम्भव नही है...


क्यों कि… "युगल" के बिना रस का उच्छलित होना सम्भव नही है...।

इसलिये तो ब्रह्म को भी रस चखने की इच्छा हुयी...तो वह भी दो हुआ ।


"एकम् ज्योतिर्भवेद् द्वेधा राधा माधव रूपकम्"


मूल में ज्योति एक ही है...ब्रह्म...पर यही ज्योति  रसानुभूति के लिए दो रूपों  में परिणत होती है...एक राधा और दूसरा माधव ।


सारा जगत इन्हीं का तो विलास है...उल्लास है  ।


इनके स्पर्श से ही तो रस प्रवाहित हो रहा है।


और इस प्रेम साधना की  एक अद्भुत बात- प्रेम रँग में रंगे हुए प्रेमी को चारों ओर अपना प्रियतम ही दिखाई देता है...


सारा जगत ही प्रियतममय बन जाता है।

क्यों कि उसका चित्त रँग गया है ना प्रेम के रँग में...।

पर ये जितनी सरलता से मैं लिख रहा हूँ...आप लोग पढ़ रहे हैं...इतना सरल कहाँ है ये प्रेम साधना ।


इसमें तो तप चाहिये...तपना पड़ता है।


कुन्दन को जितना तपाओ...वो उतना निखरता जाता है ।


कुन्दन को जितना अग्नि में जलाओ...उतनी ही उसकी कीमत, सुन्दरता और निर्मलता बढ़ जाती है...।


ऐसे ही प्रेम को जितना तपाओगे, वो  सुन्दर से सुन्दरतम बनकर निखरता जाएगा...।


तपाने का मतलब...कोई कुछ भी कहे...हमें  उसे सहना है।


कहेंगे...जैसे-जैसे तुम्हारा प्रेम जाहिर होने लगेगा...कहेंगे! 


पर तुम्हें तो अपने मार्ग को छोड़ना नही है...समझे?

अब सुनो ! जैसे  भक्त, भगवान को याद करके   आनन्दित होता है...ऐसे ही इस अष्टयाम की लीलाओं में...कृष्ण अपनी राधा रानी को याद करके आनन्दित होते हैं।


जैसे भक्त भगवान के लिए तड़फता है...ऐसे ही इस मधुर रस में कृष्ण राधा से मिलने के लिए तड़फते हैं ।


क्या सुन्दरतम बात है !...अन्य उपासना के मार्ग हमें बताते हैं कि भगवान के लिए हम भक्त तड़फते हैं ।


पर प्रेम साधना का मार्ग  अनूठा है...जो कहता है...तुम क्या तड़फते हो...तुमसे ज्यादा तो वो तड़फता है...मिलने के लिए।


तुम सेवा करते हो ना अपने भगवान की ?   


ऐसे ही निकुञ्ज में कृष्ण अपनी राधा की सेवा करते हैं ।


हाँ..पाँव दबाते हैं...बेणी गूँथ देते हैं। मान कर बैठती हैं...वो राधा...तो उसे मनाने के लिए अश्रु प्रवाह चला देते हैं...।


करो ना भावना !...ऐसी प्रेममयी भावना !  


अष्टयाम का आज अंतिम दिन है...।


सखियों ने रात्रि का भोजन करा दिया है...


और सुन्दर से सुन्दर सेज सजाकर, इन दोनों युगल वर को सुला दिया है ।


अब आगे।


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अष्टयाम मानसिक ध्यान -


इस ध्यान का समय  रात्रि 9 बजे से है।

मैंने ही  सेज बिछाई है...सुन्दर-सुन्दर कोमल दलों की सेज...उसके ऊपर  गुलाब की पंखुड़ियाँ।


सुन्दर कुञ्ज है...शयन कुञ्ज।


हल्का गुनगुना दूध...जिसे स्वयं गर्म करके...अच्छे से औंटा कर...बादाम, किशमिश,  छुआरा और थोडा़ केशर डालकर युगल सरकार के सामने रख दिया।


कितनी बार मना किया...सखी ! रहने दे नही पीना दूध।


दोनों ने ही...श्री राधा जू तो कह रही थीं...मैंने सुबह पीया था...पर ये क्या बात हुयी...हे राधे जू ! मैंने बड़े प्रेम से आपके लिए बनवाया है...आप नही पीयेंगी ना...तो मुझे कष्ट होगा…...।


मेरे मुँह से इतना सुनते ही...श्री राधा जू ने तुरन्त उस दूध को पी लिया।

अब आप भी पी लो...मैंने श्याम सुन्दर से भी प्रार्थना की।

हे प्यारी !  आप थोडा़ सा छोड़ देना…मेरे लिए आपके अधरों की प्रसादी...कृष्ण ने कहा ।


नहीं...आपको ये पूरा पीना है...मैंने  कहा और उनके दूध का पात्र उनके सामने ही रख दिया।


कितने नाटकबाज हो तुम  कृष्ण !    मुझे हँसी आई...


जैसे तैसे  दूध पिलाकर दोनों को चादर ओढ़ा कर...मैं बाहर चली आई...मैंने बाहर से देखा तो  कुञ्ज रंध्रों से...सखियाँ झाँक-झाँक कर देख रही थीं...मैं भी वहीं खड़ी हो गयी।


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दोनों  युगलवर एक दूसरे के बाहों में सोये हुए हैं...


अपने श्याम रँग के हाथ को श्री राधा जी का तकिया बना दिया कृष्ण ने...सखी ! देख...कितना सुन्दर लग रहा है।

जैसे श्याम घन में चन्द्रमा विराजमान हो…

बादलों की तरह लग रहे हैं...कृष्ण के हाथ और उस हाथ में है श्री राधा रानी का मुख...वो  चन्द्रमा है।

पर ये क्या !  एकाएक पुकार उठीं श्री राधा !


मुझे कृष्ण से मिलाओ...सखी ! मुझे कृष्ण से मिलाओ !


मेरे कृष्ण मुझे छोड़कर कहीं चले गए...बताओ ना ! कहाँ गए ?


ये क्या हो गया श्री राधा को…संयोग में वियोग की  अवस्था ?


नयन मुंदी हुयी हैं श्री  राधा...और रोये जा रही हैं...


मुझे कृष्ण से मिलाओ...मुझे मेरे श्याम सुन्दर से रमाओ ! 


कृष्ण ने अपने सिर में मोर पंख धारण किया हुआ है ना ! 


आहा ! कितना सुन्दर लगता है...मुझे भी पहनना है मोर पंख! 

मुझे भी धारण करनी है पीताम्बरी...पीताम्बरी वो  मेरे लिए ही पहनते हैं...क्यों कि सखी !  वो कहते हैं...सुवर्ण की तरह पीला...तपाये हुए सुवर्ण के समान...रँग है मेरा।


इसलिये मुझे ही वो अपने देह में लपेट लेते हैं।


ये कहते हुए...श्री राधा नींद में ही मुस्कुरा जाती हैं।


मैं भी नीलवर्ण को अपने देह से लपेटी रहती हूँ...


नील निचोल बनकर वही श्याम सुन्दर मुझ से लिपटे रहते हैं।


आहा ! उनका वह पीला पीताम्बर !...


राधा रानी नींद में ही बोल रही हैं...राधा का  सब कुछ कृष्णमय ही है ।


उस पीताम्बर के पीछे कौन पागल नही है  सखी ! 

देवता से लेकर दानव तक...सब पागल हैं। शत्रु से लेकर मित्र तक सब पगलाये रहते हैं पीताम्बरी से ही।


फिर हँसती हैं नींद में श्री राधा...मुझे ही पहनते हैं पीताम्बरी के रूप में  कृष्ण...।


पर  सखी !  मैं पीताम्बरी बनकर सन्तुष्ट नही हूँ...मुझे तो  उन्हीं में समाना है...उन्हीं में रमाना है।


मैं उनमें ही लीन होना चाहती हूँ...उनकी साँसों में मेरी साँसे मिल जाएँ...उनकी धड़कन मेरी धड़कन हो जाए।


मैं उनके मुँह से बोलूँ...वो मेरे मुँह से बोलें।


हे प्यारे !           


श्री राधा  चिल्ला उठीं   ।


एकाएक उठे  कृष्ण...प्यारी !  क्या हुआ…? हृदय से लग गयी हैं  श्री राधा...पर पुकारे जा रही हैं।

कृष्ण ने अपनी बाहों में भर लिया है अपनी राधा को।


इस दृश्य को बाहर से सखियाँ देख रही हैं और मुग्ध हैं।


अधरों को चूमते हुए कृष्ण ने कहा...प्यारी ! मैं यहीं हूँ।


पर ये क्या कितने ढीठ हो गए है श्याम सुन्दर...


नवनव पल्लवों की वो सेज...गुलाब की पंखुड़ियाँ मसली जा रही थीं...मुझे कस लिया था...अपनी बाहों में।


मेरी आँखें अब बन्द हो रही थीं...मेरे मुँह से कोयल की ध्वनि निकलने लगी थी।


 मेरे केश पाश ढीले हो गए थे...उनमें जो फूल स्वयं श्याम सुन्दर ने लगाये थे वे झरनें लगे थे...।


पता नही अपने नख से मेरे वक्ष पर श्याम सुन्दर ने क्या-क्या लिख दिया था...मैं तो स्वयं को भी भुला बैठी थी।

हाँ...अब तो मैं भी भूलने लगी थी...कि मैं राधा हूँ..या कृष्ण।


कभी  हे राधे ! कहने लगती...कभी हे कृष्ण !  ऐसा कहने लगती।


इस रस में पता ही नही चल रहा था कि कौन क्या है ?


मैं निढाल हो गयी थी...वो अब भी मेरे अधरों से अधर मिलाये हुए थे...उनकी साँसे मेरी साँसों में एक हो गयीं थीं।


सखी !   देखो !...


इस लीला को जो गायेगा...इस  दिव्य प्रेम का जो गान करेगा...


"विश्व् दुरित दवनी"

विश्व् के पाप नष्ट हो जायेंगे...इस प्रेम अष्टयाम में इतनी ताकत है कि ये  विश्व् के पापों को दूर कर सकती है।

मैं शाश्वत !  आज कहता हूँ...इस विश्व् को बचा लो...पापों से बचा लो...पश्चिमी नैतिकता के पाप से बचा लो।


और  इस दिव्य प्रेम का विस्तार करो...।


यही कलियुग के पापों का और उन पापों से मिलनें वाले तापों का शमन कर देगी।


आह !  सो गए हैं अब दोनों युगल वर...एक दूसरे से मिले हुए।


ये एकप्राण दो देह की छवि आपके हृदय के काम वासना को जला दे।


शाश्वत 


मदन मोहन घेरा 


वृन्दावन ***********************************************

साधकों !  "अष्टयाम ध्यान"  यहाँ पूर्ण होता है।


डायरी में शाश्वत लिखता है...इस प्रेम के लिए...इस अष्टयाम के लिए...देहातीत होना आवश्यक है।


एक मेरे साधक हैं...वो जब भी देखो मुझे कहते रहते हैं...आप  कुञ्ज की बातें बताइये...आप गौरांगी के बारे में बताइये...आप प्रेम पर लिखिए...।


एक बार मैंने उनसे पूछा- क्या बात है...आप मुझे सच-सच बताओ...ये कुञ्ज की बातें ही आप ज्यादा क्यों सुनना चाहते हैं ?  गौरांगी को ही सुनने में और पढ़ने में आपकी ज्यादा रूचि क्यों ? 


मेरी बात सुनकर वो सकपका गए...

मैंने उनसे कहा...आप घर जाइए और विचार कीजिये मेरे प्रश्नों पर...कहीं आपके मन में कुछ गड़बड़ तो नही चल रहा।

वो ईमानदार थे...वो बिना कुछ बोले घर चले गए और दूसरे दिन मुझ से उन्होंने कहा...आपकी बात सही है...मेरे मन में ही गड़बड़ है।


इसलिये इस प्रेम साधना को साधारण मत समझो... थोड़ी भी गलत भावना आजाये तो आपका पतन भी हो सकता है।


इसलिये इस साधना में बहुत सावधान रहने की जरूरत है।


शाश्वत अपनी डायरी में एक प्रसंग का उल्लेख करना भी नही भूलता…


वो लिखता है...बरसाने में एक महात्मा जी रहते थे...उनको राधा रानी दर्शन देती थीं।


बड़े सिद्ध थे वो महात्मा जी। उनका एक शिष्य था नया नया था..उसने सुना कि मेरे गुरु जी को राधा रानी दर्शन देती हैं, तो वह पीछे ही पड़ गया...।

गुरु जी ! मुझे भी दर्शन कराओ...


गुरु जी ने लाख समझाया...पर वह नहीं माना।


गुरु जी ने कहा...बेटे ! अधिकारी नही हो अभी तुम ? 


उस रस सौंदर्य को तुम्हारा ये गन्दा हृदय सम्भाल नही पायेगा...पहले हृदय को शुद्ध करो...पवित्र करो...फिर दर्शन करना।


पर जिद्दी था वो शिष्य।


गुरु जी ने कहा...ठीक है फिर...कल सुबह दर्शन कर लेना।


दूसरे दिन दर्शन कराया...साक्षात् से राधा प्रकट हो गयीं ।


ब्रह्मचर्य गिर गया उस शिष्य का राधा रानी को देखते ही।

इतना सौंदर्य था...राधा रानी का...कि वासना से भरा हुआ उसका चित्त।

बहुत ग्लानि हुयी उस शिष्य को...मरने के लिए तैयार हो गया।


तब उनके गुरु जी ने समझाया बेटा !  मैं पहले ही कह रहा था जिद्द मत करो...पर तुम माने नही…।


चलो! कोई बात नही...अब एक काम करो...श्री मद्भागवत जी के रास पंचाध्यायी का नित्य पाठ करो और  नाम मन्त्र का जाप करो...नित्य 1 लाख नाम मन्त्र।


साधकों !  ये प्रेम साधना...शेरनी का दूध है...कोई और इसे पी नही सकता...और किसी साधारण पात्र में ये  टिक भी नही सकता...।


इसलिये अपने हृदय का पात्र सुन्दर बनाओ...


पवित्र बनाओ...गन्दा है मांजो...चमकाओ उसे ।


इसके लिए नाम जप करो...खूब नाम जप करो...। कम से कम 11 लाख नाम जप करने के बाद ही अगर इस अष्टयाम को किया जाए...तब इसका प्रभाव अद्भुत होगा।


इति अष्टयाम ध्यानम्...


शाश्वत की डायरी क्रमशः   .......

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