गौरांगी की डायरी.. भाग- 4
आज के विचार
साधकों ! 3 मई तक लॉक डाउन में ही ये देश रहेगा .....चलिये ! चिन्ता करने से समाधान तो निकलेगा नही .......समय का सदुपयोग करें ......चिन्तन में अपने समय को लगाएं ......सुबह की शुरुआत "आज के विचार" से करें .......और "गौरांगी की डायरी" से अपनी जीवनचर्या बनाएं.........आपको बहुत आध्यात्मिक लाभ होगा ।
Harisharan
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( अपना स्वरूप सुन्दर बनाएं )
मैं जब अमेरिका में रहती थी .......तब मेरी सहेलियाँ मुझे जबरन सिनेमा ले जातीं .....मेरी रूचि नही होती थी मूवीज़ देखने में ।
एक मूवी मैंने देखी थी ..........उसका एक्टर मुझे अच्छा लगा था .......वो एक्टर हॉलीवुड का सुपरस्टार था ।
उम्र उसकी होगी 50 वर्ष .......पर उसका अभिनय बेजोड़ था ।
एक दिन सुबह का समय ...........मेरी सहेली ने मुझे कॉफी का कप पकड़वाते हुये मुझे अख़बार भी दे दिया ............
मेरी ये आदत पहले से ही थी .......कि सुबह के समय मैं अख़बार नही पढ़ती .....क्यों कि मुझे लगता था - सुबह सुबह कचरा दिमाग में भरने से क्या फायदा ?
मैंने अपनी सहेली से कहा ....कॉफी के लिए थैंक्यू ....पर अख़बार मैं नही पढ़ती .........सॉरी ।
अरे नही ! तुम्हारे फेवरेट एक्टर का इंटरव्यू प्रकाशित है इसमें ....पढो़ तो ........मेरी सहेली ने मुझे कहा ....और मेरे हाथ में अख़बार फिर थमा दिया ......मेरी रूचि थी उस एक्टर के अभिनय में .......तो मैंने अख़बार लेकर पढ़ना शुरू किया उस अमेरिकन कलाकार का साक्षात्कार ...... गजब था इंटरव्यू उसका ।
आप अपने आप को क्या मानते हैं ?
क्यों कि आप तो श्रेष्ठ नायक हैं ........पर खलनायकी भी करते हैं ........और खलनायकी भी आपकी ऐसी है की लगे की जूते ही मारें आपको ..........और नायक की भूमिका ऐसी निभाते हैं कि सब को आपसे प्यार हो जाता है ..........
आप अपना मूल्यांकन करते हैं कभी ?
ये प्रश्न था पत्रकार का ।
अब उत्तर सुनिये ...........
मैं एक बार स्वयं को आईने में देख रहा था ..........तो सोचने लगा कि मैं हूँ कौन ? हाँ .......मैं सोचने लगा .......मैं कौन हूँ ?
क्यों कि ये जो दिखाई दे रहा है मुझे चेहरा आईने में ......वो तो मुखौटा है .......और मैं तो मुखौटा बदलने में माहिर हूँ.........पर मेरा वास्तव में असली चेहरा क्या है ?
आप स्प्रिचुअल होते जा रहे हैं ? पत्रकार का फिर प्रश्न था ।
वो एक्टर उत्तर देता है .....मैं नही जानता स्प्रिच्यूल ......मैंने न ऐसी कोई किताबें पढ़ी हैं ...........पर मेरे मन में ये प्रश्न आया .....कि मेरा असली, असली स्वरूप क्या है ?
मैं खलनायक हूँ ... या नायक हूँ ? मैं क्या हूँ ।
मैंने इतना ही अख़बार में पढ़ा ............फिर सोच में पड़ गयी मैं ।
कितनी सही बात कही थी उस हॉलीवुड के नायक ने...........।
आप वह नही हैं जो आप दिखाई दे रहे हैं .............दिखाई में तो बुरे लोग भी अच्छे लगते हैं ...........क्या रावण साधू के भेष में अच्छा नही लगा होगा .......साधू लगा होगा तभी तो सीता जी भिक्षा देने बाहर आयीं ।
मनुष्य ने बहुत मुखौटे पहन रखे हैं......पर क्या हम भी कभी सोचेंगे उस हॉलीवुड के एक्टर की तरह .....कि हमारा असली स्वरूप क्या है ?
अच्छा आइये अपनी बात करते हैं............मैं भी आज आपको दार्शनिक धरातल पर ले गयी ...........।
बात तो अपने कन्हैया की है ...........अब कन्हैया इन मुखौटों से कभी आकर्षित नही होता ...........क्यों कि वो तुम्हें समझता है ।
आपका ये रूप , स्वरूप तो बाहरी है......वह दूसरों को दिखाने के लिये है .....है ना ? नही नही ......उसकी भी अपनी महत्ता है .....मैं कब मना कर रही हूँ ........पर मैं बात तो कन्हैया की कर रही हूँ ना .....।
आपका स्वरूप क्या है ?
क्या कहा आपने ? "आत्मा" आपका स्वरूप है ?
अजी ! छोड़िये ..........इन सुनी सुनाई बातों को ......रटी रटाई बातों को कब तक बोलते रहेंगे आप !
जानबूझ कर मैं ब्रह्मज्ञानियों की बातें यहां नही कर रही ..........वो लोग तो भेद को ही भ्रम मानते हैं ......वे तो एक ही स्वरूप मानते हैं .....जो नित्य है .....निर्विकार है ......अद्वितीय है ......और निरन्जन है ।
ऐसा तो हमारा कन्हैया ही है ।
ये बताइये आपका स्वरूप क्या है ? अब फिर "आत्मा" मत कह देना ।
देखिये ! आपका स्वरूप वह है ..........जो आप एकान्त में होते हैं ।
और ये बात ध्यान रहे .......आप जो पाना चाहते हैं .....जैसे बनना चाहते हैं ........जैसा आपका लक्ष्य है ..........उसके आधार पर ही आपका स्वरूप बनता है ।......आप समझे अब ?
चलिये ! सुन्दरता हमारे कन्हैया को बहुत प्रिय है ...........आपको पता होगा .............सुन्दरता के पीछे ये पागल है ........
नही ...नही .....आप फिर गलत समझ रहे हैं .......मैं बाहरी सुन्दरता की बात ही नही कर रही ...आपके शरीर की बात ही नही हो रही यहाँ ......मैं कर रही हूँ आपके भीतर की बात .......अन्तःकरण का श्रृंगार ।
आप सुबह उठ गए .......कन्हैया को स्मरण करते हुए उठ गए ......वाशरूम से नहा भी आये .......अब थोड़ा क्रीम और पाउडर नही लगाओगे ?
अन्तःकरण के श्रृंगार के बिना कन्हैया हमें अपना ही नही सकता ......ये आपको पता है ना ?
तो क्या करें ?
चलिये ! सजिये ....अपना श्रृंगार कीजिये ................
सत्य, दया की क्रीम लगाइये .......करुणा का काजल लगाइये .......दया का पाउडर मलिए ........स्नेह का सेन्ट लगाइये ।
अब बात मुख्य आती है प्रेम की ..........तो भाई साहब ! प्रेम तो हमारी आत्मा ही है ........और उसी को तो कन्हैया देखता है ..........देखो ! जहाँ ....जिस जगह आपका प्रेम होगा ........जिस वस्तु में आपका प्रेम होगा कन्हैया उसी को देखता है .......तुम्हारी "मात पिता तुम मेरे शरण गहुँ मैं किसकी" इन रटी रटाई प्रार्थनाओं से कुछ नही होने वाला ।
आपका प्रेम किधर है............ये मुख्य बात है ।
अच्छा ! एक बात तो मैं बता दूँ आपको .........कि बाहरी सजावट का कोई महत्व नही है .......ये बात तो आप समझते ही होंगे ........जैसे ....आपने सुना होगा .....कन्हैया जब छ: दिन का था तब पूतना आयी थी ..........और बड़ी बन ठन कर आयी थी .........ग्वाल बाल तो बेचारे सोचने लगे थे कि ये तो बड़ी ममतामयी है .....वात्सल्य की सागर है .......पर कन्हैया तो बाहर देखता नही ....... तुम्हारे पाखण्ड से वह प्रभावित तो होगा नही । .....उदासीन और हो जाएगा तुमसे ।
पूतना के बाहरी सुन्दरता के झांसे में आया क्या कन्हैया ?
नही आया .........वह तो तुम्हारे वास्तविक स्वरूप को सुन्दर देखना चाहता है .....तभी तो वह तुम्हारे पास आएगा ......।
अब सुनो ! कन्हैया को चाहिये प्रेम....सिर्फ प्रेम...अंतर की प्रीति ।
क्यों कि ये प्रेम, ये प्रीति ही आपका वास्तविक स्वरूप है ।
यह संसार के लोग तुम्हें मान रहे हैं .......वाह वाही कर रहे हैं .......तुम्हारे बड़े बड़े आश्रम हैं ........तुम महन्त हो .....तुम जगद्गुरु हो ..........पर कन्हैया को इससे क्या ? कन्हैया तो करमा बाई की खिचड़ी खाने वाला है .........उसे मतलब नही कि तुम करोड़पति हो या रोड पति ......वो तो प्रेम देखता है तुम्हारा ।
"पहले मैं मेम ! आपके स्क्रव लगाउंगी "..........वर्षों पहले की बात हो गयी .....मैं गयी थी ब्यूटीपार्लर ......तब मुझे पार्लर वाली ने कहा ।
ताकि मेम ! जो मैल इत्यादि या डेड स्किन है वो खतम हो जाए .....फिर मैं आपको सजाऊँगी ........ये भी पार्लर वाली ने ही कहा ।
पहले मैल को निकालना आवश्यक है .............है ना ?
तो चलो अन्तःकरण में .....( मन, बुद्धि , चित्त, और अहंकार को अन्तःकरण कहते हैं ) स्क्रव किया जाए .......जन्मों जन्मों का मैल छुडाने के लिये ।
तप करिये .......सहिये......सहनशीलता अपनाइये ......ज्यादा संग्रह मत करिये .......कम से कम में काम चलाने की आदत डालिये और सेवा करिये .............इससे आपका अन्तःकरण शुद्ध होगा ......मैल सब निकल जाएंगे .............।
और हाँ एक मुख्य बात कहना तो मैं भूल ही गयी .........
किसी से अपेक्षा मत रखिये .......जब आपने कन्हैया को अपना बना लिया .......तब किसी और से आशा रखेंगे तो कन्हैया को बुरा नही लगेगा ?
मुझ से एक करोड़पति व्यक्ति ने कहा .........आपको जो भी आवश्यकता हो .......कभी कोई भी आवश्यकता हो मुझे कहियेगा ।
मैंने उनसे विनम्रतापूर्वक कहा .......धन्यवाद आपका .....पर मुझे आवश्यकता नही है ।
वो फिर बोले ......नही, कभी भी .............और मुझे गलत न समझें आप ...........आप चाहें तो मेरी पत्नी का फोन नम्बर रख लें .......उससे कह दीजियेगा .........उन्होंने फिर मुझ से कहा ।
मुझे उनका प्रदर्शन अच्छा नही लगा ........क्यों कि मेरे मना करने पर भी वो बार बार बोले जा रहे थे ........तब मैंने उनसे कहा .......आप क्या मेरे कन्हैया को कंगाल समझते हो ........जब मैं अमेरिका छोड़कर उसके भरोसे श्रीधाम वृन्दावन में बैठी हूँ .....तो क्या वो मुझे खिला पिला भी नही सकता ?
मेरी बात उनको बुरी लगी .....और पागलबाबा से उन्होंने जाकर शिकायत कर दी .........कि गौरांगी प्रेमपूर्ण नही बोलती .......।
पागलबाबा ने उल्टा उन्हें ही फटकारा .........वो तुमसे क्यों प्रेमपूर्ण बोलने लगे ! ......और तुम क्यों उससे अपेक्षा लेकर गए थे कि वो तुमसे प्रेमपूर्ण हो ........पागलबाबा ने उन्हें समझाया ........वो स्त्री देह में है .....अगर वो सबसे "खें खें" करके प्रेमपूर्ण होती रहेगी ......तो फिर उससे साधना नही होगी ............अरे ! वो अपने कन्हैया की है .......तुम अपने प्रति क्यों उसे प्रेमपूर्ण बनाना चाहते हो !
देखो ! इसलिये भरोसा कन्हैया का रखो........किसी और का नही ।
चलिये ! अपना स्वरूप तो ठीक कीजिये ............गन्दा है .......काम , क्रोध , लोभ , मोह, अहंकार, ईर्श्या ...............इसको साफ़ कीजिये ...और फिर सजिये ........कन्हैया आपकी गोद में आएगा ........आने के लिये तैयार है वह तो.......पर आप अपने स्वरूप को तो सजाइये ।
गौरांगी
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साधकों ! एक साधिका हैं ..........मुझे भैया कहती हैं........और वो कहती हैं कि मेरे दो ही भाई हैं एक आप और दूसरा कन्हैया ।
कल ही मुझे कह रही थीं .....मेरे भैया कन्हैया ने लॉक डाउन कर दिया ।
अब क्या मुझ में इतनी हिम्मत है जो मैं कह सकूँ कि बहन ! तेरे कन्हैया ने ये सब नही किया ?
क्या सबकुछ करने वाला उसका भैया ही नही है ?
सृष्टि, पालन , संहार क्या कन्हैया ही नही करता है ?
कालोस्मि .......अर्जुन ! सबका काल मैं ही हूँ ..........गीता में ये कहने वाला क्या हमारा कन्हैया नही है ?
गौरांगी ने अपनी डायरी में लिखा है ...........अपने स्वरूप को साफ़ कीजिये ............अन्तःकरण ही हमारा स्वरूप है .............और जब स्वयं प्रश्न करते हुए गौरांगी कहती है .......फिर आत्मा क्या है ?
उत्तर भी देती है वो .....आत्मा प्रेम है ...........वो प्रेम - जो कन्हैया की ओर ही बह रहा है ...........।
दिव्य है डायरी गौरांगी की ................।
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