google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 गौरांगी की डायरी.... भाग- 3

गौरांगी की डायरी.... भाग- 3

 आज  के  विचार



( साधकों !   मैं "गौरांगी की डायरी" लिख रहा हूँ ,  और  बहुत  उत्साहित हूँ ....स्वयं मुझे बहुत लाभ हुआ है  इसको पढ़ने से ........मैं आप लोगों से आग्रह कर रहा हूँ ....कि इसे आप  पढ़िये  और भगवत्प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़िये  ,  ये मानव जीवन बारबार नही मिलता - याद रहे )


Harisharan


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( आपका जागना )


नही नही  -  मैं आपसे "जीवन" में जागने की बातें नही कर रही ......ऐसी दार्शनिक बातें  मैं आपको बताउंगी भी नही.......मैं आपको  व्यवहारिक साधना बताने के लिये बैठी हूँ ......ये कागज कलम लेके ।


और रही बात  वास्तव में जागने की  ?   तो    वह तो तभी सम्भव है .....जब  स्वयं भगवान कृपा करें.....इसलिये  उन गूढ़ बातों में  मैं आपको उलझाने वाली नही हूँ.....आप वैसे भी बहुत उलझे हुए हैं ।


नही नही ......मैं आपको ये भी  नही बताने  जा रही कि .....सुबह 4 बजे ही जागिये ........क्यों कि  मैं कोई  उपदेशक तो हूँ नहीं ......न कोई धर्मशास्त्र  की ज्ञाता ही हूँ ........मैं आपको   बस इतना ही  पूछने वाली हूँ कि आप जब भी सुबह  जागते हैं .......तब आप  क्या करते हैं ?  


इस तरह से जागते हैं ,  जैसे भूकम्प आ गया हो ?      


ओह !   6 बज गए ?    नास्ता तैयार करना है बच्चों के लिये ?    या  7 बज गए  ओह !     पतिदेव के लिये चाय बनानी है  ?       फिर भागी भागी वाशरूम में ...............।


ओह ! ऑफिस जाना है ...........7 बज गए ............फिर   भागे हुए वाशरूम में ........क्या इस तरह से आपका जागना होता है ? 


तो फिर  मेरी इतनी सी बात आप  मान लो ........जागना  भी  आपकी साधना हो सकती है .........आप कहोगे   4 बजे तो हम उठ नही सकते ।


तो  मैं कहाँ कह रही हूँ  कि आप चार बजे उठिये .........वैसे अगर उठ सकें   तो  आपको बहुत लाभ होगा ...........पर    आप बाल बच्चेदार हैं .......उनका काम करते करते  थक भी जाती होंगी ......या आप  दिन भर ऑफिस में बैठे बैठे   काम का लोड ..........इसलिये  नींद भी आवश्यक है .......अब आप  12 बजे रात में सोयेंगे  तो   4 बजे आपको उठाना   अन्याय ही  होगा  ।


इसलिये छोड़िये  4 बजे उठने की बातों को .....आप  उठिये तभी    जब आपकी नींद खुले .......या आप स्वयं समझिये इस बात को  ।


मेरा तो कहना ये है कि जब भी आप उठें ...............4 बजे या  7 बजे ....जब भी उठें   हड़बड़ा कर न उठें .........आराम  से उठें ........।


अब आप कहोगी  ....कि   थोड़ा  बेड में ही बैठकर   भगवान का नाम स्मरण कर लो .......या   मेडिटेशन कर लो ...........पर ये सब कर सको  तो बहुत अच्छी बात है ......पर मैं  आपसे ये भी नही कह रही  ।


मैं आपसे बस इतना कह रही हूँ ......कि  आप जब भी सुबह उठें ........जब भी आपकी आँखें खुलें......या वो स्थिति,  जब आँखें भी  अच्छे से नही खुलती....उस स्थिति में  क्या आप    अपनें बगल में,  अपने हाथों से,  थोडा टटोलकर देख सकती हैं  ?      बस इतना करिये  ।


अब आप कहोगे .......हाँ  इसमें क्या है.......उठते ही   बगल में  टटोलना है ........यही ना  ? 


हाँ .....पर   आँखें बन्द हों .....आँखें अभी अच्छे से खुली भी नही हैं  .....उस समय टटोलना है   ........।


अब आप कहोगे  टटोलना किसे हैं  ?    


कन्हैया को  !       


मैं समझ गयी   आपको  ये लग रहा है ना  कि .........हमारे इतने सौभाग्य कहाँ  ?       कहीं ऐसा कहकर  आप अपने सौभाग्य को  भगा तो नही रहे  हैं   ?


मैं उस कन्हैया की बात कर रही हूँ ......जो मन्त्र तंत्र के वश में नही है  ।


चाहे लाख मन्त्र जप लो ........जब तक  प्रेम नही है ना  तुम्हारे हृदय में ,  तब तक  कन्हैया   दूर-दूर तक नही  दिखाई देगा  ।


तो आप उठो ..........पर  उठते ही   जैसे -  माँ सोती है .......और  उठते ही ....या नींद में भी अपने  छोटे से बालक को बगल में  टटोलती है ......कि सोया ठीक से है कि नही  .....ऐसे ही  आप  टटोलेंगे  ?    


पर ऐसा करने से हो जाएगा  ?     ये आपका प्रश्न हो सकता है ।


पर  क्या हो जाएगा ?         सुनो  ना !         मैंने कह ही दिया है  आपसे .....कि  यम, नियम, प्राणायाम, मंत्रानुष्ठान ,  इन सबसे तो  मिलने से रहा  हमारा कन्हैया ...........हाँ ....देवता मिल जाएँ ......भुत प्रेत भी मिल जायँगे  अनुष्ठान इत्यादि से .......पर मेरा कन्हैया नही मिलेगा  ।


आप कहोगे ...........ये  तो आप अपने मन से बोल रही हैं ........


नही ....मेरे  पास प्रमाण है .........और वो प्रमाण भी उपनिषद् का है .....जिसे आप वेदान्ता कहते हो ......सुनो  -


" यमैवेश वृणते  तेन लभ्यः "


ये उपनिषद् का वाक्य है ..........इसका अर्थ ये है कि   "जिसे वो स्वयं   वरण  करे , उसी को  वो  मिलता है .......।


अच्छा  वो वरण किसका करता है  ?        


तो इसका उत्तर  तो सीधा  है ..........जो इसकी ,   इसके मिलन की प्रतीक्षा में है .........ये उसी को मिलता है  ।


अब बताइये  मेरी बात को कोई धर्माचार्य काट सकता है  ? 


अब आप कहोगे .......कि टटोलना क्यों है  वो कहीं खो जाता है क्या ? 


हाँ .....आपको पता नही है ..........वो नन्द बाबा के साथ सोता है ......पाँच वर्ष का है .....और  रात्रि में कहता है ......मैं तो   अब  बाबा के साथ सोऊंगा .....बड़ा हो गया हूँ ........मुझे भी यमुना जी जाना है    सुबह बाबा के साथ .........।


  सोता बाबा के साथ है ..........पर उठता मैया  के पास से  है ।


चंचल है ...........मन  इसकी क्या होड़ करेगा  ?   मन को पछाड़ के रख देता है ये .......कन्हैया और मन की हो जाए एक दिन दौड़ ? 


अजी !  मन  क्या है ?     मन भी तो यही है ............इन्द्रियों में मन  मैं हूँ ........लो ......कर लो  अब .......गीता में कह तो   दिया इसने ........इन्द्रियों में  मन मैं हूँ   ।


इसलिये ये चंचल है ........सुबह उठते ही  एक बार टटोलना तो बनता ही है .....कि देखें .......हमारा कन्हैया हमारे बगल में है या नही  ? 


नही है बगल में कन्हैया ! ......हो जाओ उदास ........बस बस .....यही उदासी  घनी होती जाए  तो समझो  साधना फलित हो गयी ........


और देखना   वो दिन भी आएगा .......जब   तुम्हारे टटोलने पर  वो तुम्हे मिल जाएगा  .......तुम्हारे ही  बेड में   !        


मेरी बात पर भरोसा नही है .......तो  ये प्रयोग कर ही लो ना !


मैं अपनी बात नही बताउंगी.....क्यों ये शरीर पंजाबी बनिया  है ...इसलिये कंजुस हूँ......मेरे पागलबाबा ने कहा  है  ....की अपना अनुभव बताने से  साधना में नुकसान ही होता है .....इसलिये नही बताउंगी ।


पर  ये  सच्ची घटना है .......एक दम्पति   मेरे पागलबाबा के शिष्य हैं ........कन्हैया ने कृपा की ......और .उनकी स्थिति  उच्च कर दी  ।


एक दिन......पति ने कहा ....सो जाओ ना !  सोती क्यों नही हो ?


देखो ! सुबह 4 बजे  यमुना स्नान करने जाना होता है .........इसलिये सो जाओ ..........पति ने कहा ।


पत्नी ने  उत्तर दिया......ये सिरहाने आकर बैठा है.....और मेरे बालों से खेल रहा है.......खिलखिला रहा है.....अब ये  सोये तब तो मैं सोऊँ  ?    


पति ने देखा ........तब तक  कन्हैया भाग गया  ।


ये बनी घटना है ...और अभी की घटना है....करीब  6 महिनें पहले की ।


इसलिये   अपना जागरण ......सुबह का जागना  इस तरह से बनाइये ......कि  अधखुली आँखों से .......उठते ही   उस तरफ बिना देखे    मन ही मन उसका नाम लेकर  -  उसे टटोलिये ......।


बस इतना करिये आप.............नाटक ही सही .......पहले नाटक ही करिये .......फिर देखियेगा यही नाटक एक दिन  सच हो जाएगा ।  


                                                                           गौरांगी 


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साधकों !    सब भाव का ही तो खेल है ना !     आप भाव से उसे बुलाइये  क्यों नही आएगा  ?    आएगा ........वो हमसे दूर तो है नही ......।


इस प्रयोग को कीजिये ............आपका अन्तःकरण पवित्र होगा ......सुबह उठते ही   कन्हैया याद आया .....इससे बड़ी बात और कुछ हो सकती है क्या  ?          


चलिये  कल मिलते हैं ........."गौरांगी की डायरी"   के साथ  ।


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