google.com, pub-8916578151656686, DIRECT, f08c47fec0942fa0 गौरांगी की डायरी से ...भाग-2

गौरांगी की डायरी से ...भाग-2

 आज  के  विचार



( साधकों !   मैं गौरांगी की डायरी जस की तस उतार रहा हूँ .....मुझे विश्वास है कि   भक्तिपथ के साधकों के लिये ये डायरी एक संग्रहणीय बनेगी.....गौरांगी  एक उच्च स्थिति की साधिका है ......योगभ्रष्ट है ....पूर्वजन्म की कोई  सिद्धपुरुष है .....।   चंडीगढ़ में जन्मीं , अमेरिका जैसे  भौतिकवाद वाले देश में पली बढ़ी ......पर  पूर्वजन्म के  कोई योग थे  कि  श्रीधाम वृन्दावन में आकर  पागलबाबा की शिष्या हो गयी ...और अखण्ड श्रीधामवृन्दावन के वास का संकल्प ले लिया ।  साधकों !  गौरांगी मेरी अच्छी मित्र है  आध्यात्मिक मित्र .....दो दिन पहले डायरी माँग कर लाया था उसकी  । ...आपकी आध्यात्मिक साधना   उत्तरोत्तर बढ़ती  रहे.....इसी कामना से ये अद्भुत  डायरी उतार रहा हूँ ) 



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मेरा एक व्यसन है......आप जानते हैं ना व्यसन किसे कहते हैं  ?


अच्छा ! सुनिये .....व्यसन कहते हैं ........नशा  को ....या  अंग्रेजी में कहते हैं   हॉवी   ।


जो अपने में किसी को सहज ही  व्यस्त रखे उसे ही कहते है "व्यसन"  ।


मेरा एक ही व्यसन रहा......जब से  मुझे मेरे पागलबाबा जैसे सदगुरु  मिले  ..........वैसे  अमेरिका में जब मैं रहती थी पढ़ती थी  या उसके बाद जॉब करती थी  तब भी मुझे  एकान्त में रहना प्रिय था ........अध्यात्म  मेरा प्रिय विषय था ......दीपक चोपड़ा जैसे वेदान्ता पर बोलनें वाले .....अमेरिका के  भारतीय गुरु,   इन लोगों के पास जाना ...इनको सुनना .......मुझे अच्छा लगता था ........।


पर जब मैं   भारत आयी .......और चंडीगढ़  कुछ दिन रही ..........फिर मुझे  मेरी बूआ जी ......जो  श्रीधाम वृन्दावन में ही फ़्लैट लेकर बैठी थीं  उन्होंने मुझे  दो दिन के लिये बुलाया ........मैं गयी वहाँ ।


मेरी भूआ जी   सुबह सुबह  एक कुञ्ज में जाती थीं .....सत्संग सुननें .....मैं भी गयी उनके  साथ .....एक महात्मा जी .......दिव्य और शान्त मुख मण्डल था उनका ...........ध्यान की मुद्रा में वो बैठे थे ............फिर उन्होंने बोलना शुरू किया ..........आहा ! उनका विषय था ...प्रेम .......


नही नही .....मात्र प्रेम नही ......दिव्य प्रेम ........डिवाइन लव  ।


मुझे  झंकझोर दिया था उन्होंने.....मुझे ऐसा लगा ......मैं  यहीं की तो हूँ .....मैं  इसी कुञ्ज की हूँ......मैं  वही गोपी हूँ ......जो  अपने आत्मरूप कृष्ण को पाना  चाहती है .....और जन्मों जन्मों से भटक रही है  ।


मैं गयी बाबा के पास .................


हमारे यहाँ  मेडिटेशन  और योगा में ज्यादा जोर दिया जाता है ........


मैंने बाबा से  मिलते ही पहली बात यही कही ।


हमारे यहाँ ?   कहाँ   ?   बाबा ने पूछा ।


मैं अमेरिका से आई हूँ ............मैं वहाँ की बात कर रही हूँ  ।


क्या तुमनें किया है  योगा या मेडिटेशन  ?   बाबा का प्रश्न था  ।


हाँ  किया है .......मन शान्त हो जाता है ......मन एकाग्र हो जाता है  ...

मैने कहा था  ।


तुमनें ये नही पूछा  उन योगाचार्यों से  कि .......उसके बाद क्या  ?  


शान्त हो गया मन .......एकाग्र हो गया मन ............अब क्या  ?  


बाबा के इस प्रश्न नें मुझे निरुत्तर कर दिया था .......हाँ बात तो सही है .....हम ध्यान करते हैं  हमारा मन  शान्त हो गया ...........अब क्या ? 


मन एकाग्र हो गया .....उसके बाद   ? 


हँसी आती है  आज.....बाबा नें  मेरे  "व्यसन" को ही चेंज कर दिया था ।


अब मेरा व्यसन हो गया था  उस ईश्वर  के साथ  प्रेम ...............


उसे अपना मानना........उससे कोई रिश्ता जोड़ लेना ..............


फिर मेरे बाबा नें उस ईश्वर को नाम दिया ..............कृष्ण ।


बाबा का कहना है.....जिसमें असीम आकर्षण  की क्षमता है.....जो  सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपनी ओर खींचता है उसे ही कहते हैं ....कृष्ण  ।


मुझे कृष्ण से प्रेम हो गया ........i love कृष्णा   ।


.......आस्तित्व  है  कृष्ण ........और आस्तित्व  कोई जड़ तो है नही ........वो  तो चैतन्य है.....  अन्तर्यामी है .....और  शक्तिमान भी है  ।


तुम जिस रूप में उसे भजना चाहो  वो उसी रूप में प्रकट है .......वो उसी रूप में है .......।


आज मेरा व्यसन हो गया है ........."कृष्ण पर  चिन्तन"


मेरा कृष्ण गीता में कहता है ........"मन और  बुद्धि  दोनों मुझे दो" ............हद्द है ........कितनें  अधिकार से    माँग रहा है वो ।


अब मैनें सोचा  मन तो दे ही दिया है .......तो क्यों न बुद्धि भी दे दें ।


तो  बुद्धि से भी मैं उसी के ऊपर तर्क वितर्क करनें लगी हूँ ......क्या करूँ ......मेरा अब यही व्यसन बन गया  है .....मेरा यही  नशा  है  ।


आप यदि निर्गुण निराकार को मानते हैं .......तो   मुझ गौरांगी को  क्षमा करें ...........मैं आपकी  कोई  सहायता नही कर पाऊँगी  ।


और  सगुण साकार में भी  आप  भगवान शंकर  भगवती दुर्गा के उपासक हैं ........तो   भगवान शंकर    तो  मेरे  गुरुतत्व हैं ............उनको तो मेरा बारम्बार प्रणाम है ....और रही    भगवती दुर्गा की बात  तो  वो  मेरे कन्हैया की छोटी बहन हैं ..........उनके प्रति श्रद्धा न होना  ये कैसे सम्भव है  !     ।


और  आप अगर  श्रीरघुनाथ जी ...अवधनेरश  राजाधिराज  श्रीराघवेन्द्र सरकार के भक्त हैं ........तो  उनके दरवार में तो  मुझे जानें में बड़ा संकोच होता है .. राजाधिराज हैं ......कोई त्रुटि न हो जाए  ।


पर  मैं बात कर रही हूँ .........अपनें कृष्ण की .......कन्हैया की   ।


आप  धर्म को माननें वाले हैं .........धर्म निष्ठ हैं .......धर्मात्मा हैं  .......तो  भी मुझे आप क्षमा करें ......क्यों की  मैं तो नारी हूँ ............मैं क्या जानूँ  धर्म  !    मुझे न धर्म शास्त्र का ज्ञान है .........न पूर्वमीमांसा का ।


मैं तो  केवल उनकी बातें कर रही हूँ .......जो  दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर रस के  पिपासु हैं .......आप   इन रसों से परिचित हैं ना  ?    ये प्रेम के ही विविध रस हैं .......प्रेम के ही प्रकार हैं  ।


क्या आप इस तरह से  साधना करेंगें  मेरे साथ  ?    


प्रेम की साधना  !  


नही नही ....धर्मशास्त्र वालों की शौचाचार को तो   मैं लम्बी ढोग  लगाती हूँ ।


प्रेम में काहे का शौचाचार  ?   


      इसमें  तो बस जो  प्रेम है  हमारे हृदय में ,  उसी को  और बढ़ाना है ......बस  ।    बाहरी शौचाचार का महत्व कहाँ है  !


ये प्रेम साधना है.....मैं इसी साधना के सरलरूप का दर्शन करा रही हूँ ।


पर  एक बात  तो मुख्य  मैने बताई ही नही .................


और  वो बात है ........."ठसक" मत रखना  बस  ।


क्यों की  हमारे प्रियतम को  "ठसक" पसन्द नही है ...........


हमारे कन्हैया को ठसक  प्रिय नही हैं ........ठसक समझते हैं ना आप ?


अजी !     गर्व , अहंकार ,  अभिमान या अंग्रेजी में कहो तो ईगो .........ये मत रखना ..........


और अगर अहंकार है  हमारे अंदर  ऐसा लगे ,  तो भी चिन्ता की बात नही  है .....क्यों की हमारे कन्हैया को "गर्वहारी" भी  तो कहा जाता है ।


बस जो जो कमी हो ......वो उसे बताते जाना .....स्वीकार करते जाना .......अहँकार है ......तो  अपनें प्यारे को बता देना  ...........  वो  तुम्हारी सहायता करेगा  .........।


हाँ एक बात और कहना चाहती हूँ मैं........जीवों के अनेक जन्मों के संस्कार होते हैं .......वो जल्दी छूटते नही हैं ..........जैसे -  प्रमाद,  कभी कभी  गलत  कामों का हो जाना .........इसको भी  स्वीकार करते चलना है .......कन्हैया  को बताते चलना है ......फिर स्वयं कन्हैया ही   तुम्हे  इन संस्कारों से मुक्त कर देगा.......यानि   अपनी कमी  बताते चलो  .....औरों को नही...... सिर्फ  अपने  प्यारे  कन्हैया  को  ।


चलिये आज इतना ही -    ..........राधे राधे ! 


                                                                                        

                                                                गौरांगी


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साधकों !     मैं फिर एक बार कहूँ    ये डायरी अद्भुत है ..........इसमें  प्रेम भक्ति  साधना के साधकों के लिये  बहुत सरल मार्गदर्शन है ...........आप इसे गम्भीरता से पढ़े .....और  लाभ लें  इसका  ।


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